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अपने बारे मेँ क्या बताऊ, मै एक विचित्र प्राणी हूं, मैँ बाकियोँ की तरह चाह कर भी Perfect नहीँ बन सकता, क्योकी मेरी विचारधारायेँ अलग हैँ।

मेरी कमजोरीयां भी बहुत हैँ, जैसे लोगो को की तरह नफरत करना मुझे बिरकुल नही आता, मेरी सबसे बडी कमजोरी यहीँ हैँ की मैँ चाहकर भी किसी से नफरत नहीँ कर सकता, गुस्सा तो मुझे ना के बराबर आता हैं, चिखने चिल्लाने से तो मेरा दुर दुर तक कोई वास्ता ही नही है।

बाकियो की तरह गंदी गंदी गालीयां देना भी अच्छा नही लगता, यही बात हैँ की मां डांटती हैँ जब पडोँसीयोँ से झगडा होता हैँ तो मै चाहकर भी चिल्लाकर झगड नहीँ पाता, जब लोग असहमति के लिए तर्क नहीं जुटा पाते, तब वो मुद्दा छोड़कर आपको पकड़ लेते हैं! और मुझे मुद्दो पर विवाद पंसद हैँ व्यक्तिगत गालीयां नहीँ ।

और गाली के संदर्म मेँ मेरा मानना हैँ की गाली सिर्फ गुस्सा काबु करने का साधण हैँ, गाली देने से समस्या का समाधान नहीँ होता, बस मुहं खराब होता जाता है, लेकिन मुझे तो गुस्सा भी कम आता हैँ।

मुझे गुस्सा तब आता हैँ जब मेरे सामने कोई किसी लडकी को 'माल' कह रहा होँ, पता नहीँ क्यु पर महीलाओँ का अपमान नहीँ सह पाता हुं।

मेरी एक और कमजोरी ये हैँ की मेरे ज्यादा दोस्त नही हैँ, जब से उस लडकी को स्कुल मेँ 'माल' कहा गया तब से ऐसे कीसी को भी दोस्त नहीँ बनाया जो महिलाओँ का सम्मान ना करता होँ, चाहे मुझे अकेला रहना पढेँ... क्योँ की दर्द होता हैँ दिल मेँ,, शास्त्र कहते हैँ जिन इंसानोँ के आचार और विचार मिलते हैँ वो दोस्त बनते हैँ, पर मेरा कोई दुश्मन भी तो नहीँ हैँ।

यहीँ कारण हैँ की मैँ बाकियोँ की तरह सिगरेट, गुटखा, पानमसाला, खर्रा, शराब वैगेरे को चख कर भी नहीँ देख पाया हुँ... लोग कहते हैँ 'खाकर तो देख' पर मन कहता हैँ क्या ये जरुरी हैँ...? खैर मुझे तो चाय का शौक भी नहीँ, पिछली बार मैँने चाय और सोफ-सुपारी कब खाई पियी ये तक याद नहीँ, हां हुं मै विचित्र शायद ये मेरी ही कमजोरी हैँ की जमाने के इस रित मेँ असामांजस्य नहीँ बिठा पाया, क्योँ की इन सबके शौक पाल कर पानठेलोँ मेँ बैँठकर लडीँकीयो के बारे मेँ अनर्गल बातेँ या ऐसे मनुष्योँमेँ रहकर हास्य, विलास, प्रमाद, निन्दा, विषयभोग और व्यर्थ बातोँ मेँ अपने अमुल्य समयका एक क्षण भी बिताना अच्छा नहीँ लगता, ये सब मेरे स्वभाव मेँ ही नहीँ हैँ।

बाकियोँ को तरह लडकीयोँ नबंर लेकर उन्हे Flirt करना भी मेँरे विचारधारा मेँ नहीँ हैँ, इस मामले मेँ मेरी सोच जमाने से बिलकुल अलग हैँ, की आप जिसे प्यार करते हैँ उसी से लगाव रखेँ, पर कलियुग मेँ सच्चा प्यार करता कौन है, सब आकर्षण और भोग के पिछे पागल हैँ, इन्द्रियों की त्रुप्तता को प्यार की सफलता समझने वालेँ लोगोँ ने प्रेम की परिभाषा ही बदल दी हैँ....

मै भी तो पागल हुं लेकिन किसी के आत्मा ते पिछे, अब क्या बताउ एक बार पांचवी मेँ किसीने पुछा की "तुम्हारी वाली कौन सी हैँ" तब अनजाने मेँ मैँने उस लडकी का नाम बता दिया था, पर तब नहीँ पता था की मेरी वो एक गलती मुझे जिवनभर तडपायेगी...

आप या कोई और मुझपर विश्वास करे ना करे पर, लेकीन पता नहीँ कभी भी उसको को भुलकर दुसरी लडकियोँ के बारे मेँ सोचने लगता हुं, तो मानो अंदर से मेरी आत्मा मुझसे ये कहती हो की "तुम तो उस से प्यार करते थे सारंग..." "तुम भी बाकीयोँ की तरह भुल जाने वाले निकले..." ऐसा नहीँ की उसे भुलाने का प्रयास नहीँ किया पर मेरी अंतरआत्मा मुझे बार बार कचोटती हैँ, ज्ञानी वहीँ हैँ जो किसी एक का पुजन करे (गिता 7-17) जब पुजा किसी एक कि ही की जानी चाहिये तो फिर प्यार क्यु नहीँ,

मैने बचपन मेँ अपने आप से एक सवाल पुछा था की 'क्या कोई इसांन जिंदगी भर किसी एक ही लडकी से प्यार कर सकता हैँ..? इस सवाल का जवाब मैँ खुद बनना चाहता हुं...

पता नहीँ क्यु लेकिन बहुत से सुंदर चेहरे देखे हैँ उससे भी, पर वो जिद हैँ इस दिल की,

मां जब भी शादी की बात कहती हैँ तो मैँ चिढ़ जाता हुं,

मै उसके बिना तो जी सकता हुं पर उसके बिना किसी और के साथ जिना मुमकिन नहीँ होगा...

जब वो बस स्टॉप पे अपने Friends के साथ सामने से Tata bye करती थी तब मैँ मन ही मन मुस्काता था...

जब सर के डांटने पर वो रोती थी तब मेरे आंख मेँ भी पाणी आ जाता था...

तब डरता था, कहीँ ना कहीँ आत्मविश्वास की कमी थी, मासुम बच्चा था न, सोचा बडा होकर उसे भुल जाऊंगा पर पता नहीँ क्यु उसे भुलना मुश्किल है...

लझ्झेदार बातोँ को भावुकता की चाशनी मे चटाकर प्यार का नाटक करना मुझे नहीँ आता...

वो सदा हंसते रहने वाली चुलबुली लडकी दिल और दिमाग पर कब्जा कर बैँठी हैँ, उसकी हँसी आज भी मुझे दिल से रुलाती हैँ... हां मानता हु की ये मेरी प्रॉब्लम है, मेरी गलती हैँ, इसिलिए मैँ मार्ग भी ढुंढ लिया है, प्यार तो इंसान करता हैँ पर जोडीयां किस्मत बनाती हैँ...

मेरी पसंद की हुयी लडकी किस्मत को पसंद नहीँ तो फिर किस्मत ने तय कि हुयी लडकी मै कैसे पसंद करुं...? मेरी लढाई किस्मत से हैँ,

कभी सोचता हुं मेरी हैसियत ही नहीँ उसे पाने की, क्यो की, प्यार करने की औकात नहीँ हैँ मेरी, और ना ही लेवल, वो ठहरी फर्स्ट बेँचर टॉपर, और मैँ कहा लास्ट बेँचर पढाई मेँ कमजोर और बडेँ लडको के हाथ से मार खाने वाला... वो किसी Dr. या Engg. से शादी करेगीँ और मैँ ठहरा Mobile Shop वाला, प्यार के अलावा और मेरे पास हैँ ही क्या? और प्यार से पेट नहीँ भरता...

शायद मेरी ही कमजोरी हैँ की गिता के 18 अध्याय 700 श्लोक तो पुरे याद हैँ पर Sine, Cos, Delta Pay ये सब मेँरे दिमाग मेँ नहीँ घुसते, मेरी गहरी पकड और खिंचाव अध्यात्म की ओर हैँ,

लेकिन जब प्यार शरिर से हो तो जरुरते होती हैँ, पर जब प्यार आत्मा से हो तो कोई इच्छायेँ नहीँ होतीँ, होता हैँ समर्पण, प्रिति और स्नेह...

आप मुझे पागल, बेवकुफ, गधा, उल्लु या लल्लु चाहे जो समझो पर उसकी दिवानगी ने मुझे विचारक और लेखक बना दिया हैँ, तभी तो परिक्षा मेँ Copy करके पास होने वाला सांरग आज बडे बडे लेख लिख रहा हैं,

पता नही क्युं लेकिन भगवान ने मेरी बातोँ को सुन लिया,

जब स्कुल मेँ सब मिलकर गाते थे 'इतनी शक्ती दे न दाता...' मैँ भी पुरी श्रद्धा से गाया था 'दुर कर अज्ञान के हो अधेँरे तु हमेँ ज्ञान की रोशनी देँ' पता नहीँ क्यु लेकिन भगवान ने अपनी ज्ञान की गंगा मेँ मुझे नहला दिया तभी गिता के 700 श्लोक याद कर पाया हुं...

हर बुराई से बचते रहे हमेँ जितनी भी दे, भली जिन्दगी दे, बैर हो ना किसा का किसी से, भावना मन मेँ बदलेँ की हो ना... मुझे हर बुराई से दुर रखा मेरे कान्हा ने, मै तो जिनसे मेरे घरवालोँ का झगडा हैँ उनसे भी नफरत नहीँ कर पता, बदले की भावना नहीँ बल्कि उस इंसान को बदल डालने भावना रहती हैँ मन मेँ, शायद मेरी हीँ कमजोरी हैँ!

मेरा लगाव अध्यात्म की ओर क्यु हैँ ? इसका जवाब मेरी माँ बताती हैँ वो कहती हैँ मैँ जब पेट में था तब वो गिता पढा करती थी, या शायद राशी स्वामी चंद्रमा होने की वजह से ऐसा हुं पर जो शांत और सौम्य होता हैँ, माँ तो ये भी कहती हैँ की तेरा जन्म नक्षत्र सबसे शुभ हैँ इसिलिए तु बहुत संवेदनशिल हैँ, मैँ जिवन को स्वयं के योग्य बनाने से अच्छा स्वयं को जिवन के योग्य बनाने पर भर देता हुँ!

अब इतनी कमजोरीयोँ के बाद आप ही बताईए, क्या मैँ कभी जमाने के चल सकता हुं क्योँकी विचारधारायेँ भिन्न हैँ मेरी,

एक जगह पढा था की 'बडा आदमी बनना अच्छी बात हैँ पर अच्छा आदमी बनना बडी बात हैँ', लेकिन ये बातेँ किताबोँ मेँ हीँ अच्छी लगती हैँ, क्योँकी अच्छाई की परीभाषा कलियुग मेँ दिखावे पर निर्भर करती हैँ,

और मैँ तो चाह कर भी अच्छा नहीँ बन पाऊंगा क्योँ की,

नियत कितनी भी अच्छी क्योँ न होँ दुनिया आपको आपके दिखावे से जानती हैँ, और दिखावा कितना भी अच्छा क्योँ न होँ भगवान आपको आपकी नियत से जानता हैँ,

ये उस लडकी का प्यार ही हैँ जो मुझे दुसरी लडकीयोँ के तरफ भटकने नहीँ देता, और प्यार को तो मैँ अच्छी तरीके से समझ ही गया हुं की

''हासील करके तो हर कोई प्यार कर सकता हैं मगर, मगर खो कर भी किसी को चाहना ही असली प्यार हैं'' और प्यार मेँ 'दो लोगोँ का साथ मेँ होना' जरुरी नहीँ बल्की, "प्यार का होना" जरुरी हैँ..

और मुझे सकारात्मत विचारशैली का बनाने मेँ मेरे माँ का हाथ हैँ जिसने मेरे हात मेँ गिता दी थी, क्यो की जो माता-पिता अपनी सन्तानों के भविष्य की चिन्ता करते हैं वास्तव में उन्हें कोई लाभ होता ही नहीं, किन्तु जो माता-पिता अपनी सन्तानों के भविष्य की नहीं बल्की उनके चरित्र का निर्माण करते हैं उन संतानों की प्रशस्ति (प्रशंसा) सारा संसार करता है। स्वयं विचार कीजिए...!

मै ये नहीँ जानता की दुनिया के नजर मेँ मैँ कामयाब हुं या नहीँ, पर मेरी नजर मेँ मैँ कामयाब हुं और कामयाबी अपने आप को बदलने की,

मैँ जैसा हुं वैसा ही ठीक हुं Unperfect, Inmature Untalented क्योँ की बहुत देख लिया समझदार बन कर पर खुशी हमेशा पागल बनने मेँ ही आयी हैँ,

अपने बारे मेँ यही कहुंगा की मेँरी विचारधारा ही मेरी पहचान हैँ, और रहा ये शरीर तो ये मेरी आत्मा का वस्त्र हैँ जो एक दिन फट जायेगा पर विचारधारा मुझे हर जन्म मेँ साथ देगी...!