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स्वयं  विचार कीजिए!

1. सत्ता की लालसा सबके ह्दय को घेरे रहती है! प्रत्येक व्यक्ति अपना एक राष्ट्र र्निमित करने का प्रयत्न अवश्य करता है!
फिर वो राष्ट्र कुरुराष्ट्र की तरह बहुत बड़ा  हो या फिर अपने परिवार तक सीमित हो वो सत्ता प्राप्त करने का प्रयास अवश्य करता है!
किन्तु सत्ता का वास्तविक रुप क्या है?

एक मनुष्य जितने अधिक लोगों  के जीवन को प्रभावित कर सके! जितने अधिक लोगों  की स्वतन्त्रता पर अंकुश रख सके! उतनी ही अधिक सत्ता का अनुभव करता है वो!
सत्ता का वास्तविक रुप ही है अन्य के जीवन पर स्वयं  का प्रभाव!
किन्तु क्या वास्तविक प्रभाव प्रेम, करुणा, दया और धर्म से र्निमित  नहीं  होता?
जब भी मनुष्य अधर्म और कठोरता से सत्ता प्राप्त करने का प्रयास करता है तो वो दूसरे के ह्दय में  विरोध अथवा विद्रोह को जन्म देता है और परिणाम नाश होता है! हाँ कुछ समय के लिए वह स्वयं  को प्रभावी और शक्तिशाली अवश्य पाता है किन्तु वो वास्तविक सत्ता नहीं!
यही कारण है कि भृगु  और वशिष्ट जैसे ऋषियों की आज भी पूजा की जाती है! रावण और कंस अथवा हिरणकश्यप की नहीं !
स्वयं  विचार कीजिए!
 
2. संसार में  प्रत्येक व्यक्ति को किसी न किसी प्रकार की निर्बलता अवश्य होती है! जैसे कोई बहुत तेज दौड़ नहीं पाता तो कोई अधिक भार नहीं  उठा पाता! कोई आसाध्य रूप से पीडित(बीमार) रहता है तो कोई पढे  हुए पाठों(अध्याय) को याद नहीं  रख पाता! या किसी के शरीर में कोई अन्य समस्या होती है! ऐसे अनेकों उदाहरण और भी हैं!
क्या आप किसी ऐसे व्यक्ति को जानते हैं? जिसे सब कुछ प्राप्त हो?
और हम जीवन की उस एक निर्बलता को जीवन का केन्द्र मान कर जीते हैं इस कारण वश ह्दय में दुख और असन्तोष रहता है हमेशा! निर्बलता मनुष्य को जन्म और संजोग  से प्राप्त होती है!
लेकिन उस निर्बलता को मनुष्य का मन अपनी मर्यादा बना लेता है!
परन्तु कुछ व्यक्ति ऐसे भी होते हैं! जो अपने पुरूषार्थ और श्रम से उस निर्बलता को पराजित कर देते हैं !
क्या अन्तर है उन लोगों में  और अन्य लोगों में ?
बहुत ही आसान सा उत्तर है इसका! जो व्यक्ति निर्बलता से पराजित नहीं  होता जो पुरूषार्थ करने का साहस रखता है ह्दय में वो निर्बलता को पार कर जाता है!
अर्थात निर्बलता अवश्य ईश्वर देते हैं  लेकिन मर्यादा…. मर्यादा मनुष्य का मन ही र्निमित करता है!
स्वयं विचार कीजिए!
 
3. जब किसी की आशा या इच्छा भंग होती है! तो उसका ह्दय क्रोध से भर जाता है जिस व्यक्ति को वो अपना अपराधी समझता है उस व्यक्ति को दण्ड देने का प्रयत्न करता है!
पर क्या हमारी इच्छा या आशा का भंग होना क्या हमेशा ही किसी का अपराध होता है?
इच्छाओं के अपूर्ण रहने के तो कई कारण हो सकते हैं ?
कुछ तो संजोग के कारण अधूरी रह जाती हैं! और कुछ नियति के कारण! और कभी-कभी इच्छाओं का स्वरूप ही ऐसा होता है कि वो पूर्ण नहीं  हो पाती! बिना परिस्थिति पर विचार किये किसी को अपराधी मान लेना न्याय नहीं -प्रतिशोध है! न्याय का आधार तो दया, करूणा है! और प्रतिशोध का आधार क्रोध, अंहकार है!
अर्थात ह्दय में करूणा धारण किये बिना किसी के अपराध के विषय में  विचार करना किसी को दण्ड देना हुआ न !
क्या यह अपने आप में  ही अन्याय नहीं???
स्वयं  विचार कीजिए!
 
4. व्यक्ति को जब उसके अपराध का दण्ड मिलता है! तब कभी-कभी उस न्याय को देख कर मन खसोटता है!
प्रश्न उठता है मन में कि जब वो अपराध हुआ! तब व्यक्ति भिन्न था! उसके बाद उसने इतने पश्चाताप किये स्वयं में  इतना परिवर्तन किया!
फिर उसे दण्ड क्योँ मिले ?
पर जहाँ आघात होता है तो वहाँ प्रतिआघात भी होता है जैसा कर्म वैसा फल! यदि किसी को प्रेम दोगे तो सुख प्राप्त होगा! यदि किसी की हत्या करोगे तो मृत्यु दण्ड मिलेगा!
जैसा कार्य वैसा ही न्याय! तो फिर प्रायश्चित  और पश्चाताप का कोई मूल्य नहीं ? जरुर … है… अवश्य है मूल्य…… प्रायश्चित और पश्चाताप मनुष्य की आत्मा को बलवान करता है आने वाले दण्ड को स्वीकार करने के लिए मनुष्य को तैयार करता है!
अर्थात बिना प्रायश्चित के दण्ड स्वीकार करने का कोई मूल्य है???
स्वयं  विचार कीजिए!

5. जब-जब मनुष्य के सामने कोई विकट स्थिति आती है तब मनुष्य ईश्वर से प्रार्थना करता है! ईश्वर के समक्ष याचना करता है कि वो उस स्थिति से उबारे!
किन्तु इस प्रार्थना का वास्तविक रूप क्या है?
क्या ये हमने कभी सोचा है?
प्रार्थना का अर्थ है अपनी सारी आंशकायें, सारी चिंतायें, सारे संकल्प, सारे विकल्प एवं  सारी योजनायें ईश्वर के चरणोँ में रख कर अर्थात अपने कर्म का फल क्या होगा इसकी चिन्ता न करके धर्म के अनुरूप कर्म करना ईश्वर की योजनाओं को अपनी नियति मान लेना!
यही प्रार्थना है न?
किन्तु ईश्वर की योजना को समझ पाना!
क्या सम्भव है?
वो योजनायें तो हमारे कार्यों के परिणामों के रूप मे प्रकट होती हैं हमेशा, किन्तु यदि कोई कर्मों  का ही त्याग कर दें!
क्या वो प्रार्थना है?
वास्तव में कर्म ही जीवन है और फल के प्रति मोह न रखना ही सच्ची प्रार्थना है! जो प्रार्थना कर्म में बाधा बन जायें मनुष्य को कार्य ही न करने दे!
वो प्रार्थना है या पराजय?
स्वयं  विचार कीजिए!
 
6. एक ही गुरू के पास शिक्षा प्राप्त करने वाले सारे शिष्य एक समान विद्या  प्राप्त नहीं  कर पाते! सारे शिष्य गुरू की बातें  सुनते हुए अवश्य दिखाई देते हैं उनकी पूजा करते हुए दिखाई देते हैं किन्तु एक समान विद्या प्राप्त  नहीं  कर पाते?
क्या कभी विचार किया है ऐसा क्योँ होता है? तथ्य तो यह है कि  विद्या  न प्राप्त करने वाले शिष्य समर्पण का दिखावा तो करते हैं किन्तु समर्पण  का वास्तविक अर्थ नहीं  समझ पाते! गुरू के चरणो में  फूल चढाने  से अथवा गुरू का आदेश मानने मात्र से क्या समर्पण  सिध्द होता है?
नहीं …. समर्पण का वास्तविक अर्थ है जब गुरू के प्रति मन में कोई सन्देह न रहे! गुरू के मुंह  से आदेश निकले उससे पूर्व शिष्य उस कार्य को पूरा कर दें!
गुरू के विचारों  के साथ शिष्य के विचार एक हो जायें! जिससे जब तक अपने गुरू में ईश्वर का रूप न देख लें! तब तक उसका समर्पण  सत्य नहीं ! वास्तव में समर्पण किसी कार्य का नाम नहीं ! ह्दय की भावना और मन की स्थिति का नाम है!
अर्थात हमारे अज्ञान में क्या केवल दोष हमारे मन का नहीं ?
स्वयं  विचार कीजिए!
 
7. मनुष्य का स्वभाव है कि वह स्वयं  को अपने परिवार को, अपनी सन्तानों को अधिकतम सुख प्राप्त हो ऐसी इच्छा रखता है!
इसी कारण हम सदा श्रम और कष्ट से अन्तर(दूरी) रखते हैं! विश्राम और सुविधाओं को बठाने का प्रयास करते हैं!
स्वंय अपने जीवन का विचार किजिए? क्या यह सत्य नही कि हम अपनी सन्तानों के लिए सदा ही विश्राम और सुविधाओं का आयोजन करते हैं! पर क्या कभी सोचा है केवल विश्राम से क्या लाभ प्राप्त होता है? केवल सुख और सुविधा जिन्हे प्राप्त हो उनका जीवन कैसा होता है?
शरीर जब श्रम करता है तो अधिक स्वस्थ बनता है बुध्दि भी जब कठिन चुनौतियों का सामना करती है तब अधिक तेजस्वी बनती है यह हम सबका अनुभव है पर हम शायद यह भूल जाते हैं कि मन और आत्मा को जब अधिक कठिनाइयां  प्राप्त होती हैं तब वह भी अधिक बलवान होती हैं!
अर्थात जब भी हम अपनी सन्तानों को श्रम और दुख से दूर रखने का प्रयास करते हैं! तो क्या वास्तव मे उनके सुख का मार्ग बन्द नहीं  कर देते?
स्वयं  विचार कीजिए!
 
8. इस संसार मे आने वाला प्रत्येक बालक सम्पूर्णतः  संस्कार रहित होता है उसके अन्तर पर न किसी अच्छे संस्कार के चिन्ह अंकित होते हैं और न ही बुरे संस्कार के!
अर्थात जन्म से बालक में  न कोई गुण होता है और न ही कोई दोष! तो ये दोष अथवा गुण किस प्रकार प्राप्त होते हैं! क्या हमने कभी विचार किया है?
जो बात माता-पिता के मुख से निरन्तर सुनी जाती हैं वो ही बात उनकी संतानो के ह्दय का संस्कार बनती है। जैसे किसी गाँव में  नदी तट पर एक डंडी(गली)बन जाती है केवल उसी मार्ग पर बार-बार चलने के कारण!
अर्थात माता-पिता के ह्दय की इच्छायें उनकी सन्तानो के ह्दय का दोष अथवा गुण बन कर जन्म लेती हैं!
क्या यह सत्य नहीं ?
पर फिर भी उनकी संतानों  में  दोष दिखाई देता है तो माता-पिता आश्चर्य और दुख से भर जाते हैं। माता-पिता का ह्दय यह प्रश्न करता है कि उनकी सन्तानों मे  यह कूर संस्कार आये कहाँ से?
सत्य तो यही है कि माता-पिता अपनी सन्तानों को अन्जाने में   ही क्रूर  संस्कारो के बीज दे देते हैं! जो उनकी सन्तानों की ह्दय भूमि पर क्रूर  संस्कार का वृक्ष  बन कर उगता है!
अर्थात अपनी सन्तानों को क्रूर  संस्कारी और धर्ममय आशा रखने वाले प्रत्येक माता-पिता को प्रथम अपने ह्दय की इच्छाओं पर अंकुश रखना क्या अनिवार्य नहीं ? प्रत्येक माता-पिता इस पर विचार अवश्य करे!
स्वयं  विचार कीजिए!
 
9. श्रेष्ठता का क्या अर्थ है? विचार करो?
श्रेष्ठता का अर्थ है दूसरे से अधिक ज्ञान प्राप्त करना अर्थात मूल्य इस बात का नहीं  कि स्वयं  कितना ज्ञान प्राप्त किया……
मूल्य इस बात का है कि प्राप्त किया हुआ ज्ञान दूसरों  से कितना अधिक है अर्थात श्रेष्ठता की इच्छा ज्ञान प्राप्ति को भी प्रतियोगिता बना देती है और प्रतियोगिता में विजय अन्तिम कब होती है?
कुछ समय के लिए तो श्रेष्ठ बना जा सकता है परन्तु हमेशा के लिए कोई श्रेष्ठ नहीं  रह पाता……
फिर वही असन्तोष,पीडा और संघर्ष जन्म लेता है किन्तु श्रेष्ठ बनने के बदले अगर उत्तम बनने का प्रयत्न करे तो क्या होगा?
उत्तम का अर्थ है कि जितना प्राप्त करने योग्य है वो सब प्राप्त करना!  किसी से अधिक पाने की इच्छा से नही मात्र आत्मा की तृप्ती हेतु कुछ प्राप्त करना……
उत्तम के मार्ग पर किसी अन्य से प्रतियोगिता नही होती स्वयं  अपने आप से प्रतियोगिता होती है अर्थात उत्तम बनने का प्रयत्न करने वाले को देर-अवेर सारा ज्ञान प्राप्त हो जाता है बिना प्रयत्न के ही वो श्रेष्ठ बन जाता है!
किन्तु जो श्रेष्ठ बनने का प्रयत्न करता है वो श्रेष्ठ बने या न बने उत्तम कभी नहीं  बन पाता!
स्वयं  विचार कीजिए!
 
10. अपने ही धर्म के विषय में ,कोई अन्य के धर्म के विषय मे किसी के अधर्म को लेकर चर्चायें होती ही रहती हैं कोई भी ऐसा नहीं  है जो धर्म के बारें मे विचार न करता हो……
किन्तु वास्तव मे धर्म है क्या?
क्या कोई यह समझ पाया है?
धर्म मनुष्य को दूसरे मनुष्य के साथ…  समस्त सृष्टी के साथ…
यही करण है कि किसी धर्म के स्थान पर मनुष्य को सदा ही शान्ति प्राप्त होती है!
क्या यह आपका अनुभव नहीं ?
अर्थात धर्म मनुष्य के सारे संघर्षो का नाश करता है! पर यह किस प्रकार सम्भव है कि किसी मनुष्य को किसी अन्य के साथ कोई संघर्ष न  हो!
जहाँ प्रेम होता है वहाँ संघर्ष भी होता है आप कहोगे हाँ अवश्य होता है किन्तु आप थोडा और विचार करोगे तो ये जान जाओगे कि जिस समय संघर्ष होता है उस समय प्रेम का विस्मरण हो जाता है! और फिर इच्छायें जागती हैं! अंहकार जागता है क्रोध बढ जाता है पर प्रेम नहीं  जागता!
किन्तु जहाँ प्रेम जागता है वहाँ सारे संघर्ष ,सारे विवाद ,सारे झगडे नष्ट हो जाते हैं!
स्वयं  विचार कीजिए!