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मांसाहार खाने वाले ईसाई, करते हैँ बाईबल का अपमान

11 Feb 2015

1. पशु वध करने के लिए नहीं हैं |

2. मैं दया चाहूँगा, बलिदान नहीं |

3. तुम रक्त बहाना छोड़ दो, अपने मुंह में मांस मतडालो |

4. ईश्वर बड़ा दयालु है, उसकी आज्ञा है कि मनुष्य पृथ्वी से उत्पन्न शाक, फल और अन्न से अपना जीवन निर्वाह करे |

5. हे मांसाहारी ! जब तू अपने हाथ फैलायेगा , तब मैं अपनी आँखे बन्द कर लूंगा | तेरी प्रार्थानाएँ नहीं सुनूंगा; क्योंकि तेरे हाथ खून से सने हुए हैं |

- ईसा मसीह

ईसाई धर्म के धर्मग्रन्थ बाइबिल के नए नियम ( New Testament) में साफ़ शब्दों में मांस खाने और शराब पीने की मनाई की गयी हैँ, क्योंकि इनका सेवन करने वाला खुद तो ठोकर खाता है, और दूसरों को भी सही धर्म से भटका देता हैँ,

It is better not to eat meat or drink wine or to do anything else that will cause your brother or sister to,

[fall.Romans 14:21]

भला तो यह है, कि तू न मांस खाए, और न दाख रस पीए, न और कुछ ऐसा करे, जिस से तेरा भाई ठोकर खाए,

ईसा मसीह को आत्मिक ज्ञान जान दि-बेपटिस्ट से प्राप्त हुआ था, जो मांसाहार के सख्त विरोधी थे । ईसा मसीह वक शिक्षा के दो प्रमुख सिद्धांत है (Thou Shall Not Kill) तुम जीव हत्या नहीं करोगेऔर (Love Thy Neighbour) अपने पड़ोसी से प्यार करो।

गास्पल आफ पीस आफ जीसस क्राइस्ट में ईसा मसीह के वचन इस प्रकार है

" सच तो यह हैं कि जो हत्या करता है, वह असल में अपनी ही हत्या कर रहा है । जो मारे हुए जानवर का मांस खाता है, वह असल में अपना मुर्दा आप ही खा रहा है, जानवरों की मौत उसकी अपनी मौत है क्योंकि इस गुनाह का बदला मौत से हो ही नहीं सकता, बेजबान की हत्या न करो और न अपने निरीह शिकार का मांस खाओ, इससे कहीं तुम शैतान के गुलाम न बन जाओवे आगे फरमाते हैं कि यदि तुम मृत (मांसाहार) भोजन करोगे तो वह मृत उगहार तुम्हें भी मार देगा । यदि तुम शाकाहारी भोजन अपनाओगे, तो तुम्हें जीवन और शक्ति मिलेगी। लेकिन यदि तुम मृत मांसाहार भोजन करोगे तो तुम्हें वह मृत आहार मार देगा। क्योंकि केवल जीवन से ही जीवन मिलता है मौत से हमेशा मौत ही मिलती हैँ...

फिर भी जो ईसाई मांस खा रहे हैँ वो सरासर बाईबल और ईसा मसीह के वचनो का पालन न कर के उनका अनादर कर रहे हैँ।





{चेतावनी :- इस लेख में दिये सबुत सिख धर्म के ग्रंथो से लिये गये हैँ, तथा लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं, इस लेख से आपकी स्वार्थी भावनाओँ को ठेस पहुंची हो तो क्षमा करे...}

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सिख धर्म मेँ भी हैँ, मांसाहार पर प्रतिबंध

10 Feb 2015

1. जो व्यक्ति मांस, मछली और शराब का सेवन करते हैं,उसके धर्म, कर्म, जप, तप, सबनष्ट हो जाते हैं |

2. क्यूं किसी को मारना ? जब उसे जिन्दा नहीं कर सकते...!

3. जे रत लागे कापड़े, जामा होई पलीत | ते रत पीवे मानुषा, तिन क्यूं निर्मल चीत ||

(अर्थात जिस खून के लगने से वस्त्र-परिधान अपवित्र हो जाते हैं, उसी रक्त को मनुष्य पीता है | फिर उसका मन निर्मल कैसे हो/ रह सकता है ?

- गुरुनानक साहब

गुरुवाणी गुरुमुखों के लिए अन्न पानी खानेका आदर्श रखती है ।

गुरु अर्जुन देव जी ने परमात्मा से सच्चा प्रेम करने वालों की समानता हंस से की है और दूसरों को बगुला बताया है ।

आपने बताया हंसों की खुराक मोती है और बगुलों की मछली, मेंढक ।

हंसा हीरा मोती चुगणा, बगु डडा भलण जावै ।

(आदि gp-थ पृ. 96०)

हिंसा की मनाही व जीव-दया के बारे में गुरुवाणी स्पष्ट शब्दों में कहती है ।

हिंसा तउ मन ते नहीं छूटी जीए दइआ नहीं पाली

(आदि गन्ध पृ. 1253)

कबीर साहब ने जो अहिंसा व दया की शिक्षा दी व मांस खाने की प्रतारणा की वह आदिग-थ में विभिन्न पृष्ठों पर दी हुई है ।

गुरु साहबानों ने स्पष्ट रूप से हिंसा न करने का आदेश दिया है और जब हिंसा ही मना है तो मांस मछली खाने का सवाल ही नहीं उठता

"कबीर भांग मछली सूरा पान जो जो प्राणी खाहिं तीरथ नेम ब्रत सब जे कीते सभी रसातल जाहिं "

(– श्री गुरुग्रन्थ साहब Ang 137 ")

जीव वधहु को धरम कर थापहु अधरम कहहु कत भाई आपन को मुनिवर कह थापहु काको कहहु कसाई "

(- श्री गुरुग्रन्थ साहब Ang 1103)

वेद कतेब कहो मत झूठे ,झूठा जो न विचारे - जो सब में एक खुदा कहु तो क्यों मुरगी मारे "

-श्री गुरुग्रन्थ साहब Ang 1350)

शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने गहरी खोज के बाद जो गुरु साहब के निशान तथा हुकम नामें पुस्तक के रूप में छपवाये है उनमें से एक हुक्मनामा यह है ।

पृष्ठ 103-हुक्म नामा न. 113

बाबा बन्दा बहादुर जी,मोहर फारसी देगो तेगो फतहि नुसरत बेदरिंग याफत अज नाम गुरु गोविन्द सिंह

१ ओंकार फते दरसनु सिरी सचे साहिब जी दा हुक्म है सरबत खालसा जउनपुर का गुरु रखेगा...

खालसे दी रहत रहणा भंग तमाकू हफीम पोस्त दारु कोई नाहि खाणा मांस मछली पिआज ना ही खाणा चोरी जारी नारही करणी ।

अर्थात् मांस, मछली, पिआज, नशीले पदार्थ, शराब इत्यादि क़ी मनाई की गई है ।

सभी सिख गुरुद्वारों में लंगर में अनिवार्यत : शाकाहार ही बनता है ।

घर में जो मानुष मरे, बाहर देत जलाए, आते हैं फिर घर में, औघट घाट नहाय, बाहर से मुर्दा लावें, नून मिर्च घी डाल, उसे घर माहिं पकावें, कहे कबीरदास उसे फिर भोग लगावें, घर - घर करें बखान, पेट को कबर बनावें |

संत कबीर जी कहते हैं की :-

कि घर में जो परिजन मर जाता है, उसे तो लोग तुरन्त शमशान ले जाकर फूँक आते हैं | फिर वापिस आकर खूब अच्छी तरह से मल - मल कर नहाते हैं | मगर विडम्बना देखो, नहाने के थोड़ी देर बाद, बाहर से (किसे मरे जानवर का ) मुर्दा उठाकर घर में ले आते हैं | खूब नमक, मिर्च और घी डालकर उसे पकाते हैं | तड़का लगाते हैं और फिर उसका भोग लगाते हैं | बात इतने पर भी ख़त्म नहीं होती | आस - पड़ोस में, रिश्तेदार या मित्रों के बीच उस मुर्दे के स्वाद का गा - गाकर बखान भी करते हैं | मगर ये मूर्ख नहीं जानते ,जाने - अनजाने ये अपने पेट को ही कब्र बना बैठे हैं!

फिर भी अगर जो लोग मांस खाते हैँ वह सरासर गुरु नानक साहाब, गुरु गोविँद सिँह साहाब, और संत कबिर जी का अपमान करते हैँ...





{चेतावनी :- इस लेख में दिये सबुत सिख धर्म के ग्रंथो से लिये गये हैँ, तथा लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं, इस लेख से आपकी स्वार्थी भावनाओँ को ठेस पहुंची हो तो क्षमा करे...}

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मुसलमानोँको नहीँ हैँ मांसाहार खाने की अनुमति - भ्रम का पर्दाफास

9 Feb 2015

पैगम्बर शाकाहारी थे: आपको यह जानकार आश्चर्य होगा कि इस्लाम धर्म के संस्थापक मो. पैगम्बर शाकाहारी थे, कहा जाता है कि जब पैगम्बर साहब मक्का-मदीना यात्रा पर गए थे, तो उन्होने वहां भी किसी जानवर की बलि नहीं दी थी। उनका मानना था कि किसी जीव के मृत शरीर से इंसान अपना खाली पेट कभी नहीं भर सकता है।

इस्लाम का आधिकारिक रंग हरा है: इस्लाम का आधिकारिक रंग हरा है जो शाकाहार का प्रतीक है, जो जानवरों को स्वतंत्र और फल व सब्जी खाने के लिए प्रेरित करता है। कुरान में भी वर्णन किया गया है कि जानवर, मानव की तरह ही होते हैं जिन्हे शोषित करना उचित नहीं है।

अरब ने मांसाहार को बढावा दिया: अरब ने ही मांसाहार को बढावा दिया है, क्योंकि वहां के लोगों के पास भोजन के साधन सीमित थे और ऐसा भी कहा जाता है कि कई लोगों ने इसी वजह से इस्लाम को स्वीकार भी कर लिया था। वरना इस्लाम धर्म शाकाहार को ही समर्थन देता था।

पहले पशुओं की हत्या उचित नहीं मानी जाती थी: इस्लाम में पहले स्वाद के लिए पशुओं की हत्या उचित नहीं मानी जाती थी, उन्हे किसी भी खुशी के अवसर पर हलाल नहीं किया जाता था, लेकिन एक बार ऐसा होने के बाद यह उनके जलसे का हिस्सा बन गया और वह इसे मीट के नाम पर खाने लगे। हालांकि उनका धर्म भी पशु हत्या के पक्ष में नहीं है।

विवशताकी अनुमति और उसका दुरपयोग *

रहे पशु,उन्हें भी उसी ने पैदा किया,जिसमें तुम्हारे लिए ऊष्मा प्राप्त करने का सामान भी है और हैं अन्य कितने ही लाभ। उनमें से कुछ को तुम खाते भी हो...

(कुरआन16:5)

*

और निश्चय ही तुम्हारे लिए चौपायों में भी एक शिक्षा है। उनके पेटों में जो कुछ है उसमें से हम तुम्हें पिलाते है। औऱ तुम्हारे लिए उनमें बहुत-से फ़ायदे है और उन्हें तुम खाते भी हो

(कुरआन 23:21)

यहां ईश्वर जानवरों को,ऊन दूध आदि के लिये पैदा करनें की तो जिम्मेदारी तो लेते है, पर खाने की क्रिया और कर्मकी पूरी जवाब देही बंदे पर ही छोड़ते है। आशय साफ है, अल्लाह कहते है, उन्हें ऊन दूध के लिए हमने पैदा किया, पर 'कुछ को तुम खाते हो'

यह तो अनुमति भी नहीं है, यह सीधे सीधे आपकी आदतों का निर्देश मात्र है। यह अल्लाह का अर्थपूर्ण बयान है।

निशानी बिलकुल ऐसा ही निर्देश शराब के लिये भी है,जब इस उपदेश के आशय में समझदार होकर, शराब को हेय माना गया है, तो उसी आशय के रहते, विवेक अपना कर, मांसाहार को हेय क्यों नहीं माना जाता?

देखिए यह दोनो तुलनात्मक आयतें………… *

और निश्चय ही तुम्हारे लिए चौपायों में भी एक शिक्षा है। उनके पेटों में जो कुछ है उसमें से हम तुम्हें पिलाते है। औऱ तुम्हारे लिए उनमें बहुत-से फ़ायदे है औरउन्हें तुम खाते भी हो

(कुरआन -23:21)

* और खजूरों और अंगूरों के फलों से से बनी शराब भी,जिससे तुम नशा भी करते हो और अच्छी रोज़ी भी। निश्चय ही इसमें बुद्धि से काम लेने वाले लोगों के लिए एक बड़ी निशानी है

(कुरआन -16:67)

शराब के लिए तो शिक्षा या निशानी निषेधात्मक ग्रहण की गई है पर मांसाहार के लिए निषेध नहीं ? क्यों नहीं?

“बुद्धि व विवेक से काम लेने वालों के लिए यह भी एक बड़ी निशानी है” सुनिश्चित है कि कुर्बानी या पशुबलि सच्चा त्याग नहीं है।

खुदा को तो इन्द्रिय इच्छाओं और मोह का त्याग प्रिय है।

अपनी ही सन्तति – सम्पत्ति की जानें नहीं। जानवर तुम्हें प्रिय होता तो उसकी जान न लेते। और तुम्हें अल्लाह प्रिय होता तो उसके प्रिय जानवर की जान भी न लेते। एक ही दिन लाखों निरीह प्राणियों की हिंसा? कहीं से भी ‘शान्ति-धर्म’के योग्य नहीं है।

शान्ति के संदेश (इस्लाम) को हिंसा का पर्याय बना देना उचित नहीं है। इस्लाम, हिंसा का प्रतीक नहीं हो सकता। यह मज़हब मांसाहार का द्योतक नहीं है। यदि इस्लाम शब्द के मायने ही शान्ति है तो वह शान्ति समस्त जगत के चर-अचर जीवों के लिए भी आरक्षित होनी चाहिए।

करूणावान अल्लाह कहते है-

न उनके मांस अल्लाह को पहुंचते हैं और न उनके रक्त। किंतु उसे तुम्हारा तक्वा (धर्मपरायणता) पहुंचता है।

(क़ुरआन -22: 37)

धरती में चलने-फिरनेवाला कोई भी प्राणी हो या अपने दो परो से उड़नवाला कोई पक्षी, ये सब तुम्हारी ही तरह के गिरोह है। हमने किताब में कोई भी चीज़ नहीं छोड़ी है। फिर वे अपने रब की ओर इकट्ठे किए जाएँगे

(क़ुरआन-6: 38)

इसमें अल्लाह नें स्पष्ट बयान किया है कि प्राणी (जानवर) और पक्षी मनुष्य के समान ही इसी गिरोह (समुदाय) के ही है। सभी रब की ओर इकट्ठे किए जाएँगे। अर्थात् निर्णायक दिन,सभी समान रूप से अल्लाह के प्रति जवाब देह होगें। अपने गुनाहों का फल भी भोगेंगे और मनुष्य की तरह न्याय मांगने के अधिकारी होंगे ।

हिंसाचार व मांसाहार इस्लाम की पहचान नहीं है। न ही इस्लाम का अस्तित्व, मात्र मांसाहार पर टिका है। इस्लाम का अस्तित्व उसके ईमान आदि सदाचारों से ही मुक्कमल है। हिंसा से तो कदापि नहीं। सच्चा त्याग अथवा कुरबानी, विषय वासनाओं,इच्छाओं और मोह के त्याग में है।

मनुष्य होने के कारण पैदा हुई मालिकियत के साथ इस भाव कि - ‘प्राणी के प्राण हमारे हाथ’ की अहंतुष्टि के त्याग में है। क्योंकि यह तृष्णाएं ही हमें सर्वाधिक प्रिय लगती है। इन्ही प्रिय इच्छाओं का त्याग,सच्चे अर्थों में कुरबानी है। हजरत इब्राहिम में लेश मात्र भी विषय-वासना आदि दुर्गुण नहीं थे। जब दुर्गुण ही नहीं थे तो त्यागते क्या? उन्हें पुत्रमोह था। मज़हब प्रचार के लिए उन्हें पुत्र से अपेक्षा थी इसलिए पुत्र ही उनका प्रियपात्र था। सो उन्होंने उसे ही त्यागने का निर्णय लिया। पर आज हमारे लिए प्रिय तो हमारे ही दुर्गुण बने हुए है। हिंसाचार, दिखावा, धोखेबाज़ी को ही हमने हमारा प्रिय शगल बना रखा है। यही दुर्गुण त्यागने योग्य है । बलि दुर्गुणों की दी जानी चाहिए। निर्दोष निरीह प्राणियों की नहीं।

यद्यपि अधिकांश मुस्लिम मांसाहारी होते हैं, परन्तु इस्लाम के सूफी संत मौलाना रूमी ने अपनी मसनवी में मुसलमानों को अहिंसा का उपदेश दिया है, वह कहते हैं,

"मी आजार मूरी कि दाना कुशस्त, कि जां दारद औ जां शीरीं खुशस्त"

अर्थात - तुम चींटी को भी नहीं मारो, जो दाना खाती है, क्योंकि उसमे भी जान है, और हरेक को अपनी जान प्यारी होती है.

1. हजरत रसूल अल्लाह सलल्लाह अलैह व वसल्लम ताकीदन फरमाते हैं कि जानदार को जीने व दुनिया में रहने का बराबर व पूरा हक है | ऐसा कोई आदमी नहीं है जो एक गौरैयां से छोटे कीड़े की भी जान लेताहै | खुदा उससे इसका हिसाब लेगा और वह इन्सान जो एक नन्हीं सी चिड़िया पर भी रहम करता है , उसकी जान बचाता है, अल्लाह कयामत के दिन उस पर रहम करेगा |

2. कोई भी चलने वाली चीज या जानदार, अल्लाह से बनायी है और सबको खाने को दिया है और यह जमीन उसने जानदारों (प्राणियों) के लिए बनायी है |

3. आदमी अपनी गिजा (खाने) की तरफ देखे कि कैसे हमने बारिश को जमीन पर भेजा, जिससे तरह-तरह के अनाज, अंगुर, फल-फूल, हरियाली व घास उगती है | ये सब खाने किसके लिए दिये गये है - तुम्हारे और तुम्हारे जानवरों के लिए |

4. क्या तुम नहीं देखते कि अल्लाह उन सबको प्यार करता है, जो जन्नत में है, जमीन पर है- चांद, सूरज, सितारे,पहाड़, पेड़, जानवर और बहुत से आदमियों को |

5. खुदा से डरो | कुदरत को बर्बाद मत करो | अल्लाह हरगुनाह को देखता है, इसलिए दोखज और सजा बनी है|

6 - जानवरों के लिए इस्लामी नजरिया, मौलाना, अहमद मसारी |

इस्लाम के सभी सूफी संतों ने नेक जीवन, दया, गरीबी व सादा भोजन व मांस न खाने पर बहुत जोर दिया है ।स्वयं भी वे सभी मांस से परहेज करते थे शेख इस्माइल, ख्वाजा मौइनुद्दीन चिश्ती, हजरत निजामुदीन औलिया, बू अली कलन्दर, शाहइनायत, मीर दाद, श्ट्टाह अज्दुल करीम आदि सूफी संतों का मार्ग नेक रहनी र आत्मसंयम, शाकाहारी भोजन व सब के प्रति प्रेम था,

उनका कथन हैं किताब याबीं दर बहिश्ते अरु जा, शक्कते बनुमाए व खल्के खुदा कि अगर तू -मुद्र; के लिये बहिश्त में निवास पाना चाहता है तो खुदा की खल्कत (सृष्टि) के साथ दया व हमदर्दी का बरताव कर । ईरान के दार्शनिक अल गजाली का कथन हैं कि रोटी के टुकड़ों के अलावा हम जो कुछ भी खाते है वह सिर्फ हमारी वासनाओं की पूर्ति के लिये होता है ।

प्रसिद्ध सन्त मीर दाद का कहना था कि जिस जीव का मांस काट कर खाते है; उसका बदला उन्हें अपने मांस से देना पड़ेगा । यदि किसी जीव की हड्डी तोड़ी है तो उसका भुगतान अपनी हड्डियों द्वारा करना होगा । दूसरे के बहाये गये खून की ?? प्रत्येक बूँद का हिसाब अपने खून से चुकाना पड़ेगा ।

क्योंकि यही अटल कानून है । महात्मा सरमद मांसाहार के विरोध में कहते हैं कि जीवन का नूर धातुओं में नींद ले रहा है, वनस्पति जगत में स्वप्न की अवस्था में है, पशुओं में वह जागृत हो चुका है और मनुष्य में वह पूरी तरह चेतन हो जाता है ।

कबीर साहिब मुसलमानों को संबोधित करके स्पष्ट करते हैं कि वे रोजे भी व्यर्थ और निष्फल है जिनको रखने वाला जिहवा के स्वाद के वश हो कर जीवों का घात करता है । इस प्रकार अल्लाह खुश नहीं होगा ।

रोजा धरै मनावै अलहु, सुआदति जीअ संघारै । आपा देखि अवर नहीं देखें काहे कउ झख मारै ।

लंदन मस्जिद के इमाम अल हाफिज बशीर अहमद मसेरी ने अपनी पुस्तक इस्लामिक कंसर्न अबाउट एनीमल में मजहब के हिसाब से पशुओं पर होने वाले अत्याचारों पर दु :ख प्रकट करते हुए पाक कुरान मजीद व हजरत मोहम्मद साहब के कथन का हवाला देते हुए किसी भी जीव जन्तु को कष्ट देने, उन्हें मानसिक व शारीरिक प्रतारणा देने, यहाँ तक कि पक्षियों को पिंजरों में कैद करने तक को भी गुनाह बताया है । उनका कथन हैं कि इस्लाम तो पेड़ों को काटने तक की भी इजाजत नहीं देता ।

इमाम साहब ने अपनी पुस्तक के पृष्ठ न. 18 पर हजरत मोहम्मद साहब का कथन इस प्रकर दोहराया है यदि कोई इन्सान किसी बेगुनाह चिड़िया तक को भी मारता है तो उसे खुदा को इसका जवाब देना होगा और जो किसी परिन्दे पर दया कर उसकी जान बखाता है तो अल्लाह उस पर कयामत के दिन रहम करेगा इमाम साहब स्वयं भी शाकाहारी है व सबको शाकाहार की सलाह देते है ।





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हिँदु, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बुद्ध, जैन, पारसी...सब धर्मो मेँ हैँ मांसाहार पर प्रतिंबध, तो आपका धर्म क्या हैँ ? क्या आप मांसाहारी होकर किसी धर्म मेँ होने का ढोँग तो नहीँ कर रहे हैँ...? (पर्याप्त सबुत)

15 Feb 2014

(पारसी धर्म)

जो दुष्ट मनुष्य पशुओं, भेड़ो अन्य चौपायों की अनीतिपूर्ण हत्या करता है, उसके अंगोपांग तोड़कर छिन्न-भिन्न किये जाएँगे|

- जैन्द अवेस्ता

( यहुदी धर्म )

पृथ्वी के हर पशु को और उड़ने वाले पक्षी को तथा उस हर प्राणी को जो धरती पर रेंगता है, जिसमें जीवन है, उन सबके लिए मैंने मांस की जगह हरी पत्ती दी है | जब तुम प्रार्थना करते हो, तो मैं उसे नहीं सुनता यदि तुम्हारे हाथ खून से रंगे हैं |

इन सभी धर्मों के ग्रंथों के वचनों से निर्विवाद रूप से यही बात सिद्ध होती है कि सदा स्वस्थ, निरोगी और दीर्घायु बने रहने के लिए हमें सात्विक भोजन अपनाने की और मांसाहार को त्यागने की जरुरत है,

क्योंकि मांसाहार के लिए मूक निर्दोष जीवों की हत्या होती है, जो महापाप है, दूसरे मांसाहार से अनेकों प्रकार के रोग हो जाते हैं, जैसा कि आजकल हो रहे हैं,





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बलात्कार "गलत सोच" से होते है, कम कपडे से नहीँ -श्रीमद्भगवत गिता...

14 Feb 2014

बलात्कार एक गलत सोच - गिता

 

कोई कहता हैँ, बलात्कार लडकीयोँ के कम कपडे पहनने से होते हैँ...

कोई कहता हैँ, लडकीयोँ के जिंस, और स्कर्ट पहनने से होता हैँ...

तो कोई कहता हैँ, लडकीयोँको बहार घुमने फिरने से होता हैँ...

राजनेता तो महीला सुरक्षा के वादे पुरे नहीँ कर पाते तो भी लडकी दोषी होती हैँ...

धर्म गुरु तो लडकीयोँ को मर्यादा मेँ रहना सिखाते हैँ...

तो आरोँपीयोँ के वकील लडकीयोँ को ही दोषी करार देते हुयेँ दलिले देते हैँ...

परंतु कोई भगवान के शब्दो पर गौर नहीँ करता...

मुझे तो आश्चर्य होता हैँ की धर्म गुरु भी भगवान श्रीकृष्ण के बातो को नहीँ समझे पायेँ...!

भगवान श्री कृष्णने श्रीमद्भगवतगिता मेँ बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों के बारे मेँ प्रत्यक्षरुप से वर्णन नहीँ किया हैँ परंतु समझनेवालेको ईशारा काफी होता हैँ ।

मैँने गिता तत्वज्ञान के मर्म का विचार कर के कुछ बाते ढुंड निकाली हैँ...

ध्यायतो विषयान्पुंसः संगस्तेषूपजायते । संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥

क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः । स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥

{गिता अध्याय - 2, श्लोक - 62 और 63 }

अर्थात, हे अर्जुन ! विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है, आसक्ति से उन विषयों की वासना उत्पन्न होती है और वासना में विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है ॥2-62॥

क्रोध से अविवेक अर्थात भ्रान्ति निर्माण होती हैँ, भ्रान्ति से स्मृति में भ्रम हो जाता है, स्मृति में भ्रम हो जाने से निश्चयात्मक बुद्धि अर्थात ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाने से यह पुरुष अपनी स्थिति से गिर जाता है अर्थात उसका पुर्णता पतन हो जाता हैँ ॥2-63॥

भगवान की बातो को समझे तो बलात्कार की प्रकिया मनसे शुरु होकार बुद्दी और इद्रीयोँ के तृप्तता पर जा कर खतम होती...

(1) विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष :- Mobile तथा TV पर Blue Flim, Hot Scenes, Nude Wallpapers देखना ।

(2) उन विषयों में आसक्ति हो जाती है :- आसक्ति याने बार बार उनको देखने की आदत पड जाना ।

(3) आसक्ति से उन विषयों की वासना उत्पन्न होती है :- आदत पड जाने से उन विषयोँ को अर्थात स्री भोग भोगने की वासना अर्थात इच्छा प्रबल जागृत होना ।

(4) वासना में विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है :- किसी लडकी तथा Girl Friend के साथ सबंध बनाने पर मना करने के कारण वासना मेँ विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है ।

(5) क्रोध से अविवेक अर्थात भ्रान्ति निर्माण होती हैँ :- अपुर्ण वासना से उत्पन्न हुये क्रोध से अविवेक अर्थात भ्रान्ति यानी सत्य-असत्य का ज्ञान नहीँ रहता ।

(6) भ्रान्ति से स्मृति में भ्रम हो जाता है :- वासना से क्रोध और क्रोध से अविवेक और अविवेक से स्मृति में भ्रम अर्थात स्मरणशक्ती का नाश हो जाता है और वह पुरुष यह भुल जाता हैँ बलात्कार जघन्य अपराधों है। जिसकी सजा उम्रकैद अथवा मौत तक हो सकती है।

(7) स्मृति में भ्रम हो जाने से निश्चयात्मक बुद्धि अर्थात ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है :- स्मरणशक्ती ना होने से मनुष्य विचार करने निश्चयात्मक शक्ति अर्थात ज्ञानशक्ती खो देता है और वासना तृप्ती के लिये प्रयत्न करने लगता हैँ ।

(8) बुद्धि का नाश हो जाने से यह पुरुष अपनी स्थिति से गिर जाता है अर्थात उसका पुर्णता पतन हो जाता हैँ :- अर्थात जब बुद्धि का नाश होता हैँ तो वह वासना तृप्ति के लिये बलात्कार जैसे अपराध कर बैठता हैँ...!

तथा लडकी को जिँदा जलाने जैसे जघन्य अपराध से उसका ही पतन होता हैँ ।

यह प्रक्रीया मन से शुरु होती है

इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते । तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ॥

{गिता अध्याय - 2, श्लोक - 67 }

जैसे जल में चलने वाली नाव को वायु हर लेती है, वैसे ही विषयों में विचरती हुई इन्द्रियों में से मन जिस इन्द्रिय के साथ रहता है, वह एक ही प्रमथन स्वभाववाली इन्द्रिय इस अयुक्त पुरुष की बुद्धि को हर लेती है ॥2-67॥

जब वह एक ही प्रमथन स्वभाववाली इन्द्रिय इस अयुक्त पुरुष की बुद्धि को हर लेती है तब वह पुरष आगे पिछे न सोच कर कुकर्म कर बैठता हैँ ।

लोग कहते हैँ की ज्ञानी और बुद्दिमान पुरष ये अपराध कैसे कर सकते हैँ, परन्तु उसका जवाब भी हैँ...

यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः । इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥

{गिता अध्याय - 2, श्लोक - 60 }

हे अर्जुन! आसक्ति का नाश न होने के कारण ये प्रमथन स्वभाव वाली इन्द्रियाँ यत्न करते हुए बुद्धिमान पुरुष के मन को भी बलात् हर लेती हैं ॥2-60॥

जब ये प्रमथन स्वभाव वाली इन्द्रियाँ बुद्धिमान पुरुष के मन को भी बलात् हर लेती हैं,

अर्थात पहले बलात्कारी के मन और बुध्दि पर ये इद्रियाँ बलात्कार करती हैँ...

[इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि- ये सब इसके वासस्थान कहे जाते हैं। यह काम (Sex) इन मन, बुद्धि और इन्द्रियों द्वारा ही ज्ञान को आच्छादित करके जीवात्मा को मोहित करता है। ॥ गिता 3-40॥ ]

...और ये सब होता हैँ गलत सोच से...

 

 

बलात्कार पर विरोध जताना, क्या एक दिखावा भर हैँ...?

 

जब बलात्कार होता है तब सडको पर मार्च निकाला जाता हैँ,

We Want Justice  जैसे नारे चलते हैँ...

पर... क्या फायदा जब कोई नयी फिल्म आती हैँ तो बिना Hot Bold Scences वाली फिल्म Floph करार दी जाती हैँ ।

कोई भी Director अपनी फिल्म मेँ Hotness चाहता हैँ, क्योँ की लोगो की खराब मानसिकता को यही पसंद हैँ ।

पहलेँ के जमाने मेँ छोटे बच्चो को Blue Flim देखने को नहीँ मिलती थी,

और आज कल तो पांचवी का बच्चा भी 20 रुपये वाला Net Pack डालकर सैकडो MMS देखता हैँ.

और फिर विषयासक्त होकर लडकीयोँ के Privete Parts को हमेशा घुरता रहता हैँ ।

 

स्कुलो में India is my country. All Indians are my brothers and sisters कहने के बाद किसी लड़की को ''माल'' कहने वालो को शरम आणि चाहिए...

शहरो मेँ जब कोई माँ अपने लडकी को School भेजती हैँ तो उसके मन एक डर सताता हैँ...

अथवा कोई लडकी Tuition से घर जल्दी नहीँ आती तो उसका पिता दरवाजे के तरफ ताकता रहता हैँ...

या कभी कभी तो भाई खुद College Drop कर देता हैँ...

पर मन का डर कभी भी खतम नहीँ होता...

ऐसा लगता कब कोई अनहोनी घटना ना घट जाये ...

 

क्यो ?  दुसरोँ के बहनोँ को "माल" कहने वाले लडके कभी अपने बहन को किसी द्वारा 'माल' कहने पर चिड जाते हैँ...

 

National Crime Records Bureau (NCRB) के 2014 मेँ हुये Count के मुताबिक हर दिन भारत मेँ 93 महिलाओँ, लडकीयोँ अथवा बच्चीयोँ से बलात्कार होता हैँ...

जो बलात्कार का आकडा 2012 मेँ 24,923 था, वह 2013 बढकर 33,707 होँ गया...

भारत मेँ 2009 - 2011 के बिच 68,000 से ज्यादा रेप हुयेँ है, लेकिन सिर्फ 16,000 अपराधी पकडे गये...

भारत मेँ 4 दिन की बच्चीसे लेकर 90 साल की बुजुर्ग महीला के साथ तक रेप हुये हैँ...

तथा साढे 17 साल के बलात्कारी की उमर देख कर उसे सिर्फ 3 साल की सजा दी जाती हैँ (निर्भया 2013)... और फिर भी हम कहते हैँ की मेरा भारत महान हैँ...

जागिये अब नहीँ जागेँगे तो कहीँ वह अनहोनी भविष्य मेँ आप के बेटी के साथ ना होँ...

और हां, लडीयोँको मर्यादा सिखाने से अच्छा हैँ आप अपने लडको को अच्छे संस्कार दे क्योँकी नियत कितनी भी अच्छी क्योँ न हो दुनिया आपको आपके दिखावे से ही जानती हैँ, और दिखावा कितना भी अच्छा क्योँ न हो भगवान आपको आपकी नियत से जानता हैँ ।…….

जिन्हे सचमुच बलात्कार मुक्त भारत चाहीये वह लोग क्यो नहीँ Porn Nude Internet का बहिश्कार करते, क्यो ऐसी फिल्मे और B,C Grede फिल्मो का बहिश्कार नहीँ करतेँ ? कोइ भी अपने Girl Friend का MMS बनाकर Web Site पर डालता है, तो कोई Facebook Page पर Nude Girls की तस्विरे डालकर भद्धी Comment करता हैँ । क्यो कोई सरकार या न्याय व्यवस्था इन सब पर भारत मेँ Ban नहीँ करता ?

जागिये, और बहिश्कार किजिये इन Porn, Nude और Hot Bollywood तथा Porn Nude Internet का ।

सोच बदलो देश बदलेगा,

 

अकेले नरेँद्र मोदी क्या क्या करेँगेँ ।

 





 

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जैन धर्म - मानवता का उदाहरण

13 Feb 2014

अहिंसा जैनधर्म का सबसे मुख्य सिद्धान्त है । जैन ग्रंथों में हिंसा के 108 भेद किये गये है ।

भाव हिंसा, स्वयं हिंसा करना, दूसरों के द्वारा करवाना अथवा सहमति प्रकट करके हिंसा कराना सब वर्जित है । हिंसा के विषय में सोचना तक पाप माना है । हिंसा, मन, वचन, व कर्म द्वारा की जाती है अत: किसी को ऐसे शब्द कहना जो उसको पीड़ित करे वह भी हिंसा मानी गई है । ऐसे धर्म में जहाँ जानवरों को बांधना, दु :ख पहुंचाना, मारना व उन पर अधिक भार लादना तक पाप माना जाता है ।

वहाँ मांसाहार का तो प्रश्न ही पैदा नहीं होता ।

हिंसा दो प्रकार की है- भाव हिंसा और द्रव्य हिंसा। किसी जीव को मारना द्रव्य हिंसा और मारने या दुःख देने का विचारमात्र मन में आना भाव हिंसा है। जैन धर्म के अनुसार किसी चींटी तक को जानकर या प्रमादवश मारना हिंसा कही गयी है। यह हिंसा मन, वचन, कार्य कृत स्वयं करना, दूसरे से करवाना, अनुमोदना करने करने का समर्थन करना, क्रोध, मान, माया, लोभ और संरभ हिंसा करने के लिए सामान जुटाना समारंभ की तैयारी करना आरम्भ के भेद से 100 प्रकार से हो सकती है।

जहाँ स्वयं हिंसा करना, दूसरों से करवाना तथा करते हुए अनुमोदन करना भी हिंसा है। क्रोध, मान, माया अथवा लोभ के कारण किसी के मन को दुखाना भी हिंसा है, वहाँ मांसाहार के समर्थन का तो प्रश्न ही नहीं उठाता।

जैनागम में कहा है-

“हिंसादिष्विहामुत्रपायावद्यदर्शनम्” “दुःखभेववा”

अर्थात... हिंसा, झूठ आदि पापों से इसलोक में राजदण्ड, समाजदण्ड, निन्दा आदि का कष्ट भोगने पडते हैं। अतः हिंसादि दुःख ही है। दुःख के कारण होने से इन्हें उपचार से दुःख जी कहा गया है।

प्राणियों के घात के बिना मांस की उत्पत्ति नहीं होती। अतः मांसभक्षी व्यक्ति के हिंसा अनिवार्य रूप से होती है।

यदि कोई कहे कि हम तो स्वयं मरे हुए जीवों का मांस खाते हैं, जब हम जीव को मारते ही नहीं हैं तो हमें हिंसा का दोष कैसे लगेगा?

आचार्य कहते हैं-

स्वयमेव मरे हुए भैंस, बैल आदि का मांस खाने से भी उस मांस के आश्रित रहने वाले उसी जाति के अनंत निगोदिया जीवों का घात होता है। अतः स्वयं मरे हुए जीवों का मांस खाने में भी हिंसा होती है।

पकी हुई, बिना पकी हुई अथवा पकती हुई मांस की डलियों में उसी जाति के सम्मूर्च्छन जीव निरंतर उत्पन्न होते रहते हैं। अतः जो व्यक्ति कच्ची अथवा पकी हुई मांस की डली खाता है अथवा छूता है, वह निरंतर एकत्रित किये हुए अनेक जाति के जीव समूह को मारता है।

जैन धर्म में प्राणी हत्या का निषेध जैन धर्म में तो छोटे बड़े सभी प्रकार के जीवों को मारने की घोर वर्जना की गई है

श्री वर्धमान महावीर जी ने कहा हैँ,

"सव्वे जीवा इच्छन्ति जीवियुं न मररिस्सयुं -तम्हा पाणि बहम घोरं निग्गन्ठा पब्बजन्ति च

"समण सुत्त गाथा -3

अर्थात... सभी जीव जीना चाहते हैँ, मरना कोई नहीं चाहता, इसलिए निर्ग्रन्थ (जैन) प्राणी वध की घोर वर्जना करते हैं...

1. अहिंसा परम धर्म है | किसी भी जीव की हिंसा मत करो, हिंसा करने वाले का सब धर्म-कर्म व्यर्थ हो जाता है |

2. संसार में सबको अपनी जान प्यारी है, कोई मरना नहीं चाहता, अतः किसी भी प्राणी की हिंसा मत करो |





{चेतावनी :- इस लेख में सारे सबुत जैन धर्म के ग्रंथो से लिये गये हैँ. तथा लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं, इस लेख से आपकी स्वार्थी भावनाओँ को ठेस पहुंची हो तो क्षमा करे...}

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बुद्ध धर्म के लोगोँ का मांसाहार खाना, क्या गौतम बुद्ध का अपमान करना नहीँ हैँ...?

12 Feb 2014

क्या महात्मा बुध्द की राह पर न चलना बुध्द का अपमान करना नहीँ हैँ ? क्या ये मुर्खता की पहचान नहीँ हैँ...?

मै बचपन एक बुद्ध धर्मी मित्र के घर गया था, तब उसके घर मेँ सब लोग "अंगुलीमाल" नामक एक फिल्म देख रहे थे, मैँने भी देखी...!

कथा के अनुसार, कुख्यात डाकु अंगुलीमाल जो इंसानो को मार कर उनकी अंगुलीया काट कर उनकी गलेँ मेँ माला पहनाता था ।

जब तथागत गौतम बुद्ध नेँ उसे कहा की,

"पेड के दो पत्ते तोड लाओ"

 वह ले आया...

उसके पत्ते तोड लाने पर गौतम बुध्द ने फिर कहा,

"इन पत्तो को फिर से पेड पर जोड आवो"

तब अंगुलीमाल बोला "यह कैसे संभव हैँ, भला तोडे हुये पत्ते वापस कैसे जोड सकता हुँ..."

उसके बाद त. गौतम बुद्ध ने उसे उपदेश किया की

"हेँ अंगुलीमाल ! तुम जोड नही सकते तो, तुम तोडते क्योँ हो...?"

स्पष्ट है ! अर्थात 'तुम कीसी मृत प्राणी मेँ प्राण वापस नहीँ ला सकते तो उसे मारते क्यो हो'...?

तब मै समझा की बुद्ध धर्म मेँ भी अहिँसा का पाठ पढाया जाता है परंतु बुद्ध धर्म को लोग जो बुद्धविहार मेँ जाकर ढोँग करते है और जानवरोँका मांस खा रहे हैँ, उनको मैँ कुछ कह नहीँ सकता था...

उस वक्त मेरे पास सबुत नहीँ थे, आज हैँ मैनेँ पढा हैँ इसिलिये लिखने की हिम्मत कर रहा हुं...

धम्मपद की गाथा “दण्ड्वग्गो’ मे तथागत बुद्ध कहते है

: १२९.

सब्बे तसन्ति दण्डस्स, सब्बे भायन्ति मच्चुनो। अत्तानं उपमं कत्वा, न हनेय्य न घातये॥

सभी दंड से डरते हैं । सभी को मृत्यु से डर लगता है । अंत: सभी को अपने जैसा समझ कर न किसी की हत्या करे , न हत्या करने के लिये प्रेरित करे ।

१३०.

सब्बे तसन्ति दण्डस्स, सब्बेसं जीवितं पियं। अत्तानं उपमं कत्वा, न हनेय्य न घातये॥

सभी दंड से डरते हैं । सभी को अपना जिवन प्रिय लगता है । अंत: सभी को अपने जैसा समझ कर न तो किसी की हत्या करे या हत्या करने के लिये प्रेरित करे ।

१३१.

सुखकामानि भूतानि, यो दण्डेन विहिंसति। अत्तनो सुखमेसानो, पेच्च सो न लभते सुखं॥

जो सुख चाहने वाले प्राणियों को अपने सुख की चाह से , दंड से विहिंसित करता है (कष्ट पहुँचाता है) वह मर कर सुख नही पाता है ।

१३२.

सुखकामानि भूतानि, यो दण्डेन न हिंसति। अत्तनो सुखमेसानो, पेच्च सो लभते सुखं॥

जो सुख चाहने वाले प्राणियों को अपने सुख की चाह से , दंड से विहिंसित नही करता है (कष्ट नही पहुँचाता है) वह मर कर सुख पाता है

बौद्ध धर्म के "पंचशील (यानी पांच प्रतिज्ञा)" में पहली प्रतिज्ञा हैँ,

"पाणाति पाता वेरमणी सिक्खा पदम समादियामि "

अर्थात "मैं किसी भी प्राणी को नहीं मारने की प्रतिज्ञा करता हूँ"...

स्पष्ट हैँ ! गौतम बुद्ध का मार्ग अहिसंक होते हुये भी मध्यमार्गीय रहा लेकिन वह व्यक्तिगत इच्छाओं की पूर्ति के लिये पशु हिंसा के पक्ष मे नहीँ थे ।

किसी भी प्राणी को मारे बिना मांस की प्राप्ति नहीं हो सकती, 

इसलिए तथागत बुद्ध ने हर प्रकार के जीवों की हत्या करने को पाप बताया है, और कहा है ऐसा करने वाले कभी सुख शांति प्राप्त नहीं करेंगे...

लंकावतार वे सूत्र के आठवें काण्ड के अनुसार - आवागमन के लम्बे क्रम के कारण प्रत्येक जीव किसी न किसी जन्म में किसी न किसी रूप में अपना सम्बंधी रहा होगा यह माना गया है । इसमें हर प्राणी को अपने बच्चों के समान प्यार करने का निर्देश है! बुद्धिमान व्यक्ति को आपातृकाल में भी मांस खाना उचित नहीं बताया गया -८

वही भोजन उचित बताया गया है जिसमें मांस व खून का अंश नही हो ।

1. जीवों को बचाने में धर्म और मारने में अर्धम है | मांस म्लेच्छों का भोजन है |

- त. गौतम बुद्ध

2. मांस खाने से कोढ़ जैसे अनेक भयंकर रोग फूट पड़ते है, शरीर में खतरनाक कीड़े पड़ जाते हैं, अतः मांसाहार का त्याग करें |

- लंकावतार सूत्र

3. सारे प्राणी मरने से डरते है, सब मृत्यु से भयभीत है | उन्हें अपने समान समझो अतः न उन्हें कष्ट दो और न उनके प्राण लो |

- त.गौतम बुद्ध

अगर हिम्मत हैँ तो जवाब दो...

की अपने सुख की चाह से मांस के लिये, जानवर को कष्ट पहुँचाने वालोँ क्या मर कर सुख पावोँगे...?

और क्या महात्मा बुध्द की राह पर न चलना बुध्द का अपमान करना नहीँ हैँ ? क्या ये मुर्खता की पहचान नहीँ हैँ...?

 

महाराष्ट्र के कुछ ढोँगी लोग, त. बुद्ध के साथ साथ बाबा साहेब आंबेडकर का भी अपमान करते हैँ...

13. मैं सभी जीवित प्राणियों के प्रति दया और प्यार भरी दयालुता रखूँगा तथा उनकी रक्षा करूँगा.

डाँ. बी आर अम्बेडकर द्वारा धम्म परिवर्तन के अवसर पर अनुयायियों को दिलाई गयीं 22 प्रतिज्ञाओँ मेँ से 13 वीँ...

वे कहते हैं की, हम प्राणियों को नहीं मारते सिर्फ मरा हुआ मुर्दा लेकर आते है...

तो भी मैं यही कहूँगा की  

किसी भी प्राणी को मारे बिना मांस की प्राप्ति नहीं हो सकती,

इसीलिए अगर इन्सान  मांस खाना बंद करे देंगे तो कोई प्राणियो को क्यों मारेगा...?





{चेतावनी :- इस लेख में बुद्ध धर्म के ग्रंथो के प्रमाण और लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं, इस लेख से आपकी स्वार्थी भावनाओँ को ठेस पहुंची हो तो क्षमा करे...सर्वाधार सुरक्षित}

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मांस खाने वाले लोग हिन्दु कहलाने के लायक हीँ नहीँ...?(शायद वो खुद को हिन-बुद्धी समझ सकते हैँ...)

8 Feb 2014

सात्विक आहार अपनाओ मांसाहार त्यागो !!

बड़े ही दुःख की बात है कि धार्मिक ज्ञान के अभाव, और पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव में आकर आजकल के हिन्दू युवा वर्ग में माँसाहारी भोजन करने का फैशन हो गया है, कुछ लोग तो अण्डों को वेजिटेरियन मानने लगे हैं, कुछ लोग तो केवल शौक के लिए चिकन, मछली और मीट खाने लगे हैं, इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि ऐसे लोग किसी न किसी रोग से ग्रस्त पाये गए हैं, आज ऐसे लोगों को उचित मार्गदर्शन की जरुरत है,

हिन्दू धर्मशास्त्रों मे एकमत से सभी जीवों को ईश्वर का वंश माना हैँ व अहिंसा, दया, प्रेम, क्षमा आदि गुणों को अत्यंत महत्व दिया, मांसाहार को बिल्कुल त्याज्य, दोषपूर्ण, आयु क्षीण करने वाला व पाप योनियों में ले जाने वाला कहा है ।

महाभारत के अनुशासन पर्व में भीष्म पितामह ने मांस खाने वाले, मांस का व्यापार करने वाले व मांस के लिये जीव हत्या करने वाले तीनों को दोषी बताया है ।

उन्होने कहा हैं कि

जो दूसरे के मांस से अपना मांस बढ़ाना चाहता है वह जहा कहीं भी जन्म लेता है चैन से नहीं रह पाता ।

जो अन्य प्राणियों का मांस खाते है वे दूसरे जन्म में उन्हीं प्राणियों द्वारा भक्षण किये जाते है । जिस प्राणी का वध किया जाता है वह यही कहता है

"मांस भक्षयते यस्माद भक्षयिष्ये तमप्यहमू"

अर्थात् आज वह मुझे खाता है तो कभी मैं उसे खाऊँगा ।

भगवान श्रीकृष्णने श्रीमद्भगवत गीता में भोजन की तीन श्रेणियाँ बताई है ।

(1) सात्त्विक भोजन-जैसे फल, सब्जी, अनाज, दालें, मेवे, दूध, मक्सन इत्यादि

जो अग्यु, बुद्धि बल बढ़ाते है व सुख, शांति, दया भाव, अहिंसा भाव व एकरसता प्रदान करते है व हर प्रकार की अशुद्धियों से शरीर, दिल व मस्तिष्क को बचाते हैं !

(2) राजसिक भोजन- अति गर्म, तीखे, कड़वे, खट्टे, मिर्च मसाले आदि जलन उत्पन्न करने वाले, रूखे पदार्थ शामिल है ।

इस प्रकार का भोजन उत्तेजक होता है व दु:ख, रोग व चिन्ता देने वाला है ।

(3) तामसिक भोजन -जैसे बासी, रसहीन, अर्ध पके,दुर्गन्ध वाले, सड़े अपवित्र नशीले पदार्थ मांस इत्यादि

जो इन्सान को कुसंस्कारों की ओर ले जाने वाले बुद्धि भ्रष्ट करने वाले, रोगों व आलस्य इत्यादि दुर्गुण देने वाले होते हैं ।

वैदिक मत प्रारम्भ से ही अहिंसक और शाकाहारी रहा है,

मासांहारी खाना खाने वाले हिंदु कहलाने के लायक ही नहीँ ऐसे लोग तो महान अपवित्र और घोर नरको मे पडते हैँ ।

भगवान श्रीकृष्णजी के अनुसार जो व्यक्ती मांसाहार का सेवन करता हैँ, वो तामसी और पापी व्यक्ती अधोगती अर्थात नरक को प्राप्त होता हैँ।

भगवान गिता के 17 वे अध्याय के 10 वे श्लोक मेँ कहते हैँ,

यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्‌। उच्छिष्टमपि#चामेध्यं भोजनंतामसप्रियम्‌॥

हे अर्जुन ! जो भोजन अधपका, रसरहित, दुर्गन्धयुक्त, बासी और उच्छिष्ट है तथा जो अपवित्र अर्थात मांसाहार भी है, वह भोजन तामस पुरुष को प्रिय होता है ॥10॥

[# च अमेध्यम् - मांस, अण्डे आदि हिँसामय और शराब ताडी आदी निषिध्द मादक वस्तुएँ - जो स्वभावसे ही अपवित्र हैँ अथवा जिनमेँ किसी प्रकारके सङदोषसे, किसी अपवित्र वस्तु, स्थान, पात्र या व्यक्तिके संगोगसे या अन्याय और अधर्मसे उपार्जित असत् धनके द्वारा प्राप्त होने के कारण अपवित्रता आ गयी हो - उन सभी वस्तुओँको "अमेध्य" कहते हैँ। ऐसे पदार्थ देव - पुजनमेँ भी निषिध्द माने गये हैँ। ]

फिर आप कहोगे की तामस रहने मेँ क्या बुराई हैँ तो तामस लोक कौनसी गती को प्राप्त होते हैँ, ये समझाते हुये भगवान गिता के 14 वे अध्याय के 18 वे श्लोक मेँ कहते हैँ।

ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः । जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥

हे अर्जुन !सत्त्वगुण में स्थित पुरुष स्वर्गादि उच्च लोकों को जाते हैं, रजोगुण में स्थित राजस पुरुष मध्य में अर्थात मनुष्य लोक में ही रहते हैं और तमोगुण के कार्यरूप निद्रा, प्रमाद और आलस्यादि में स्थित तामस पुरुष अधोगति को अर्थात कीट, पशु आदि नीच योनियों को तथा नरकों को प्राप्त होते हैं ॥18॥

शास्रोँ के अनुसार भोजन के दो प्रकार पडते हैँ, शाकाहार और मांसाहार, शाकाहार मनुष्यो का आहार हैँ और मांसाहार राक्षस, पशु, हिंसक जानवर का आहार हैँ। परन्तु मन्युष्य अगर मांसाहार का सेवन करेगा तो उसे भी राक्षस, कुत्ता ,कव्वा, गिधड, सिंह, बाघ, लोमडी, सियार, बिल्ली भी कहना पडेगा क्योँकी, मांसाहार उनका ही तो आहार हैँ। पुरे भारत मेँ दो हीँ ऐसे राज्य हैँ

जो भगवान श्रीकृष्णजीके वचनोँ का पालन करते हुये मांसाहार का सेवन नहीँ करते । गुजरात और राजस्थान,

परन्तु जो मांसाहार का सेवन करते जाते हैँ वो लोग गिता पढे बिना ही भगवान श्रीकृष्णका भक्त होने का ढिँढोरा पिटते रहते हैँ।

(जन्माष्टमी मेँ मुर्तिया स्थापित करते हैँ, सिर्फ दिखावे के लिये भागवत कथा सुनने जाते हैँ, दिखावे के लिये भजन करते हैँ, इत्यादी...)

उन लोगो के बारे भगवान गिता के 16 वे अध्याय के 20 वे श्लोक मेँ कहते हैँ।

आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि। मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्‌॥

हे अर्जुन! वे मूढ़ (मुर्ख) पुरुष मुझको कभी प्राप्त न होकर ही जन्म-जन्म में आसुरी योनि को ही प्राप्त होते हैं, फिर उससे भी अति नीच गति को ही प्राप्त होते हैं अर्थात्‌ घोर नरकों में पड़ते हैं ॥20॥

ऐसे लोग अपनी प्रवृति को कभी नहीँ बदलते...

मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः । राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ॥

वे व्यर्थ आशा, व्यर्थ कर्म और व्यर्थ ज्ञान वाले विक्षिप्तचित्त अज्ञानीजन राक्षसी, आसुरी और मोहिनी प्रकृति को ही धारण किये रहते हैँ॥GEETA 9-12॥

तथा कुछ लोग भगवान का कहना नहीँ मानते हुये मनमाना आचरण करते हैँ, उन लोगोँ के बारे भगवान कहते हैँ...

मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि। अथ चेत्वमहाङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥

हे अर्जुन! उपर्युक्त प्रकार से मुझमें चित्तवाला होकर तू मेरी कृपा से समस्त संकटों को अनायास ही पार कर जाएगा और यदि अहंकार के कारण मेरे वचनों को न सुनेगा तो नष्ट हो जाएगा अर्थात परमार्थ से भ्रष्ट हो जाएगा ॥GEETA 18-58॥

ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम्‌ । सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ॥

हे अर्जुन! परन्तु जो मनुष्य मुझमें दोषारोपण करते हुए मेरे इस मत के अनुसार नहीं चलते हैं, उन मूर्खों को तू सम्पूर्ण ज्ञानों में मोहित और नष्ट हुए ही समझ ॥GEETA 3-32॥

 

कुछ लोग सिर्फ ढोँग को प्राप्त होकर पांखड से दिखावे के लिये भागवत कथा सुनने जाते हैँ परन्तु श्रीमदभागवत् मेँ भी कहा गया हैँ,

श्रीमद्‌भागवत मे नरको की विभिन्न गतियोँका वर्णन करते हुये शुकदेवजी कहते हैँ...

'रुरु' सर्पसे भी अधिक क्रुर स्वभाववाले एक जीवका नाम हैँ ॥11॥

ऐसा ही महारौरव नरक हैँ । इसमेँ वह व्यक्ति जाता हैँ, जो किसीकी परवा न कर केवल अपने ही शरीरको पालता हैँ। मनुष्य शरीरमेँ मांस खाने वालेँ लोगोँ को 'रुरु' इनके भी मांसको काटते हैँ ॥12॥

जो क्रुर मनुष्य इस लोकमेँ अपना पेट पालने के लिये जीवित पशु या पक्षियोँको मार कर खाता हैँ, उस हृदयहीन, राक्षसोँसे भी गये बीते पुरुषको यमदुत कुम्भीपाक नरकमेँ ले जाकर खौलते हुए तैलमेँ रांधते हैँ ॥13॥

[श्रीमदभागवत् स्कन्ध 5, अध्याय 26, श्लोक 11,12,13]

धन - वैभव, कुलीनता, विद्या, दान, सौन्दर्य, बल और कर्म आदिके घमंड से अंधे हो जाते हैं तथा वे दुष्ट उन भगवत्प्रेमी संतो तथा ईश्वर का भी अपमान करते हैं ॥9॥

[श्रीमदभागवत् स्कन्ध 11, अध्याय 5, श्लोक 8,9] 

तथा जिस प्रकार वे मांसभोजी पुरुष पृथ्वी लोकमेँ प्राणीयोँ के मांस भक्षण करके आनन्दित होते थे, उसी प्रकार वे (यमदुत) भी उनका रक्तपान करते और आनन्दित होकर नाचते गाते हैँ ॥31॥

[श्रीमदभागवत् स्कन्ध 5, अध्याय 26, श्लोक 31]

पशुं विधिनालभ्य प्रेतभूतगणान् यजन । नरकानवशो जंतुर्गत्वा यात्युल्बणं तम: ॥

[श्रीमदभागवत् स्कन्ध 11, अध्याय 10, श्लोक 28]

अगर मनुष्य प्राणियोँको सताने लगे और विधी - विरद्ध पशुओँकी बलि देकर भुत और प्रेतोंकी उपासना मेँ लग जाय, तब तो वह पशुओंसे भी गया - बीता होकर अवश्य हीँ नरक मेँ जाता हैँ । उसे अन्त मेँ घोर अन्धकार स्वार्थ और परमार्थ से रहित अज्ञानमेँ ही भटकना पड़ता हैँ॥

वे कर्मका रहस्य न जाननेवाले मुर्ख केवल अपनी जीभको संतुष्ट करने और पेट की भूख मिटाने - शरीर पुष्ट करने के लिए बेचारे पशुओंकी हत्या करते हैं ॥8॥

 

अब वेदो मेँ कहे गये कथन भी देखिए -

य आमं मांसमदन्ति पौरूषेयं च ये क्रवि: ! गर्भान खादन्ति केशवास्तानितो नाशयामसि !!

(अथर्ववेद- 8:6:23)

-जो कच्चा माँस खाते हैं, जो मनुष्यों द्वारा पकाया हुआ माँस खाते हैं, जो गर्भ रूप अंडों का सेवन करते हैं, उन के इस दुष्ट व्यसन का नाश करो !

अघ्न्या यजमानस्य पशून्पाहि

(यजुर्वेद-1:1)

-हे मनुष्यों ! पशु अघ्न्य हैं – कभी न मारने योग्य, पशुओं की रक्षा करो |

अहिंसा परमो धर्मः सर्वप्राणभृतां वरः।

(आदिपर्व- 11:13)

-किसी भी प्राणी को न मारना ही परमधर्म है।

सुरां मत्स्यान्मधु मांसमासवकृसरौदनम् । धूर्तैः प्रवर्तितं ह्येतन्नैतद् वेदेषु कल्पितम् ॥

(शान्तिपर्व- 265:9)

-सुरा, मछली, मद्य, मांस, आसव, कृसरा आदि भोजन, धूर्त प्रवर्तित है जिन्होनें ऐसे अखाद्य को वेदों में कल्पित कर दिया है।

अनुमंता विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी । संस्कर्त्ता चोपहर्त्ता च खादकश्चेति घातका: ॥

(मनुस्मृति- 5:51)

प्राणी के मांस के लिए वध की अनुमति देने वाला, सहमति देनेवाला, मारने वाला, मांस का क्रय विक्रय करने वाला, पकाने वाला, परोसने वाला और खाने वाला सभी घातकी अर्थात हत्यारे हैं...

जातु मांस न भोक्तव्यं,प्राण कैसण्ठग तैरपि

(काशीखण्ड, 353-55)

प्राण चाहे कण्ठ तक ही क्यों न आ जाए, मांसाहार नहीं करना चाहिए |

महर्षि दयानन्द सरस्वती ने सत्यार्थ प्रकाश में कहा हैं कि - मांसाहार से मनुष्य का स्वभाव हिंसक हो जाता है । जो लोग मांस भक्षण व मद्यपान करते हैं उनके शरीर और वीर्यादि धातु भी दूषित होते हैं ।

मांस खाना सभी के लिए अनुचित है।

-आचार्य चाणाक्य

ऐसे लोग जो मनमाना आचरण करते है और कहते है की मरने के बाद नरक किसने देखा तथा शास्त्र की नहीं सुनते वह कभी भी सुख नहीं पा सकते...!

यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्‌॥

हे अर्जुन! जो पुरुष शास्त्र विधि को त्यागकर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है, वह न सिद्धि को प्राप्त होता है, न परमगति को और न सुख को ही॥GEETA 16-23॥

 

" हिन्दु हो तो मांस मत खाओ "

ऐसा कहने पर लोग कहते हैँ की " कुछ नहीँ होता यार, सब चलता हैँ... "

कालांतर के पत्श्यात उनके साथ कोई रोग या हादसा होता हैँ

तो वह भी भगवान से हीँ कहते हैँ की,

" हे भगवान ! ये क्या किया ...? ये क्या कर रहे हो ...? मैंने क्यों से पाप किये थे...?

तब शायद भगवान भी उपर से हसते हुये यही कहते होगेँ...

"कुछ नहीँ होता यार, सब चलता हैँ..."

तो मांसाहारी हिँदुओँ,

Sorry हिन-बुद्दिओँ जवाब दो ।




 

{Directed & Written By Sarangdhar Ambildhuke }



मांसाहारी और आतंकवादीयोँ की सोच एक जैसी ! - मांसाहार के समर्थन का मतलब मानवता का विरोध!

7 Feb 2014

जिस तरह ISIS बेकसूर लोगों को बर्बरता से मार रहा है, उसी तरह हम बेकसूर जानवरों को बर्बरता से मार रहे हैं. ISIS वाले कम से कम इंसानों को मारकर फेंक देते होंगे, खाते नहीं होंगे.

अगर जानवरों की भाषा हम समझ पाते तो हमें पता चलता कि वे भी हमें ISIS से कम ख़तरनाक आतंकवादी नहीं समझते हैं.

जिस तरह ISIS बेकसूर लोगों को बर्बरता से मार रहा है, उसी तरह हम बेकसूर जानवरों को बर्बरता से मार रहे हैं. ISIS वाले कम से कम इंसानों को मारकर फेंक देते होंगे, खाते नहीं होंगे.

लेकिन हम सभ्य शरीफ लोग न सिर्फ़ बेकसूर जानवरों को मार रहे हैं, बल्कि उन्हें खा भी रहे हैं.

इस लिहाज से देखा जाए तो जानवरों के संदर्भ में हम सब ISIS के आतंकवादियों से भी गए गुज़रे, बर्बर और ख़तरनाक हैं. मुझे लगता है कि लोगों में संस्कार भरने की ज़रूरत है. वे संस्कारहीन लोग हैं जो मांसाहार का समर्थन करते हैं. जब तक आदमी जंगली था, अगर तब तक वह भी जंगली जानवरों की तरह व्यवहार करता था और अपने से कमज़ोरों को मारकर खा जाता था, तो यह बात समझ में आती है.

लेकिन जब उसने जंगलों को पीछे छोड़ दिया, जंगलों से उसे इतनी नफ़रत हो गई कि उसने दुनिया भर में जंगल उजाड़ डाले, फिर भी सभ्यता और संस्कार उसे जंगलों वाला ही चाहिए, यह बात समझ में नहीं आती. मुझे लगता है कि मांसाहार का समर्थन करने वाले लोगों की सोच आज भी जंगली है.

मैं कभी यह समझ नहीं पाता कि अपनी जिह्वा के स्वाद के लिए या अपनी भूख या हवस मिटाने के लिए हम बेगुनाह जानवरों की हत्या कैसे कर सकते हैं?

किसी जीव का मांस खाना... वह भी स्वाद ले-लेकर... यह तो राक्षसी प्रवृत्ति है.

आख़िर हमें तय करना होगा कि राक्षस किसे कहें?

जो बेकसूर इंसानों को मारे अगर वह राक्षस, तो बेबस जानवरों को मारने वाला राक्षस क्यों नहीं?

यह कौन-सी मानवता है और यह कौन सा न्याय है कि हमें तो खाने-पीने तक की आज़ादी चाहिए, लेकिन दूसरे जीवों को जीने तक की आज़ादी नहीं हो?

अगर एक ही ईश्वर ने हमें भी बनाया है और उन्हें भी बनाया है, तो हम उनके जीने की आज़ादी का सम्मान क्यों नहीं कर सकते?

क्या सिर्फ़ इसलिए कि हम ताकतवर हैं, वे कमज़ोर हैं?

हम शातिर हैं, वे सरल हैं?

हम दुनिया के मालिक बन बैठे हैं और दूसरे सारे जीवों को हमने अपना सामान समझ लिया है?

अब हम जिस पर जो जुल्म करेंगे, सबको वह सहना होगा. राक्षसों, जंगली मनुष्यों, आक्रांताओं और आतंकवादियों की यही तो सोच होती है. हम उनसे अलग कहां हैं?

इंसान का दोगलापन देखिए. अपेक्षाकृत ताकतवर जानवरों मसलन बाघों, शेरों, चीतों, हाथियों का वे संरक्षण करते हैं,

लेकिन कमज़ोर जीवों जैसे गायों, बकरों, मुर्गों, कबूतरों, मछलियों इत्यादि को मारकर खा जाते हैं.

वे कह सकते हैं कि अगर इन्हें मारकर न खाएं तो इनकी आबादी बहुत बढ़ जाएगी.

इस दलील से तो इंसानों की आबादी विस्फोटक तरीके से बढ़ रही है, तो उनका कत्लेआम करने वालों का भी समर्थन किया जाना चाहिए?

वे, जो दुनिया भर में कत्लेआम कर रहे हैं, कहां कुछ ग़लत कर रहे हैं?

आबादी बढ़ेगी तो मारामारी बढ़ेगी! अफसोस कि इस दुनिया में चोरों, डकैतों, भ्रष्टों, लुटेरों, आतंकवादियों, उग्रवादियों, बंदियों, कैदियों सबके पास तरह-तरह के अधिकार हैं.

उनके भी मानवाधिकारों के नाम पर हर जगह बड़ी-बड़ी दुकानें खुली हुई हैं, लेकिन जिन जानवरों ने किसी का कुछ बिगाड़ा नहीं है, उनका न कोई अधिकार है, न उनके अधिकारों की बात करने वाले किसी व्यक्ति को इस राक्षसी दुनिया में सुना जाता है.

अगर हम अपने से कमज़ोर जानवरों के ख़िलाफ़ हिंसा और उन्हे मारकर खा जाने का समर्थन करते हैं, तो जब कोई ताकतवर अपने से कमज़ोर लोगों को सताता है, तो उसका किस आधार पर विरोध करते हैं? यही दोगलापन है.

अगर हमें अपने से कमज़ोर जानवरों को मारकर खा जाने का अधिकार है, तो फिर दुनिया में जो भी ताकतवर है, उसे अपने से कमज़ोर लोगों पर वह सारे ज़ुल्म करने का अधिकार है, जो अपने फ़ायदे के लिए वह कर सकता है.

ठीक है कि आपको जानवरों की भाषा समझ में नहीं आती. जब आप उन्हें काटते हैं, तो वे चीख-चीखकर जो कुछ भी कहते हैं, वह हिन्दी-उर्दू-अंग्रेज़ी-फ़ारसी किसी भी भाषा के दायरे में नहीं आती,

उसे लिपिबद्ध नहीं किया जा सकता, टीवी चैनलों पर ट्रांसक्राइव करके उसे दिखाया नहीं जा सकता, अखबारों के पन्नों पर उसे कोट-अनकोट की तरह छापा नहीं जा सकता,

लेकिन क्या आप उनकी कातर आंखों की भाषा भी नहीं समझते? जब काटे जाते वक्त वे चीखते हैं, छटपटाते हैं, डूबती आंखों से आपसे रहम की भीख मांगते हैं, तब भी आपका कलेजा नहीं पसीजता? ...

और अगर नहीं पसीजता, तो अपने आप को इंसान कहने और समझने में आपको शर्म नहीं आती?

किस बुनियाद पर आप ISIS, तालिबान, लश्कर के आतंकवादियों से बेहतर हैं, कृपया मुझे तफसील से समझाएंगे?

इसीलिए मैं एक ही बात कहूंगा कि मांसाहार का समर्थन मानवता का विरोध है.

मुझे उन धर्मगुरुओं पर भी तरस आती है, जो धर्म के आधार पर सिर्फ़ गायों या सूअरों या ऐसे ही कुछ चुनिंदा जानवरों की हत्या का विरोध करते हैं. हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई बौद्ध, जैन, पारसी- सबके धर्मों से ऊपर इंसानियत का धर्म है. ...और इसीलिए मेरी

दृष्टि में सिर्फ़ गायों-सूअरों की हत्या पर नहीं, सभी जीवों की हत्या पर रोक लगाई जानी चाहिए. सिर्फ़ दो-चार दिन के लिए नहीं, हमेशा-हमेशा के लिए रोक लगाई जानी चाहिए.

अगर किसी दिन इस देश में मेरी सरकार बन पाती,

तो मैं तो पूरे देश में मांस, मदिरा और हर तरह के नशीले पदार्थों के सेवन पर रोक लगा देता.

हमारी भारत-भूमि सदा नीरा नदियों और उर्वर माटी वाली धरती है. यहां खाने-पीने के विकल्पों की कोई कमी नहीं है, इसके बावजूद अगर हम खाने के लिए बेगुनाह बेबस कमज़ोर जीवों की हत्या करते हैं,

तो यह घनघोर शर्मनाक, अतार्किक, अमानवीय, राक्षसी और आतंकवादी सोच लगती है मुझे.

आप चाहे मेरी बात से सहमत हों या न हों, मैं पुरज़ोर तरीके से ऐसी सोच की भर्त्सना करता हूं.

दुनिया कोई भी धर्म मांसाहार का समर्थन नहीँ करता...

हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बुद्ध, जैन, पारसी...सब धर्मो मेँ हैँ मांसाहार पर प्रतिंबध, तो आपका धर्म क्या हैँ ? क्या आप मांसाहारी होकर किसी धर्म मेँ होने का ढोँग तो नहीँ कर रहे हैँ...? (पर्याप्त सबुत)

 

गर्व था भारत-भूमि को कि महावीर की माता हूँ।।

राम-कृष्ण और नानक जैसे वीरो की यशगाथा हूँ॥

कंद-मूल खाने वालों से मांसाहारी डरते थे।।

पोरस जैसे शूर-वीर को नमन 'सिकंदर' करते थे॥

चौदह वर्षों तक वन में जिसका धाम था।।

मन-मन्दिर में बसने वाला शाकाहारी राम था।।

चाहते तो खा सकते थे वो मांस पशु के ढेरो में।।

लेकिन उनको प्यार मिला 'शबरी' के झूठे बेरो में॥

चक्र सुदर्शन धारी थे गोवर्धन पर भारी थे॥

मुरली से वश करने वाले 'गिरधर' शाकाहारी थे॥

पर-सेवा, पर-प्रेम का परचम चोटी पर फहराया था।।

निर्धन की कुटिया में जाकर जिसने मान बढाया था॥

सपने जिसने देखे थे मानवता के विस्तार के।।

नानक जैसे महा-संत थे वाचक शाकाहार के॥

उठो जरा तुम पढ़ कर देखो गौरवमयी इतिहास को।।

आदम से गाँधी तक फैले इस नीले आकाश को॥

दया की आँखे खोल देख लो पशु के करुण क्रंदन को।।

इंसानों का जिस्म बना है शाकाहारी भोजन को॥

अंग लाश के खा जाए क्या फ़िर भी वो इंसान है?

पेट तुम्हारा मुर्दाघर है या कोई कब्रिस्तान है?

आँखे कितना रोती हैं जब उंगली अपनी जलती है।।

सोचो उस तड़पन की हद जब जिस्म पे आरी चलती है॥

बेबसता तुम पशु की देखो बचने के आसार नही।।

जीते जी तन काटा जाए, उस पीडा का पार नही॥

खाने से पहले बिरयानी, चीख जीव की सुन लेते।।

करुणा के वश होकर तुम भी शाकाहार को चुन लेते॥

शाकाहारी बनो...!

 





{चेतावनी :- इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं, इस लेख से आपकी स्वार्थी भावनाओँ को ठेस पहुंची हो तो क्षमा करे...}

 

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{Produced, Directed & Written By Sarangdhar Ambildhuke }





 

कुरान और गीता के कुछ फर्क-
1:-कुरान कहती है मुसलिम बनो,
1:- #गीता कहती है मनुष्य बनो,

 2:-कुरान के अनुसार जानबर हराम है उन्हे मार के खा जाओ,
2:- गीता के अनुसार जानवर और हर जीवित प्राणी की रक्षा करो, 

3:- कुरान कहती है बच्चे पैदा करो सुअर की तरह
3:- गीता कहती है नियत्रण रखो

 4:-कुरान कहती है इस्लाम के लिए जियो मरो
4:- गीता कहती है मनुष्य बनो इन्सानियत और देश के लिए जियो

  5:-कुरान कहती है आंतकबाद फैलाओ
 5:- गीता कहती है प्रेम फैलाओ 

6:-कुरान कहती है 4-4 शादीया करो
6:- गीता कहती है मर्यादा पुरुसुत्तम बनो (एक ही शादी)

 7:- कुरान कहती है दूसरे धर्म की लडकियो के साथ लवजिहद फैलाओ 72 हूर्यो मिलेगी
7:- गीता कहती है मर्यादा मे रहो 

8:-कुरान कहती है शिक्षा हराम है
 8:- गीता कहती है विध्या ग्यान जरूरी है

 9:-कुरान कहती है औरते हराम है
9:- गीता कहती है औरते दुर्गा का रूप है 

10:- कुरान-लडकियों को कैद कर के रखो
 10:- गीता- स्त्री को पुरुष के समान अधिकार दों 

11:-कुरान-औरते सिर्फ उपभोग के लिए है,
11:- गीता- स्त्री हमारे लिए पूजनीय् हैं,