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26 Aug 2016

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सनातन धर्म में है न्यूटन से पहले गुरुत्वाकर्षण का सिद्धान्त

28 Jul 2016

सनातन धर्म में है न्यूटन से पहले गुरुत्वाकर्षण का सिद्धान्त

 


 

 

न्यूटन से पहले हजारों सेब गिर चुके हैं.
आज हमें पढ़ाया जाता है कि गुरुत्वाकर्षण का सिद्धान्त न्यूटन (1642 -1726) ने दिया. यदि विद्यार्थी संस्कृत पढेंगे तो जान जाएंगे कि यह झूठ है.
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प्राचीन भारत के एक प्रसिद्ध गणितज्ञ भास्कराचार्य (1114 – 1185) के द्वारा रचित एक मुख्य ग्रन्थ सिद्धान्त शिरोमणि हैं।
भास्कराचार्य ने अपने सिद्धान्तशिरोमणि में यह कहा है-


आकृष्टिशक्तिश्चमहि तया यत् खस्थं गुरूं स्वाभिमुखं स्वशक्त्या ।
आकृष्यते तत् पततीव भाति समे समन्तात् क्व पतत्वियं खे ।।
– सिद्धान्त० भुवन० १६

अर्थात – पृथ्वी में आकर्षण शक्ति है जिसके कारण वह ऊपर की भारी वस्तु को अपनी ओर खींच लेती है । वह वस्तु पृथ्वी पर गिरती हुई सी लगती है । पृथ्वी स्वयं सूर्य आदि के आकर्षण से रुकी हुई है,अतः वह निराधार आकाश में स्थित है तथा अपने स्थान से हटती नहीं है और न गिरती है । वह अपनी कील पर घूमती है।
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वराहमिहिर ( 57 BC ) ने अपने ग्रन्थ पञ्चसिद्धान्तिका में कहा है-

पंचभमहाभूतमयस्तारा गण पंजरे महीगोलः।
खेयस्कान्तान्तःस्थो लोह इवावस्थितो वृत्तः ।।
– पञ्चसिद्धान्तिका पृ०३१

अर्थात- तारासमूहरूपी पंजर में गोल पृथ्वी इसी प्रकार रुकी हुई है जैसे दो बड़े चुम्बकों के बीच में लोहा ।
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अपने ग्रन्थ सिद्धान्तशेखर में आचार्य श्रीपति ने कहा है –

उष्णत्वमर्कशिखिनोः शिशिरत्वमिन्दौ,.. निर्हतुरेवमवनेः
स्थितिरन्तरिक्षे ।।
– सिद्धान्तशेखर १५/२१ )

नभस्ययस्कान्तमहामणीन­ां मध्ये स्थितो लोहगुणो यथास्ते ।
आधारशून्यो पि तथैव सर्वधारो धरित्र्या ध्रुवमेव गोलः ।।
–सिद्धान्तशेखर १५/२२


अर्थात -पृथ्वी की अन्तरिक्ष में स्थिति उसी प्रकार स्वाभाविक है, जैसे सूर्य्य में गर्मी, चन्द्र में शीतलता और वायु में गतिशीलता । दो बड़े चुम्बकों के बीच में लोहे का गोला स्थिर रहता है, उसी प्रकार पृथ्वी भी अपनी धुरी पर रुकी हुई है ।

 

 

यहाँ पर भास्कराचार्य ने सापेक्षता के सिद्धांत की भी एक झलक दिखा दी है जिसका वर्णन आइंस्टीन ने २० वीं सदी में जाकर किया | यह कहा जाये की विज्ञान के सारे आधारभूत आविष्कार भारत भूमि पर हमारे ऋषि मुनियों द्वारा हुए तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी|

भास्कराचार्य ने करणकौतूहल नामक एक दूसरे ग्रन्थ की भी रचना की थी। ये अपने समय के सुप्रसिद्ध गणितज्ञ थे। वे उज्जैन की वेधशाला के अध्यक्ष भी थे। उन्हें “मध्यकालीन भारत का सर्वश्रेष्ठ गणितज्ञ” कहा जाता है |
वे एक मौलिक विचारक भी थे। वह प्रथम गणितज्ञ थे जिन्होनें पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा था कि - "कोई संख्या जब शून्य से विभक्त की जाती है तो अनंत हो जाती है। किसी संख्या और अनंत का जोड़ भी अंनत होता है।"

इसके अलावा भास्कराचार्य ने ‘वासनाभाष्य (सिद्धान्तशिरोमणि का भाष्य) तथा भास्कर व्यवहार और भास्कर विवाह पटल नामक दो ज्योतिष ग्रंथ लिखे हैं। इनके सिद्धांत शिरोमणि से ही भारतीय ज्योतिष शास्त्र का सम्यक् तत्व जाना जा सकता है।

सर्वप्रथम इन्होंने ही अंकगणितीय क्रियाओं का अपरिमेय राशियों में प्रयोग किया। गणित को इनकी सर्वोत्तम देन चक्रीय विधि द्वारा आविष्कृत, अनिश्चित एकघातीय और वर्ग समीकरण के व्यापक हल हैं। भास्कराचार्य के ग्रंथ की अन्यान्य नवीनताओं में त्रिप्रश्नाधिकार की नई रीतियाँ, उदयांतर काल का स्पष्ट विवेचन आदि है।

भास्करचार्य को अनंत तथा कलन के कुछ सूत्रों का भी ज्ञान था। इनके अतिरिक्त इन्होंने किसी फलन के अवकल को "तात्कालिक गति" का नाम दिया और सिद्ध किया कि -

d (ज्या q) = (कोटिज्या q) . dq

जैसे की पहले ही लिख चुका है कि न्यूटन के जन्म के आठ सौ वर्ष पूर्व ही इन्होंने अपने गोलाध्याय में 'माध्यकर्षणतत्व' के नाम से गुरुत्वाकर्षण के नियमों की विवेचना की है। ये प्रथम व्यक्ति हैं, जिन्होंने दशमलव प्रणाली की क्रमिक रूप से व्याख्या की है। इनके ग्रंथों की कई टीकाएँ हो चुकी हैं तथा देशी और विदेशी बहुत सी भाषाओं में इनके अनुवाद हो चुके हैं।

इनकी पुस्तक करणकुतूहल में खगोल विज्ञान की गणना है। इसका प्रयोग आज भी पंचाग बनाने में किया जाता है.

"निश्चित रूप से गुरुत्वाकर्षण की खोज हजारों वर्षों पूर्व ही की जा चुकी थी, ‘विमान शास्त्र’ की रचना करने वाले महर्षि भारद्वाज को गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत के बारे में पता न हो ये हो ही नही सकता क्योंकि किसी भी वस्तु को उड़ाने के लिए पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति का विरोध करना अनिवार्य है। जब तक कोई व्यक्ति गुरुत्वाकर्षण को पूरी तरह नही जान ले उसके लिए विमान शास्त्र जैसे ग्रन्थ का निर्माण करना संभव ही नहीं  | अतएव गुरुत्वाकर्षण की खोज न्यूटन से हजारों वर्ष पूर्व ही की जा चुकी थी|

हमारी प्राचीन विद्वत परंपरा पर शंका का औचित्य ही नहीं| वर्तमान में हमें आवश्यकता है तथाकथित पाश्चात्य ज्ञान के पूर्वाग्रह से  विरत होने की| 

जय सनातन धर्म विज्ञानं

JNU - जेएनयु का पूरा सच

15 Feb 2016

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) की छवि न सिर्फ अंतरराष्ट्रीय स्तर के एक स्वतंत्र उच्च शिक्षण संस्थान की है बल्कि यहां हर तरह की अभिव्यक्ति और बहस के लिए जगह मिलती है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए जरूरी भी है लेकिन संसद पर हुए आतंकी हमले के दोषी अफजल गुरु की बरसी मनाकर उसे शहीद बताना और भारत विरोधी नारे लगे जैसी हरकतों को देश हित में नहीं कहा जा सकता है। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की स्थापना उच्च शिक्षा में शोध कार्यों को बढ़ावा देने के लिए की गई थी, लेकिन वर्तमान समय में चल रहे विवादों के बीच ऐसा लगता है कि यह भारत विरोधियों का किला बन गया है।

इससे पहले भी जेएनयू छात्र कई बार देश विरोधी गतिविरोधी गतिविधियों में पैरवी करते नजर आए। चाहे फिदायीन इशरत जहाँ का मामला हो या संसद हमले के जिम्मेदार अफजल गुरु का मामला हो या मुंबई हमलों के लिए जिम्मेदार याकूब मेमन की फाँसी का सवाल हो। विपक्षी कई बार आरोप लगाते रहे हैं कि जब कभी चीन की फौज विवादित क्षेत्र से भारत में घुस आती है या पाकिस्तान की सेना सीमा पार से हमारे जवानों पर हमला करती है तो इनकी आवाज देश हित में क्यों नहीं उठता।

जेएनयू में कथित हिंदू विरोधी ही नहीं हिंदुस्तान विरोधी करतूतों की एक लम्बी फेहरिस्त है। कभी तिरंगे का, तो कभी देवी-देवताओं का अपमान।

इन आयोजनों को देखने के बाद यह साफ समझा जा सकता है कि इसका उद्देश्य या तो भारतीय संस्कृति और भारतीय संविधान को नीचा दिखाना है या फिर सस्ती लोकप्रियता हासिल करना है।
  
परिसर में इन आयोजनों को देखते हुए जेएनयू पर देशविरोधी गतिविधियों को लेकर उठने वाली चिंता वाजिब ही है। वर्ष 2000 में करगिल में युद्घ लड़ने वाले वीर सैनिकों को अपमानित कर यहां चल रहे मुशायरे में भारत-निंदा का समर्थन किया। 26 जनवरी, 2015 को इंटरनेशनल फूड फेस्टिवल के बहाने कश्मीर को अलग देश दिखाकर उसका स्टाल लगाया गया। जब नवरात्रि के दौरान पूरा देश देवी दुर्गा की आराधना कर रहा था, उसी वक्त जेएनयू में दुर्गा का अपमान करने वाले पर्चे, पोस्टर जारी कर न सिर्फ अशांति फैलाई गई बल्कि महिषासुर को महिमामंडित कर महिषासुर शहादत दिवस का आयोजन किया गया।


इससे पहले 24 अक्टूरबर, 2011 को भी कावेरी छात्रावास में लार्ड मैकाले और महिषासुर: एक पुनर्पाठ विषय पर सेमिनार में दुर्गा के सम्बन्ध में अपमानजनक टिप्पणियों से मारपीट की भी नौबत आ गई थी।

यही नहीं जेएनयू छात्रों ने गौमांस फेस्टिवल मनाने की जिद पर अड़े संगठनों को दिल्ली उच्च न्यायालय रोक लगाई। सबसे हैरत की बात है कि जब 10 अप्रैल, 2010 को जब पूरा देश छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में नक्सलिओं के गोलियों से शहीद हुए 76 जवानों के गम में गमगीन था, उसी समय जेएनयू में जश्न मनाया जा रहा थे। यही नहीं उसका विरोध करने पर माओवादियों-नक्सलवादियों के प्रति सहानुभूति रखने वाले छात्रों ने उन पर हमला किया गया जिसमें में कई छात्र बुरी तरह घायल हो गए थे। छत्तीसगढ़, झारखण्ड सहित कुछ राज्यों के नक्सल प्रभावित इलाकों में सुरक्षा बलों द्वारा चलाए गए ऑपरेशन ग्रीन हंट नामक अभियान का विरोध जेएनयू छात्रों ने पर्चे और पब्लिक मीटिंग के जरिए की।

जब नवंबर 2005 में मनमोहन सिंह के भाषण में छात्रों ने नारेबाजी की और पर्चे फेंके तो भी इनके सहिष्णुता  पर सवाल उठाए गए थे। हंगामा इस कदर मचा था कि बीच बचाव के लिए पुलिस को आगे आना पड़ा। अगस्त 2008 में जब विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज विभाग में अमेरिका के अतिरिक्त सचिव रिचर्ड बाउचर को भारत-अमेरिका परमाणु समझौते के संबंध में बोलना शुरू किया तो लाल झण्डा उठाकर छात्रों ने अमेरिका हाय-हाय, परमाणु समझौता रद्द करो जैसे नारे लगाते हुए एस कदर हंगामा मचाया कि अंत में कार्यक्रम को ही स्थगित करना पड़ा और रिचर्ड बाउचर भी अपनी बात नहीं रख पाए थे।

जब 5 मार्च, 2011 को आयोजित एक सेमिनार जिसमें अरुंधती राय ने भाग लिया था, उसमें न सिर्फ भारत सरकार और संविधान के विरोध में नारे लगाए गए थे बल्कि बांटे गए पर्चे में जूते के तले राष्ट्रीय चिन्ह को दिखाया गया। यही नहीं 30 मार्च, 2011 और 2015 में को भारत-पाकिस्तान के बीच क्रिकेट विश्वकप के मैच में पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाए गए और भारत का समर्थन कर रहे छात्रों पर हमले किये गए। 24 अगस्त, 2011 को अन्ना आंदोलन के समय तिरंगे को फाड़कर पैरों से रौंदा भी गया।

विविधता में एकता भारत की सदियों पुरानी पहचान रही है। भारत में विभिन्न प्रकार के मत-मतान्तरों के बीच जिस प्रकार का सौहार्दपूर्ण सामाजिक तानाबाना देखने को मिलता है, वह शायद पूरी दुनिया में ढूंढने से भी दिखाई नहीं पड़ता। 2014 से पहले तक जेएनयू के कैंपस में इजरायल के किसी व्यक्ति यहां तक कि राजदूत तक का घुसना भी प्रतिबंधित हुआ करता था।

जहां तक वामपंथी विचारधारा की बात है तो न सिर्फ चीन की कम्युनिस्ट पार्टी बल्कि उत्तर कोरिया, वियतनाम, क्यूबा, चिली, वेनेजुएला या पूर्व सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टियों के किसी सदस्यों ने कभी देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त नहीं पाए गए।

कहा जाता है कि जेएनयू की स्थापना के समय की तत्कालीन इंदिरा गांधी की कांग्रेस सरकार ने अपने अनुकूल बौद्धिक माहौल तैयार करने, अपने वैचारिकता के अनुकूल इतिहास बनाने के लिए जेएनयू की स्थापना की थी। सत्ता पोषित सुविधा सत्तर के दशक की शुरुआत में जब इंदिरा गांधी को विरासत बचाने के लिए वामपंथियों की मदद लेनी पड़ी, वही वो वक्त था जब कम्युनिस्टों ने भी शिक्षण संस्थाओं पर कब्जा करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि इंदिरा गांधी के काल में लेफ्ट विचारधारा के लोगों को संस्थान में महत्वपूर्ण पदों पर बिठाया गया। लेकिन धीरे धीरे जेएनयू छात्र संगठन की ताकत लगातार बढ़ती गई और इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि एक बार यहां के छात्रों ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को परिसर के अंदर भी नहीं आने दिया था और लालकृष्ण आडवाणी को विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर ही रोक दिया था।

तब से लेकर आज तक जेएनयू में वैचारिक प्रतिनिधित्व के नाम पर एक ही विचारधारा का कब्जा रहा है? चाहे कश्मीर का मामला हो या उत्तर-पूर्व में नक्सल-माओवादी क्षेत्रों में सक्रिय हिंसा फैलाने वाले देशद्रोही और अलगाववादी ताकतों को समर्थन देने की, जेएनयू के छात्र संगठन हमेशा ही आगे नजर आते हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफेसर जी एन सार्इं बाबा हों या एसएआर गिलानी, खुफिया एजेंसियों ने कई बार इन्हे देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त पाया।

लेकिन यहां कई साकारात्मक बहसें भी देखा जा सकता है। इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ही कहा जा सकता है कि यहां समाज में छुपा लिए जाने वाले मुद्दों पर सीमा से आगे बढ़कर बहस की जाती रही है। चाहे वो समलैंगिकता की स्वतंत्रता पर बहस हो या महिलाओं को स्वछंद रहने और काम करने की आजादी का मद्दा यहां हर मुद्दे पर गंभीर बहस का आयोजन देखा जा सकता है।

जब दिल्ली भर में कांग्रेस सरकार की नाक के नीचे सिखों का कत्ल हो रहा था तब जेएनयू ने ही सिखों को शरण दी और देशभर में गुंडागर्दी का पर्याय बन चुकी छात्र राजनीति का शानदार नमूना भी पेश किया। इसी वैचारिक खुलेपन का आड़ लेकर कई बार अतिवादियों ने यहां से अपना एजेंडा भी चलाया। एंटी इस्टैब्लिशमेंट काम करना जेएनयू की परिपाटी रही है। परमाणु ऊर्जा, किसान आत्महत्या, भूमि अधिग्रहण, देश का औद्योगिकरण आदि मुद्दों पर इनका विरोध खुद तक सीमित रहा।

मांसाहार प्रचारकों के कुतर्कों का खण्ड़न ।

11 Feb 2016

मांसाहार प्रचारकों के कुतर्कों का खण्ड़न।

 

मांसाहारी प्रचारक:- - "पेड़ पौधों में भी जीवन"

“कुछ धर्मों ने शुद्ध शाकाहार अपना लिया क्यूंकि वे पूर्णरूप से जीव-हत्या से विरुद्ध है. अतीत में लोगों का विचार था कि पौधों में जीवन नहीं होता. आज यह विश्वव्यापी सत्य है कि पौधों में भी जीवन होता है. अतः जीव हत्या के सम्बन्ध में उनका तर्क शुद्ध शाकाहारी होकर भी पूरा नहीं होता.”

प्रत्युत्तर : अतीत में ऐसे किन लोगों का मानना था कि पेड़-पौधो में जीवन नहीं है? ऐसी 'ज़ाहिल' सभ्यताएं कौन थी? आर्यावर्त में तो सभ्यता युगारम्भ में ही पुख्त बन चुकी थी, अहिंसा में आस्था रखने वाली आर्य सभ्यता न केवल वनस्पति में बल्कि पृथ्वी, वायु, जल और अग्नी में भी जीवन को प्रमाणित कर चुकी थी, जबकि विज्ञान को अभी वहां तक पहुंचना शेष है। अहिंसा की अवधारणा, हिंसा को न्यून से न्यूनत्तम करने की है और उसके लिए शाकाहार ही श्रेष्ठ माध्यम है।

मांसाहारी प्रचारक:- - "पौधों को भी पीड़ा होती है"

“वे आगे तर्क देते हैं कि पौधों को पीड़ा महसूस नहीं होती, अतः पौधों को मारना जानवरों को मारने की अपेक्षा कम अपराध है. आज विज्ञान कहता है कि पौधे भी पीड़ा महसूस करते हैं …………अमेरिका के एक किसान ने एक मशीन का अविष्कार किया जो पौधे की चीख को ऊँची आवाज़ में परिवर्तित करती है जिसे मनुष्य सुन सकता है. जब कभी पौधे पानी के लिए चिल्लाते तो उस किसान को तुंरत ज्ञान हो जाता था. वर्तमान के अध्ययन इस तथ्य को उजागर करते है कि पौधे भी पीड़ा, दुःख-सुख का अनुभव करते हैं और वे चिल्लाते भी हैं.”

प्रत्युत्तर : हाँ, उसके बाद भी सूक्ष्म हिंसा कम अपराध ही है, इसी में अहिंसक मूल्यों की सुरक्षा है। एक उदा्हरण से समझें- यदि प्रशासन को कोई मार्ग चौडा करना हो, उस मार्ग के एक तरफ विराट निर्माण बने हुए हो, जबकि दूसरी तरफ छोटे साधारण छप्परनुमा अवशेष हो तो प्रशासन किस तरफ के निर्माण को ढआएगा? निश्चित ही वे साधारण व कम व्यय के निर्माण को ही हटाएंगे।  जीवन के विकासक्रम की दृष्टि से अविकसित या अल्पविकसित जीवन की तुलना में अधिक विकसित जीवों को मारना बड़ा अपराध है। रही बात पीड़ा की तो, अगर जीवन है तो पीडा तो होगी ही, वनस्पति जीवन को तो छूने मात्र से उन्हे मरणान्तक पीडा होती है। पर बेहद जरूरी उनकी पीडा को सम्वेदना से महसुस करना। सवाल उनकी पीड़ा से कहीं अधिक, हमारी सम्वेदनाओं को पहुँचती चोट की पीडा का है।जैसे कि, किसी कारण से बालक की गर्भाधान के समय ही मृत्यु हो जाय, पूरे माह पर मृत्यु हो जाय, जन्म लेकर मृत्यु हो, किशोर अवस्था में मृत्यु हो, जवान हो्कर मृत्यु हो या शादी के बाद मृत्यु हो। कहिए किस मृत्यु पर हमें अधिक दुख होगा? निश्चित ही अधिक विकसित होने पर दुख अधिक ही होगा। छोटे से बडे में क्रमशः  हमारे दुख व पीडा महसुस करने में अधिकता आएगी। क्योंकि इसका सम्बंध हमारे भाव से है। जितना दुख ज्यादा, उसे मारने के लिए इतने ही अधिक क्रूर भाव चाहिए। अविकसित से पूर्ण विकसित जीवन की हिंसा करने पर क्रूर भाव की श्रेणी बढती जाती है। बडे पशु की हिंसा के समय अधिक असम्वेदनशीलता की आवश्यकता रहती है, अधिक विकृत व क्रूर भाव चाहिए। इसलिए प्राणहीन होते जीव की पीड़ा से कहीं अधिक, हमारी मरती सम्वेदनाओं की पीड़ा का सवाल है।

मांसाहारी प्रचारक:- - "दो इन्द्रियों से वंचित प्राणी की हत्या कम अपराध नहीं !!!"

“एक बार एक शाकाहारी ने तर्क दिया कि पौधों में दो अथवा तीन इन्द्रियाँ होती है जबकि जानवरों में पॉँच होती हैं| अतः पौधों की हत्या जानवरों की हत्या के मुक़ाबले छोटा अपराध है.”

"कल्पना करें कि अगर आप का भाई पैदाईशी गूंगा और बहरा है, दुसरे मनुष्य के मुक़ाबले उनमें दो इन्द्रियाँ कम हैं. वह जवान होता है और कोई उसकी हत्या कर देता है तो क्या आप न्यायधीश से कहेंगे कि वह हत्या करने वाले (दोषी) को कम दंड दें क्यूंकि आपके भाई की दो इन्द्रियाँ कम हैं. वास्तव में आप ऐसा नहीं कहेंगे. वास्तव में आपको यह कहना चाहिए उस अपराधी ने एक निर्दोष की हत्या की है और न्यायधीश को उसे कड़ी से कड़ी सज़ा देनी चाहिए."

प्रत्युत्तर : एकेन्द्रिय  और पंचेन्द्रिय को समझना आपके बूते से बाहर की बात है, क्योकि आपके उदाहरण से ही लग रहा है कि उसे समझने का न तो दृष्टिकोण आपमें है न वह सामर्थ्य। किसी भी पंचेन्द्रिय प्राणी में, एक दो या तीन इन्द्रिय कम होने से, वह चौरेन्द्रिय,तेइन्द्रिय,या बेइन्द्रिय नहीं हो जाता, रहेगा वह पंचेन्द्रिय ही। वह विकलांग (अपूर्ण इन्द्रिय) अवश्य माना जा सकता है, किन्तु पाँचो इन्द्रिय धारण करने की योग्यता के कारण वह पंचेन्द्रिय ही रहता है। उसका आन्तरिक इन्द्रिय सामर्थ्य सक्रिय रहता है। जीव के एकेन्द्रीय से पंचेन्द्रीय श्रेणी मुख्य आधार, उसके इन्द्रिय अव्यव नहीं बल्कि उसकी इन्द्रिय शक्तियाँ है। नाक कान आदि तो उपकरण है, शक्तियाँ तो आत्मिक है।और रही बात सहानुभूति की तो निश्चित ही विकलांग के प्रति सहानुभूति अधिक ही होगी। अधिक कम क्या, दया और करूणा तो प्रत्येक जीव के प्रति होनी चाहिए, किन्तु व्यवहार का यथार्थ उपर दिए गये पीड़ा व दुख के उदाहरण से स्पष्ट है। भारतीय संसकृति में अभयदान देय है, न्यायाधीश बनकर सजा देना लक्ष्य नहीं है।क्षमा को यहां वीरों का गहना कहा जाता है, भारतिय संसकृति को यूँ ही उदार व सहिष्णुता की उपमाएं नहीं मिल गई। विवेक यहाँ साफ कहता है कि अधिक इन्द्रीय समर्थ जीव की हत्या, अधिक क्रूर होगी।

आपको तो आपके ही उदाह्रण से समझ आ सकता है………

कल्पना करें कि अगर आप का भाई पैदाईशी गूंगा और बहरा है, आप के दूसरे भाई के मुक़ाबले उनमें दो इन्द्रियाँ कम हैं। वह जवान होता है, और वह किसी आरोप में फांसी की सजा पाता है ।तो क्या आप न्यायधीश से कहेंगे कि वह उस भाई को छोड दें, क्यूंकि इसकी दो इन्द्रियाँ कम हैं, और वह सज़ा-ए-फांसी की पीड़ा को महसुस तो करेगा पर चिल्ला कर अभिव्यक्त नहीं कर सकता, इसलिए यह फांसी उसके बदले, इस दूसरे भाई को दे दें जिसकी सभी इन्द्रियाँ परिपूर्ण हैं, यह मर्मान्तक जोर से चिल्लाएगा, तडपेगा, स्वयं की तड़प देख, करूण रुदन करेगा, इसे ही मृत्यु दंड़ दिया जाय। क्या आप ऐसा करेंगे? किन्तु वास्तव में आप ऐसा नहीं कहेंगे। क्योंकि आप तो समझदार(?) जो है। ठीक उसी तरह वनस्पति के होते हुए भी बड़े पशु की घात कर मांसाहार करना बड़ा अपराध है।

यह यथार्थ है कि हिंसा तो वनस्पति के आहार में भी है। पर विवेक यह कहता है कि जितना हिंसा से बचा जाये, बचना चाहिये। न्यून से न्यूनतम हिंसा का विवेक रखना ही हमारे सम्वेदनशील मानवीय जीवन मूल्य है। वनस्पति आदि सुक्ष्म को आहार बनाने के लिए हमें क्रूर व निष्ठुर भाव नहीं बनाने पडते, किन्तु पंचेन्द्रिय प्राणी का वध कर अपना आहार बनाने से लेकर,आहार ग्रहण करने तक, हमें बेहद क्रूर भावों और निष्ठुर मनोवृति की आवश्यकता होती है। अपरिहार्य हिंसा में भी द्वेष व क्रूर भावों के दुष्प्रभाव से  अपने मानस को सुरक्षित रखना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए । यही तो भाव अहिंसा है। अहिंसक मनोवृति के निर्माण की यह मांग है कि बुद्धि, विवेक और सजगता से हम हिंसकभाव से विरत रहें और अपरिहार्य हिंसा को भी छोटी से छोटी बनाए रखें, सुक्ष्म से सुक्ष्मतर करें, न्यून से न्यूनत्तम करें, अपने भोग को संयमित करते चले जाएं।

अब रही बात जैन मार्ग की तो, जैन गृहस्थ भी प्रायः जैसे जैसे त्याग में समर्थ होते जाते है, वैसे वैसे, योग्यतानुसार शाकाहार में भी, अधिक हिन्साजन्य पदार्थो का त्याग करते जाते है। वे शाकाहार में भी हिंसा त्याग बढ़ाने के उद्देश्य से कन्दमूल, हरी पत्तेदार सब्जीओं आदि का भी त्याग करते है।और इसी तरह स्वयं को कम से कम हिंसा की ओर बढ़ाते चले जाते है।

जबकि मांसाहार में, मांस केवल क्रूरता और प्राणांत की उपज ही नहीं, बल्कि उस उपजे मांस में सडन गलन की प्रक्रिया भी तेज गति से होती है। परिणाम स्वरूप जीवोत्पत्ति भी तीव्र व बहुसंख्य होती है।सबसे भयंकर तथ्य तो यह है कि पकने की प्रक्रिया के बाद भी उसमे जीवों की उत्पत्ति निरन्तर जारी रहती है। अधिक जीवोत्पत्ति और रोग की सम्भावना के साथ साथ यह महाहिंसा का कारण है। अपार हिंसा और हिंसक मनोवृति के साथ क्रूरता ही मांसाहार निषेध का प्रमुख कारण है।

और भी भ्रम खण्डन-

कुतर्क और भ्रम-2





 

{चेतावनी :- इस लेख में दिये सबुत सिख धर्म के ग्रंथो से लिये गये हैँ, तथा लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं, इस लेख से आपकी स्वार्थी भावनाओँ को ठेस पहुंची हो तो क्षमा करे...}

[The All Rights Reserved By Writer ... ]

{Produced, Directed & Written By Sarangdhar Ambildhuke }





 

कुछ महत्वपूर्ण जानकारी शाकाहारियों के लिए भी

10 Feb 2016

 मांसाहार घृणित है

यह अब अधिकतर लोग जानने लगे हैं और शाकाहार अपनाने लगे हैं| यह एक अच्छा संकेत है| किन्तु हम शाकाहारी भी भ्रम में ही हैं कि हम पूर्णत: शाकाहारी हैं| शाकाहार के भ्रम में हम दैनिक जीवन में ऐसी बहुत सी खाद्द वस्तुओं का सेवन कर रहे हैं जिन्हें मांसाहार की श्रेणी में रखा जाना परम आवश्यक है| हम शाकाहारियों को पहले इन सब का त्याग करना होगा|

 

 

अधिकतर चॉकलेट Whey Powder से बनाई जाती हैं|  Cheese बनाने की प्रक्रिया में Whey Powder एक सहउत्पाद है| अधिकतर Cheese भी युवा स्तनधारियों के Rennet से बनाया जाता है| Rennet युवा स्तनधारियों के पेट में पाया जाने वाला एंजाइमों का एक प्राकृतिक समूह है, जो माँ के दूध को पचाने के काम आता है| इसका उपयोग Cheese बनाने में होता है| अधिकतर Rennet को गाय के बछड़े से प्राप्त किया जाता है, क्योंकि उसमे गाय के दूध को पचाने की बेहतर प्रवृति होती है|

(मित्रों यहाँ Cheese व पनीर में बहुत बड़ा अंतर है, इसे समझें|)

आजकल हम भी बच्चों के मूंह चॉकलेट लगा देते हैं, बिना यह जाने की इसका निर्माण कैसे होता है?

 

दरअसल यह सब विदेशी कंपनियों के ग्लैमर युक्त विज्ञापनों का एक षड्यंत्र है| जिन्हें देखकर अच्छे खासे पढ़े लिखे लोग इनके मोह में ज्यादा पड़ते हैं| आजकल McDonald, Pizza Hut, Dominos, KFC के खाद्द पदार्थ यहाँ भारत में भी काफी प्रचलन में हैं| तथाकथित आधुनिक लोग अपना स्टेटस दिखाते हुए इन जगहों पर बड़े अहंकार से जाते हैं| कॉलेज के छात्र-छात्राएं अपनी Birth Day Party दोस्तों के साथ यहाँ न मनाएं तो इनकी नाक कट जाती है| वैसे इन पार्टियों में अधिकतर लडकियां ही होती हैं क्योंकि लड़के तो उस समय बीयर बार में होते हैं|

मैंने भी अपने बहुत से मित्रों व परिचितों को बड़े शौक से इन जगहों पर जाते देखा है, बिना यह जाने कि ये खाद्द सामग्रियां कैसे बनती हैं? यहाँ जयपुर में ही मांस का व्यापार करने वाले एक व्यक्ति से एक बार पता चला कि किस प्रकार वे लोग मांस के साथ साथ पशुओं की चर्बी से भी काफी मुनाफा कमाते हैं| ये लोग चर्बी को काट काट कर कीमा बनाते हैं व बाद में उससे घी व चीज़ बनाते हैं| मैंने पूछा कि इस प्रकार बने घी व चीज़ का सेवन कौन करता है? तो उसने बताया कि McDonald, Pizza Hut, Dominos आदि इसी घी व चीज़ का उपयोग अपनी खाद सामग्रियों में करते हैं व वे इसे हमसे भी खरीदते हैं|

 

इसके अलावा सूअर के मांस से सोडियम इनोसिनेट अम्ल का उत्पादन होता है, जिससे भी खाने पीने की बहुत सी वस्तुएं बनती हैं| सोडियम इनोसिनेट एक प्राकृतिक अम्ल है जिसे औद्योगिक रूप से सूअर व मछली से प्राप्त किया जाता है| इसका उपयोग मुख्यत: स्वाद को बढाने में किया जाता है|

 

बाज़ार में मिलने वाले बेबी फ़ूड में इस अम्ल को उपयोग में लिया जाता है, जबकि १२ सप्ताह से कम आयु के बच्चों के भोजन में यह अम्ल वर्जित है|

इसके अतिरिक्त विभिन्न कंपनियों के आलू चिप्स व नूडल्स में भी यह अम्ल स्वाद को बढाने के लिए उपयोग में लाया जाता है| नूडल्स के साथ मिलने वाले टेस्ट मेकर के पैकेट पर इसमें उपयोग में लिए गए पदार्थों के सम्बन्ध में कुछ नहीं लिखा होता| Maggi कंपनी का तो यह कहना था कि यह हमारी सीक्रेट रेसिपी है| इसे हम सार्वजनिक नहीं कर सकते|

चुइंगम जैसी चीज़ें बनाने के लिए भी सूअर की चर्बी से बने अम्ल का उपयोग किया जाता है|

 

इस प्रकार की वस्तुओं को प्राकृतिक रूप से तैयार करना महंगा पड़ता है अत: इन्हें पशुओं से प्राप्त किया जाता है|

 

  • Disodium Guanylate (E-627) का उत्पादन सूखी मछलियों व समुद्री सेवार से किया जाता है, इसका उपयोग ग्लुटामिक अम्ल बनाने में किया जाता है|

  • Dipotassium Guanylate (E-628) का उत्पादन सूखी मछलियों से किया जाता है, इसका उपयोग स्वाद बढाने में किया जाता है|

  • Calcium Guanylate (E-629) का उत्पादन जानवरों की चर्बी से किया जाता है, इसका उपयोग भी स्वाद बढाने में किया जाता है|

  • Inocinic Acid (E-630) का उत्पादन सूखी मछलियों से किया जाता है, इसका उपयोग भी स्वाद बढाने में किया जाता है|

  • Disodium Inocinate (e-631) का उत्पादन सूअर व मछली से किया जाता है, इसका उपयोग चिप्स, नूडल्स में चिकनाहट देने व स्वाद बढाने में किया जाता है|

इन सबके अतिरिक्त शीत प्रदेशों के जानवरों के फ़र के कपडे, जूते आदि भी बनाए जाते हैं| इसके लिए किसी जानवर के शरीर से चमड़ी को खींच खींच कर निकाला जाता है व जानवर इसी प्रकार ५-१० घंटे तक खून से लथपथ तडपता रहता है| तब जाकर मखमल कोट व कपडे तैयार होते हैं और हम फैशन के नाम पर यह पाप पहने मूंह उठाए घुमते रहते हैं|

यह सब आधुनिकता किस काम की? ये सब हमारे ब्रेनवाश का परिणाम है, जो अंग्रेज़ कर गए|

अधिकतर जानकारी का स्त्रोत यहाँ व यहाँ है...





 {चेतावनी :- इस लेख में बुद्ध धर्म के ग्रंथो के प्रमाण और लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं, इस लेख से आपकी स्वार्थी भावनाओँ को ठेस पहुंची हो तो क्षमा करे...सर्वाधार सुरक्षित}

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शाकाहार बनाम मांसाहार : कुतर्कों का खण्ड़न

7 Feb 2016

१. हत्या है या नहीं है इस आधार पर

- शाकाहार में हत्या नहीं है (न फल लेने में / न फूल / न सब्जी - क्योंकि ये वस्तुएं पौधे की हत्या किये बिना ही मिलती हैं | इसी तरह न ही अन्न लेने में भी नहीं - क्योंकि अन्न मिलने के लिए काटे जाने से पहले ही वह पौधा अपना जीवन पूरा कर के सूख चूका होता है )

- मांसाहार में हत्या निश्चित है।

२. जो भाग भोजन के लिए मानव लेता है

- वह दोबारा उग सकता है ?

- शाकाहार में - हाँ |

- मांसाहार में - नहीं |

३. यदि मानव उस भाग को मूल जीव (पौधे या चल प्राणी से ) विलग न करे - तो क्या वह स्वयमेव विलग हो जाने वाला है ही समयक्रम में बिना उस प्राणी की मृत्यु के ? 

 - शाकाहार में (फल / फूल / पत्ते ) - हाँ   (श्री गीता जी में कृष्ण कहते हैं - पत्रं /पुष्पं / फलं / तोयं )

- मांसाहार में - नहीं।

४. क्या उस भाग को विलग किया जाना उस जीव को दर्द की और भय की अनुभूति देगा ?

ध्यान दीजिये - दर्द / भय की अनुभूति के लिए यह तर्क दिया जाता है कि पौधों में भी ठीक वैसा ही तंत्रिका तंत्र (neural system)  है - जिससे वे अनुभूति कर पाते हैं -| यह बात सच नहीं है | पेड़ों की तंत्रिका प्रणाली (nerves) एक रोबोट के संवेदक (sensors) की तरह हैं - उनको दर्द / भय / आदि की अनुभूति (feelings) इसलिये नहीं हो सकतीं - क्योंकि उनमे मस्तिष्क (brain) नहीं है्। हम जो भी महसूस करते हैं - वह सिर्फ इन्दिय अवयव (sense organs) और तंत्रिका (nerves) से नहीं | कान सुनते हैं, तंत्रिका (nerves) उस ध्वनि को दिमाग तक ले जाती हैं, किन्तु शब्द को मस्तिष्क (brain) पहचानता है | इसी तरह आँखों का देखना देखना नहीं है - वे सिर्फ दृश्य को रेटिना पर चिन्हित करती हैं - फिर ऑप्टिक नर्व (optic nerve) इस चिन्हित छवि को दिमाग तक ले जाती है - जहां छवि (image) पहचानी जाती है। यह बात सभी इन्द्रियों पर लागू है।| (sight hearing touch taste smell ) | तो दर्द और भय की अनुभूति सिर्फ तंत्रिका तंतु या nerves द्वारा नहीं हो सकती - इसलिए वे जीव जिनमे मस्तिष्क (brain) न हो - वे पीड़ा और भय आदि महसूस नहीं करते। और मस्तिष्क नन्हे से नन्हे चल प्राणी (जैसे कॉकरोच ) में भी होता है , जबकि विशाल से विशाल अचल प्राणी (जैसे बरगद के पेड़ ) में भी नहीं होता।

५. क्या ईश्वर के सृष्टि नियमो के अनुसार वह जीव ईश्वर के प्रदत्त  सौर उर्ज़ा स्रोत (Solarenergy source) से सीधा भोजन तैयार कर रहा है - अपनी निजी आवश्यकता से अधिक मात्रा में - जिससे दूसरे जीवों की आहार आवश्यकता पूरी हो सके ?

- पौधे - हाँ  (क्लोरोफिल संश्लेषण- chlorophyll - photosynthesis )

- चल जीव ( बकरे, मुर्गे आदि ) में - नहीं |

{ इस सिद्धांत का मात्र एक अपवाद (exception) है - गौ माता की पीठ में एक "सूर्य केतु नाडी" है , जो गाय के दूध को अमृत जैसे गुण प्रदान करती है }

६. क्या उस जीव द्वारा दिया गया भोजन एक बार लेने के बाद पुनः बन सकता है ?

-- फल फूल पत्तियां - हाँ ,

-- अन्न, कंद, मूल, मांसाहार - नहीं |

किन्तु - ध्यान दिया जाए कि

अन्न - 

(क) आप न भी लें - तो भी वह पौधा उस समय अपना जीवन काल पूर्ण कर के सूख ही चुका है - आपके अन्न लेने या न लेने से उसके जीवनकाल में कोई बदलाव नहीं आएगा , वह फिर से नहीं जियेगा |

(ख) अन्न देने वाले पौधे - जो मूलतः (basically) घास परिवार के हैं - गेंहू, चावल आदि - ये अपने बीज के रूप में अन्न बनाते हैं |

(ग) किन्तु, ये बीज न तो फल में हैं (आम की तरह ) जो इन्हें खाने वाले प्राणी इनके बीजों को कही और पहुंचा सकें, न इनमे उड़ने की शक्ति है कि ये हवा से फैलें , न ही किसी और तरह की फैलने की क्षमता | पौधों के प्रजनन में बीज के होने का जितना महत्व है, उतना ही उसके फैलने का जिससे वह कही और उग सके, या फिर रोपण का - जिससे वह वहीँ उग सके | ( क्योंकि पौधे अचल हैं, वे स्वयं तो कहीं जा कर अपने बीज रोप ही नहीं सकते ) तो - अन्न के जिस पौधे का जो स्थान है - वहीँ उसके बीज गिरेंगे - यदि मनुष्य न ले तो | तो वहीँ एक पौधे के सिर्फ एक ही बीज के पनपने की संभावना है | बाकी बीज वैसे भी - प्राकृतिक रूप से ही - नहीं पनपेंगे | ये पौधे सिर्फ पुनरुत्पत्ति (reproduction) के ही लिए बीज नहीं बनाते हैं - ये प्रजनन संभावना (reproductive possibility) से कई कई गुणा अधिक बीज बनाते हैं | वह इसलिए - कि ईश्वर ने इन्हें दूसरे प्राणियों को ( जो chlorophyll न होने से स्वयं सूर्य किरणों से भोजन नहीं बना सकते ) भोजन मुहैया कराने को ही ऐसा बनाया है कि ये अपनी प्रजनन (reproductive) ज़रुरत से कई गुणा अधिक बीज बनाएं |

(घ) जब उतनी ही जमीन पर उतने ही पौधे उगने हैं, यदि बीज को इंसान ले / या न ले - तो वह तो बीज अन्न रूप में लेकर भी इंसान कर ही रहा है | उतने बीज तो किसान अगले वर्ष की फसल को उतनी जमीन में फिर से बोयेगा ही - और नयी संतति उन पौधों की उतनी जमीन में उतनी ही संख्या में फिर भी उगेगी - जितनी मनुष्य के न लेने पर उगती |

(च) तथाकथित मांसाहार के समर्थक - जो इस आधार (basis) पर तुलना (comparison) करते हैं, वे भी मांसाहार को अन्न के पूरक की तरह नहीं, बल्कि शाक सब्जी के पूरक की तरह इस्तेमाल करते हैं - वे शाक सब्जियां - जो पौधों में पुनः पुनः फलती ही जाती हैं , और पौधे से बिना हत्या / बिना भय / बिना पीड़ा के प्राप्त होती हैं |

७. वह भोजन प्राप्त करने के लिए क्या किसी न किसी मनुष्य को किसी भी रूप में "हत्या / क्रूरता" ( एक चीखते/ रोते / जीवित रहने का प्रयास करते / तड़पते जीव का सर या गला काटना आदि ) करना पड़ा ?

- पौधों में - नहीं (अन्न के पौधे भी काटे जाते हैं - किन्तु तब जब वे पहले ही निर्जीव हो चुके होते हैं )

- चल प्राणियों में - हाँ |

 

८. क्या किसी एक आहार विकल्प (केवल शाकाहार या केवल मांसाहार) पर निर्भर रहते हुए मनुष्य जीवित रह सकता है ?

- शाकाहार - हाँ

- मांसाहार - नहीं।

९. क्या यह पूर्ण सन्तुलित आहार (complete balanced diet) है - अर्थात - मोटे तौर परकार्बोहाइड्रेट, वसा, प्रोटीन, खनिज, विटामिन, रेशे और जल (carbohydrates , fats , proteins , minerals , vitamins , fibre , water) सभी इससे मानव जीवन के लिए पर्याप्त मात्रा में मिल सकते हैं ?

- शाकाहार - सभी पोषक-तत्व संतुलित (nutrients balanced) रूप में मिलते है।|

- मांसाहार - केवल वसा और प्रोटीन (fats and proteins) | अन्य के लिए आपको मांसाहार  के साथ ही शाकाहार लेना ही पड़ेगा | क्योंकि मात्र मांसाहार पर कोई मनुष्य जीवित नहीं रह सकेगा।

ऐसे आहार पर सिर्फ मांसाहारी प्राणी (carnivorous animals) शेर /चीते आदि ही जी सकते हैं , मनुष्य नहीं।

 

११. क्या इसे पचाने के लिए हमारे पाचन तंत्र (liver / digestive system) पर जोर पड़ता है ? या अन्य प्रणाली - हमारी रक्त धमनियों पर, ह्रदय पर , गुर्दों आदि पर ?

- शाकाहार - नहीं, ये हमारे शारीरिक सिस्टम्स पर बिलकुल अतिरिक्त बोझ नहीं डालता, यह हल्का और सुपाच्य है |

- मांसाहार - हाँ - यह शरीर की हर प्रणाली (system) के लिए भारी है।|

शरीर में कोई भी छोटी बड़ी व्याधि आने पर डॉक्टर्स, खिचड़ी / फलों का रस / नारियल पानी (शाकाहारी पदार्थ) लेने को कहेंगे , उसे भी - जो आमतौर पर ये चीज़ें न खाता हो - क्योंकि ये चीज़ें शरीर की पाचन प्रणाली पर भारी नहीं पड़तीं | इससे उलट देखिये - अंडा / मांस / मछली (मांसाहारी चीज़ें ) यदि साधारण तौर पर व्यक्ति खाता भी हो - तो भी बीमारी ( छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी बीमारी ) में बंद करने को कहा जायेगा - भले ही कुछ ही दिनों को सही - क्योंकि ये चीज़ें हमारे हर प्रणाली (system) पर भारी पड़ती हैं।

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इन सब के अलावा भी - सात्विकता और तामसिकता का फर्क तो है ही।

यह स्थापित सत्य हैं कि जीव हत्या / जीव पीड़ा / जीव उत्पीडन / जीव क्रूरता के बिना मांसाहारी खाद्य पदार्थ प्राप्त किये ही नहीं जा सकते | मांस हर जीव का शरीर अपनी निजी जीवन यापन की आवश्यकता के लिए और उतनी मात्रा में ही बनाता है - दूसरे प्राणियों के लिए अतिरिक्त मात्रा में नहीं बनाता, मांस ले लिए जाने पर भी अपना जीवन निर्बाध रूप से जी ही नहीं सकता | ......... जबकि पौधे सूर्य की किरणों से - अपनी निजी आवश्यकता से कहीं अधिक मात्रा में, पुनः पुनः भोजन बना सकते हैं, और बिना स्वयं के (उस पौधे के) प्रति किसी भी प्रकार की जैविक नकारात्मक साइड इफेक्ट( negative side effects) के वह सूर्य किरणों से बनाया गया भोजन देने के में सक्षम हैं। उनका बनाया भोजन मनुष्य ले या न ले - इससे न उन पौधों के जीवन की अवधि पर असर पड़ता है, और न ही उन्हें किसी प्रकार की कोई पीड़ा महसूस होती है।





{चेतावनी :- इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं, इस लेख से आपकी स्वार्थी भावनाओँ को ठेस पहुंची हो तो क्षमा करे...}

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अनुकंपा भाव की सुरक्षा का उपाय है शाकाहार...

5 Feb 2016

येन केन पेट भरना ही मानव का उद्देश्य नहीं है। आहार-भय-निंद्रा-मैथुन तो पशुओं का भी उद्देश्य है। किसी भी प्रकार आहार प्राप्त करना तो विशेष रूप से पशुओं का लक्षण है। और विस्मय तो तब होता है जब शाकाहारी पशु भूखे मर जाते है पर माँस पर मुँह नहीं मारते!! मानव नें प्रकृति प्रदत्त बुद्धि से ही सभ्यता साधी। अपनी विकृत आहार व्यवस्था को मानव ने सुसंस्कृत बनाया। शाकाहार हीवह सुसंस्कृतिहै। प्रकृति प्रदत्त बुद्धि हमें यह विवेकशीलता भी प्रदान करती है,कि हमारे विचार और व्यवहार सौम्य व पवित्र बने रहे। सभी जीवों के साथसहजीवन में हम क्रूरता से दूर रहें।समस्त सृष्टि का जीवन सहज और सुखप्रद हो, इसिलियेसभ्यता और संस्कार हमारे लक्ष्य होते है। जीवन जीने की हर प्राणी में अदम्य इच्छा होती हैं। हम देखते है कि कीट व जंतु भी जीवन टिकाए रखने के लिए, कीटनाशक दवाओं के खिलाफ़ प्रतिकार शक्ति उत्पन्न कर लेते है। सुक्ष्म जीवाणु-रोगाणु भी कुछ समय बाद रोगप्रतिरोधक दवाओं के विरुद्ध जीवन बचाने के तरिके खोज लेते है। यह उनके जीनें की अदम्य जीजिविषा का परिणाम होता है। सभी जीना चाह्ते है मरना कोईनहींचाहता। एसे में प्राण बचाने को संघर्षरत पशुओं को मात्र स्वाद के लिये मार खाना तो क्रूरता और विकार की पराकाष्ठा है। हिंसाजन्य आहार लेने से,हिंसा के प्रति सम्वेदनाएं समाप्तप्राय हो जाती है। किसी का जीवन ही गटक जाने की विकृत मानसिकता से दूसरे जीव के प्रति दया करूणा के भाव तिरोहित हो जाते है। अनावश्यक हिंसा-भाव मन में रूढ हो जाते है,और वे हमारे स्वभाव का हिस्सा बन जाते हैं। इस प्रकार क्रूरता हमारे आचरण में समाहित हो जाती है। ऐसी मनोदशा में,हमारे सुखों के विपरित/प्रतिकूल स्थिति उत्पन होनें पर आवेश का आना सहज सा हो जाता है। आवेश में हिंसक कृत्य का हो जाना भी सम्भव है। आहार इसी तरह हमारी मनोस्थिति को प्रभावित करता है। हमारी सम्वेदनाओं और अनुकंपा भाव के संरक्षण के लिये, हमारे विचार और वर्तन को विशुद्ध रखनें के लिये, शाकाहार हमारीपहलीपसंद ही नहीं, नैतिक कर्तव्य होना चाहिए। और फ़िर जहाँ और जब तक हमें सात्विक पौष्ठिक शाकाहार,प्रचूरता से उपलब्ध है,वहां तो इन निरिह जीवों को करूणादान अथवा अभयदान देना ही चाहिए। समस्त जीव-संसार हमारा पडौसी है, उनके अस्तित्व से ही हमारा जीवन टिका हुआ है। मानव मात्र का यह कर्तव्य है जीए और जीने दे। सहजीवन सरोकार, विवेकयुक्त संयम,सम्वेदनाओं की रक्षा और सात्विक संस्कृति शाकाहार शैली है...




 

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मानव के भोजन का उद्देश्य...

4 Feb 2016

भोजन का उद्देश्य मात्र उदरपूर्ति या स्वादतृप्ति ही नहीं है। हम भोजन के लिए नहीं जीते, बल्कि जीवित रहने के लिए हमें भोजन करना पडता है। भोजन का उद्देश्य, शरीर सौष्ठव बनाना मात्र नहीं है। आहार से तो बस हमें जीवन उर्ज़ा मात्र चाहिए। आहार से उर्ज़ा प्राप्त कर, उस शक्ति को मानसिक और चारित्रिक विकास में लगाना हमारा ध्येय है। सुविधायुक्त जीना हमारा भ्रांत लक्ष्य है, सुखरूप जीना ही वास्तविक लक्ष्य है। दूसरों को सुखरूप जीने देना हमारे ही सुखों का अर्जन है। सुखरूप जीनें के लिए आचार-विचार उत्तम होने चाहिए। दया, करूणा और सम्वेदनाओं से हृदय भरा होना चाहिए । हमारी सम्वेदनाएं आहार से प्रभावित होती है। मन की सोच पर आहार का स्रोत हावी ही रहता है,यदि वह स्रोत क्रूरता प्रेरित है तो हमारी कोमल भावनाओं को निष्ठुर बना देता है। आहार का आचार विचार व व्यवहार से गहरा सम्बंध है। हमारा सम्वेदनशील मन किसी के प्रति, प्रिय अप्रिय भावनाएं पैदा करता है। जिस प्रकार बार बार क्रूर दृश्य देखने मात्र से हमारे करूण भावों में कमी आती है, ठीक उसी प्रकार आहार स्रोत के चिंतन का प्रभाव हमारी सम्वेदनाओं का क्षय कर देता है। अतः भोजन का उद्देश्य, भौतिक ही नहीं मानसिक विकास भी होता है।





 

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अंडा नहीँ है शाकाहारी : राक्षसी कुर्तको का खंडन...

4 Feb 2016

 

सब जानते हैं कि मांसाहार का व्यवसाय क्रूरता और हिंसा पर टिका है। लेकिन जब बात अण्डों की होती है तो कई बार वह क्रूरता और व्यवसायिक हिंसा पर्दे की ओट में छिप जाती है और कुछ लोग अंडे को शाकाहारी बताने के प्रचार को सच मान बैठते हैं।



अंडा किसी भी तरह शाकाहारी नहीं होता


अंडे दो तरह के होते है, एक वे जिसमें से चूजे निकल सकते है तथा दूसरे वे जिनसे बच्चे नहीं निकलते। निषेचित और अनिषेचित। मुर्गे के संसर्ग से मुर्गी अंडे दे सकती है किन्तु बिना संसर्ग के अंडा मात्र मुर्गी के रज-स्राव से बनता है, मासिक-धर्म की भांति ही यह अंडा मुर्गी की आन्तरिक अपशिष्ट का परिणाम होता है। आजकल इन्ही अंडो को व्यापारिक स्वार्थवश लोग अहिंसक, शाकाहारी आदि भ्रामक नामों से पुकारते है। यह अंडे किसी भी तरह से वनस्पति नहीं है।और न ही यह शाक की तरह,  सौर किरणें, जल व वायु से अपना भोजन बनाकर उत्पन्न होते है। अधिक से अधिक इसे मुर्गी का अपरिपक्व मूर्दा भ्रूण कह सकते है।

1962 मॆं यूनिसेफ ने एक पुस्तक प्रकाशित की जिसमें अंडों को लोकप्रिय बनाने के व्यवसायिक उद्देश्य से अनिषेचित (INFERTILE) अंडों को शाकाहारी अंडे (VEGETARIAN EGG) जैसा मिथ्या नाम देकर भारत के शाकाहारी समाज में भ्रम फैला दिया। 1971 में मिशिगन यूनिवर्सिटी(अमेरिका) के वैज्ञानिक डॉ0 फिलिप जे0 स्केम्बेल ने 'पॉलट्री फीड्स एंड न्युट्रीन' नामक पुस्तक में यह सिद्ध किया कि "संसार का कोई भी अंडा निर्जीव नहीं होता, फिर चाहे वह निषेचित (सेने योग्य) हो या अनिषेचित,  अनिषेचित अंडे में भी जीवन होता है, वह एक स्वतंत्र जीव होता है। अंडे के ऊपरी भाग पर हजारो सूक्ष्म छिद्र होते है जिनमे अनिषेचित अंडे का जीव श्वास लेता है", जब तक श्वासोच्छवास की क्रिया होती है, अंडा सडन-गलन से मुक्त रहता है। यह उसमें जीवन होने का प्रत्यक्ष प्रमाण है। "यदि ऐसे अंडे में श्वासोच्छवास की क्रिया बंद हो जाए तो अंडा शीघ्र ही सड जाता है।" इसतरह अंडे को निर्जीव और शाकाहार समकक्ष मनवाना बहुत बडी धूर्तता है, यह मात्र उत्पादकों के व्यापारिक स्वार्थ के खातिर प्रचारित भ्रांति से अधिक कुछ भी नहीं है।


हिंसा और अत्याचार की उपज है अंडा !!



बहुधा यह सुनने में आता है की अनिषेचित अंडे अहिंसक होते है। लेकिन यदि यह मालूम हो जाय कि उनके उत्पादन की विधि कितनी क्रूरता से परिपूर्ण है और भारतीय मूल्यों जैसे अहिंसा और करुणा के विपरीत है तो बहुत से लोग अंडा सेवन ही बंद कर देगे। अमेरिका के विश्वविख्यात लेखक जान राबिन्स ने अपनी प्रसिद्द पुस्तक "दैट फार ए न्यू अमेरिका" में लिखा है कि अंडों की फेक्ट्रीयो में स्थापित  पिजरों में, इतनी अधिक मुर्गियां भर दी जाती है कि वे पंख भी नहीं फडफड़ा सकती और तंग जगह के कारण वे आपस में चोचे मारती है, जख्मी होती है, गुस्सा करती है और कष्ट भोगती है।  मुर्गी को  लगातार २४ घंटे लोहे की सलाख पर बैठे रहना पड़ता है, उसी हालात में एक विशेष मशीन से  रात में एक साथ हजारो मुर्गियों की चोचे काट दी जाती है। गरम तपते लाल औजारों से उनके पंख भी कतर दिए जाते है।

मुर्गियां अंडे अपनी स्वेच्छा से नहीं देती, बल्कि उन्हें विशिष्ट हार्मोन्स और एग-फर्म्युलेशन के इन्जेक्शन दिए जाते है। तब जाकर मुर्गीयाँ लगातार अंडे दे पाती है। अंडे प्राप्त होते ही उन्हें इन्क्यूबेटर के हवाले कर दिया जाता है, ताकि चूजा २१ दिन की बज़ाय मात्र १८ दिन में ही निकल आए। बाहर आते ही नर तथा मादा चूजों को अलग-अलग कर दिया जाता है। मादा चूजों को शीघ्र जवान करने के लिए, उन्हें विशेष प्रकार की खुराक दी जाती है। साथ ही इन्हें चौबीसो  घंटे तेज प्रकाश में रखकर, सोने नहीं दिया जाता ताकि वे रात दिन खा-खा कर शीघ्र रज-स्राव कर अंडा देने लायक हो जाय। उसके बाद भी उन्हें लगातार तेज रोशनी में रखा जाता है ताकि खाती रहे और प्रतिदिन अंडा देती रहे।तंग जगह में रखा जाता है कि हिलडुल भी न सके,और अंडे को क्षति न पहुँचे। आप समझ सकते है की जल्दी और  मशीनीकृत तरीके से अंडा उत्पन्न करने की यह व्यवस्था कितनी क्रूर और हिंसात्मक है्।


अंडो से कई बीमारियाँ



हाल ही में हुआ बर्ड फ्ल्यू और साल्मानोला बीमारी ने समस्त विश्व को स्तम्भित कर दिया है कि मुर्गियों को होने वाली कई बीमारियों के कारण अन्डो से यह बीमारियाँ, मनुष्य में भी प्रवेश करती है। अंडा भोजियों  को यह भी नहीं मालूम कि इसमें हानिकारक कोलेस्ट्राल की बहुत अधिक मात्रा होती है। अंडो के सेवन से आंतो में सड़न और तपेदिक  की सम्भावनाएँ बहुत ही बढ़ जाती है। अंडे की सफ़ेद जर्दी से पेप्सीन इन्जाइम के विरुद्ध, विपरित प्रतिक्रिया होती है।

जर्मनी के प्रोफेसर एग्नरबर्ग का मानना है कि अंडा 51.83% कफ पैदा करता है। वह शरीर के पोषक तत्वों को असंतुलित कर देता है।



कैथराइन निम्मो तथा डाक्टर जे एम् विलिकाज ने एक सम्मिलित रिपोर्ट में कहा है कि अंडा ह्रदय रोग और लकवे आदि के लिए एक जिम्मेदार कारक है। यह बात १९८५ इस्वी के नोबल पुरस्कार विजेता, डॉक्टर ब्राउन और डॉ0 गोल्ड स्टाइन ने कही कि अंडों में सबसे अधिक कोलेस्ट्रोल होता है। जिससे उत्पन्न ह्रदय रोग के कारण बहुत अधिक मौते होती है। इंग्लेंड के डाक्टर आर जे विलियम ने कहा है कि जो लोग आज अंडा खाकर स्वस्थ बने रहने की कल्पना कर रहे है, वे कल लकवा, एग्जिमा, एन्जाईना जैसे रोगों के शिकार हो सकते है। फिर अंडे में जरा सा भी फाईबर नहीं होता, जो आंतो में सड़न की रोकथाम में सहायक है। साथ ही कार्बोहाईड्रेट जो शरीर में स्फूर्ति देता है, करीबन शून्य ही होता है।
जाने-माने हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. के.के. अग्रवाल का कहना है कि एक अंडे में 213 मिलीग्राम कॉलेस्ट्रॉल होता है यानी आठ से नौ चम्मच मक्खन के बराबर, क्योंकि एक चम्मच मक्खन में 25 मिलीग्राम कॉलेस्ट्रॉल होता है। इसलिए सिर्फ शुगर, हाई बीपी और हार्ट पेशेंट्स को ही इन्हें दूर से सलाम नहीं करना चाहिए बल्कि सामान्य सेहत वाले लोगों को भी दूर रहना चाहिए। अगर डॉक्टर प्रोटीन की जरूरत भी बताये तो प्रोटीन की प्रतिपूर्ति, शाकाहारी माध्यमों - मूँगफली, सोयाबीन, दालें, पनीर, दूध व मेवे आदि से करना अधिक आरोग्यप्रद है।

इग्लेंड के डॉ0 आर0 जे0 विलियम का निष्कर्ष है कि सम्भव है अंडा खाने वाले भले शुरू में क्षणिक आवेशात्मक चुस्ती-फुर्ती अनुभव करें किंतु बाद में उन्हें हृदय रोग, एक्ज़ीमा, लकवा, जैसे भयानक रोगों का शिकार होना पड़ सकता है।


इंगलैंड के मशहूर चिकित्सक डॉ0 राबर्ट ग्रास तथा प्रो0 ओकासा डेविडसन इरविंग के अनुसार अंडे खाने से पेचिश तथा मंदाग्नि जैसी बिमारियों की प्रबल सम्भावनाएं होती है। जर्मनी के प्रो0 एग्लर वर्ग का निष्कर्ष है कि अंडा 51.83 प्रतिशत कफ पैदा करता है, जो शरीर के पोषक तत्वों को असंतुलित करने में मुख्य घटक है। फ्लोरिडा के कृषि विभाग की हेल्थ बुलेटिन के अनुसार, अंडों में 30 प्रतिशत DDT पाया जाता है । जिस प्रकार पॉल्ट्रीज को रखा जाता है, उस प्रक्रिया के कारण DDT मुर्गी की आंतों में घुल जाता है अंडे के खोल में 15000 सूक्ष्म छिद्र होते हैं जो सूक्ष्मदर्शी यन्त्र द्वारा आसानी से देखे जा सकते हैं उन छिद्रों द्वारा DDT का विष अंडों के माध्यम से मानव शरीर में पहुंच जाता है। जो कैंसर की सम्भावनाएँ कईं गुना बढ़ा देता है। हाल ही में इंगलैंड के डॉक्टरों ने सचेत किया है कि ‘सालमोनेला एन्टरईटिस’, जिसका सीधा संबन्ध अंडों से है, के कारण लाखों लोग इंगलैंड में एक जहरीली महामारी का शिकार हो रहे है। भारत में ऐसी कोई परीक्षण विधि नहीं है कि सड़े अंडों की पहचान की जा सके। और ऐसे सड़े अंडों के सेवन से उत्पन्न होने वाले, भयंकर रोगों की रोकथाम सम्भव हो सके।



पौष्टिकता एवं उर्जा के प्रचार में नहीं है दम



विज्ञापनों के माध्यम से यह भ्रम बड़ी तेजी से फैलाया जा रहा है कि शाकाहारी खाद्यानो की तुलना में, अंडे में अधिक प्रोटीन है। जबकि विश्व स्वास्थ्य संघठन के तुलनात्मक चार्ट से यह बात साफ है कि खनिज, लवण, प्रोटीन, कैलोरी, रेशे और कर्बोहाड्रेड आदि की दृष्टि से शाकाहार ही हमारे लिए अधिक उपयुक्त, पोषक और श्रेष्ठ है।

अंडे से कार्य-क्षमता, केवल क्षणिक तौर पर बढ़ती सी प्रतीत होती है, पर स्टेमिना नहीं बढ़ता। फार्मिंग से आए अंडे तो केमिकल की वजह से ज्यादा ही दूषित या जहरीले हो जाते हैं। सामान्यतया गर्मियों में पाचनतंत्र कमजोर होता है, ऐसे में अंडे ज्यादा कैलरी व गरिष्ठ होने के कारण और भी ज्यादा नुकसानदेय साबित होते हैं।

अमेरिका के डॉ0 ई0 बी0 एमारी तथा इग्लेंड के डॉ0 इन्हा ने अपनी विश्व विख्यात पुस्तकों में साफ माना है कि अंडा मनुष्य के लिये ज़हर है।


विशेषज्ञ कहते हैं कि प्रोटीन के लिए,  सभी तरह की दालें, पनीर व दूध से बनी चीजें अंडे का श्रेष्ठ विकल्प होती हैं। अंडों की जगह उनका इस्तेमाल होना चाहिए। दूध या स्किम्ड मिल्क, मूंगफली, मेवे में अखरोट, बादाम, काजू व हरी सब्जियां, दही, सलाद और फल भी ले सकते हैं। उनका कहना है कि जीव-जंतुओं से प्राप्त भोजन से कॉलेस्ट्रॉल अधिक बढ़ता है जबकि पेड़-पौधों से मिलने वाले भोजन से बहुत ही कम।

न हमारे शरीर को अंडे खाना ज़रूरी है और न हमारे मन को जीवहिंसा का सहभागी बनना। हमारा अनुरोध है कि निरामिष भोजन अपनायें और स्वस्थ रहें।





 

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भोजन का चुनाव व्यक्तिगत मामला मात्र नहीं है - कौन सा न्याय है कि हमें तो खाने-पीने तक की आज़ादी चाहिए, लेकिन दूसरे जीवों को जीने तक की आज़ादी नहीं हो ?

4 Feb 2016

अकसर कहा जाता है कि आहार व्यक्ति की व्यक्तिगत रुचि की बात है। जिसका जो दिल करे खाए। हमारा आहार कोई अन्य उपदेशित या प्रबन्धित क्यों करे? क्या खाना क्या नहीं खाना यह हमारा अपना स्वतंत्र निर्णय है। किन्तु यह सरासर एक संकुचित और स्वार्थी सोच है, विशेषकर तब जब उसके साथ हिंसा सलग्न हो। प्रथम दृष्टि में व्यक्तिगत सा लगने वाला यह आहार निर्णय, समग्र दृष्टि से पूरे विश्व के जन-जीवन को प्रभावित कर सकता है। मात्र आहार ही नहीं हमारा कोई भी कर्म यदि किसी दूसरे के जीवन को बुरी तरह प्रभावित कर रहा हो, उस दशा में तो और भी धीर गम्भीर चिंतन और विवेकयुक्त निर्णय हमारा उत्तरदायित्व बन जाता है। यदि आपके किसी भी कृत्य से कोई दूसरा (मनुष्य या प्राणी जो भी) प्रभावित होता है, समाज प्रभावित होता है, देश प्रभावित होता है विश्व प्रभावित होता है उस स्थिति में आपके आहार-निर्णय की एकांगी सोच या स्वछंद विचारधारा, कैसे मात्र व्यक्तिगत रह सकती है। अन्य जीवन का सवाल :- यह तो साफ है कि माँस किसी प्राणी का जीवन समाप्त करके ही प्राप्त किया जा सकता है। जो आहार किसी दूसरे प्राणी का जीवन ही हर ले, जिसमें किसी अन्य प्राणी को अपनी मूल्यवान जान देनी पडे, कैसे मात्र आपका व्यक्तिगत मसला हो सकता है। भावनायें आहत होती हैं :- माँसाहारियो के लिये यह मात्र आहार की बहस है। पर शाकाहारियों के लिये निश्चित ही किसी जीवन के प्रति उत्तरदायित्व का प्रश्न है। पशुओं को कटते हुए न देख पाना, खून से लथपथ माँस, यत्र-तत्र बिखरे उनके व्यर्थ अवयव, पकने पर फैलती इन पदार्थों की दुर्गन्ध, खाते देखकर पैदा होती जगुप्सा। दूसरो की भावनाओं को आहत करने के लिए पर्याप्त है। जो आहार दूसरों की भावनाओं को आहत करे, कैसे यह मुद्दा व्यक्तिगत पसंद तक सीमित हो सकता है? हिंसा को प्रोत्साहन :- जब आप माँसाहार करते है तो समाज में यह संदेश जाता है कि माँसाहार में छुपी पशुहिंसा सहज सामान्य है यह आहार शैली एक तरह से हिंसा को अप्रत्यक्ष समर्थन है। यह प्रकृति में उपस्थित जीवन का अनादर है। यह सोच समाज में शनैः शनैः निष्ठुरता का प्रसार करती है। यदि आहार इस तरह समाज के मानवीय जीवनमूल्यों को क्षतिग्रस्त करे तो वह कैसे मात्र व्यक्तिगत मामला हो सकता है। वैश्विक मानव पोषण और स्वास्थ्य :- पोषण के भी असंयमी स्वछंद उपभोग से न केवल प्राकृतिक-वितरण में असन्तुलन पैदा होता है बल्कि आप अतिरिक्त माल को व्यर्थ मिट्टी बना रहे होते है। अतिरिक्त उर्ज़ायोग्य तत्वों को अनावश्यक अपशिष्ट बना कर व्यर्थ कर देते है। यह दुरपयोग, किसी कुपोषण के शिकार के मुंह का निवाला छीन लेने की धृष्टता है। इस प्रकार व्यर्थ गई उर्ज़ा को पुनः रिसायकल करने में प्रकृति का बेशकीमती समय तो बर्बाद होता ही है, प्रकृति के संसाधन भी अनावश्यक ही खर्च होते है। तब बात और भी गम्भीर हो जाती है जब आप जो उर्ज़ा सीधे वनस्पति से प्राप्त कर सकते थे, बीच में एक जानवर और उसकी बेशकीमती जान का भोग ले लेते है। और मांसाहार से द्वितीय श्रेणी की उर्ज़ा पाने का निर्थक और जटिल उद्यम करते है। माँसाहार, कुपाच्य और रेशे रहित होता है परिणाम स्वरूप कईं रोगों का निमंत्रक बनता है, इसे अगर व्यक्तिगत आरोग्य-हानि भी मान लें पर सामुहिक रूप से यह विश्व स्वास्थ्य के प्रति उत्तरदायी है। माँसाहार पर सवार होकर प्रसार पाती महामारियों से आज कोई भी अनभिज्ञ नहीं है। इस तरह मांसाहार जब वैश्विक पोषण और स्वास्थ्य को प्रभावित करता है तो कैसे मात्र व्यक्तिगत चुनाव का प्रश्न कहकर पल्ला झाडा जा सकता है? विश्व खाद्यसंकट- भोजन का सम्मान होना चाहिए, उसका दुरपयोग या अपव्यय दूसरे प्राणी के मुँह के कौर को धूल में मिलाने के समान है। जब हम अपना भोजन बनाने की विधि में भी अनावश्यक व्यर्थ करते है या हमारी थाली में भी जूठा छोड कर फैक देते है तो यह भी एक अपराध है। यह दूसरे लोगों को भूखमरी के हवाले करने का अपराध है। जब भोजन के साथ सहज ही हो जानेवाला यह मामूली सा अविवेक भी अपराध की श्रेणी में आता है तो 13 किलो शाकाहार को व्यर्थ कर के आहार के लिए मात्र 1 किलो माँस पाने की क्रिया कैसे निर्दोष हो सकती है? और पशु की आधे से भी अधिक मात्रा वेस्टेज कर दी जाती है। विश्व की एक-चौथाई उपजाऊ भूमि पशुपालन में झोंक दी गई है। यह खाद्य अपव्यय, संसाधनो का दुरपयोग, प्रकृति के विनाश का अक्षम्य अपराध है। ऐसी मांसाहार भोजन-शैली, वैश्विक भूखमरी का कारण हो, जो हमारे समस्त जीवनोपयोगी संसाधनो की बरबादी का कारण हो, कैसे एक व्यक्तिगत मामले में खपा दी जा सकती है। विश्व पर्यावरण :- नवीनतम शोध के अनुसार लगभग सभी वैज्ञानिक इस बात से सहमत है कि माँसाहार का प्रयोग ग्लोबल वॉर्मिंग का एक प्रमुख कारक है। मांस-उद्योग सर्वाधिक ग्रीनहाउस गैसेज का स्रोत बनकर मुँह चि्ढ़ा रहा है। पर्यावरण दूषण आज मानव अस्तित्व के लिए ही चुनौति बनकर खड़ा है। क्योंकि अनियंत्रित भोग और मनमौज ही प्राकृतिक संसाधनों का शोषण है। पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों की बरबादी अर्थात् मानव अस्तित्व के लिए विकराल खतरा। जिस निर्णय से मानव अस्तित्व ही खतरे में पड जाय तो कैसे उस चुनाव को मात्र व्यक्तिगत कह कर किनारा किया जा सकता है? नशा, ड्र्ग्स, धूम्रपान, गुटका आदि व्यक्तिगत खुराक होते हुए भी व्यक्तिगत इच्छाओं के अधीन स्वछंद छोडी नहीं जा सकती। यह समस्त विश्व के स्वास्थ्य कल्याण का गम्भीर प्रश्न बनती है। उसी तरह आहार भी यदि वैश्विक समस्याएँ खडी करता है तो मसला किसी भी दृष्टि से व्यक्तिगत चुनाव तक संकीर्ण नहीं रह जाता। इस तरह आहार का चुनाव' केवल आहारी व्यक्ति के व्यक्तिगत पसंद-नापसंद का विषय नहीं है। आपका आहार समाज से लेकर वैश्विक पर्यावरण तक को प्रभावित करता है। वह सीधे सीधे वैश्विक संसाधनो को प्रभावित करता है। अप्रत्यक्ष रूप से विश्व शान्ति को प्रभावित करता है।जीव-जगत के रहन-सहन-व्यवहार ही नहीं उनके जीने के अधिकार को प्रभावित करता है। फिर भला आहार, मात्र व्यक्तिगत मुद्दा कैसे हो सकता है...?





 

{चेतावनी :- इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं, इस लेख से आपकी स्वार्थी भावनाओँ को ठेस पहुंची हो तो क्षमा करे...}

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हिंसा का अल्पीकरण करने का संघर्ष भी अपने आप में अहिंसा है - कम से कम हिँसा करने का संघर्ष भी अहिँसा...

4 Feb 2016

हिंसा का अल्पीकरण करने का संघर्ष भी अपने आप में अहिंसा है। हिंसा को कम से कमत्तर (अल्पीकरण) करनें का पुरूषार्थ स्वयं में अहिंसा है। साथ ही यह अहिंसा के मार्ग पर दृढ कदमों से आगे बढने का उपाय भी है अथवा यूँ कहिए कि अल्पीकरण का निरन्तर संघर्ष ही अहिंसा के सोपान है। जब सुक्ष्म हिंसा अपरिहार्य हो, द्वेष व क्रूर भावों से बचते हुए, न्यूनता का विवेक रखना, अहिंसक मनोवृति है। यह प्रकृति-पर्यावरण नियमों के अनुकूल है। बुद्धि, विवेक और सजगता से अपनी आवश्यकताओं को संयत व सीमित रखना अहिंसक वृति की साधना है। अहिंसा में विवेक के लिये दार्शनिकों ने तीन आयाम प्रस्तुत किए है। पहला आयाम हैं संख्या के आधार पर,जैसे 5 की जगह 10 जीवों की हिंसा दुगुनी हिंसा हुई। दूसरा आयाम है जीव की विकास श्रेणी के आधार पर एक इन्द्रिय,दो इन्द्रिय विकास क्रम के जीवों से क्रमशः तीन,चार अधिक विकसित है और पांच इन्द्रिय जीव पूर्ण विकसित। यह विवेकजन्य व्यवहार, विज्ञान सम्मत और नैतिक अवधारणा से पुष्ट तथ्य है। अत: हिंसा की श्रेणी भी उसी क्रम से निर्धारित होगी। तीसरा आयाम है,हिंस्र भाव के आधार पर। प्रायः अनजाने से लेकर जानते हुए,स्वार्थवश से लेकर क्रूरतापूर्वक तक आदि मनोवृति व भावनाओं की कईं श्रेणी होती है। प्रथम दृष्टि हिंसा पर सोचना होगा कि उसकी भावना करूणा की है,अथवा परमार्थ की?स्वार्थ की है या अहंपोषण की?निर्थक उपक्रम है या उद्देश्यपूर्ण? एक उदाहरण से समझते है- एक लूटेरा घर लूटने के प्रयोजन से,घर के बाहर सुस्ताने बैठे, किसी अन्य व्यक्ति को खतरा मान हत्या कर देता है। दूसरा,एक कारचालक, जिसकी असावधानी से राहगीर उस गाडी के नीचे आ जाता है। तीसरा,एक डॉक्टर, जिसकी ऑपरेशनटेबल पर जान बचाने के भरसकप्रयास के बाद भी मरीज दम तोड़ देता है। तीनो किस्सों में मौत तो होती है,पर भावनाएं अलग अलग है। इसलिए दोष भी उन भावों की श्रेणी के अनुसार होना चाहिए। प्रायः न्यायालय में भी, हत्या के आरोपी को स्वबचाव,सहज स्वार्थ और क्रूर घिघौनी मनोवृति के आधार पर सजा निर्धारित होती है।

मनोवृति आधारित जैन दर्शन में ‘लेश्या’ का एक अभिन्न दृष्टांत है। छह पदयात्री जारहे थे। जोर की भूख लगी थी। रास्ते में एक जामुन का पेड़ दिखाई दिया। एकयात्री बोला-‘अभी इस पेड़ को जड़ से काट कर सभी का पेट भर देता हूँ। इस परदूसरा बोला-‘जड़ से काटने की जरूरत नहीं,शाखा को काट देता हूँ धराशायी होगी तो सभी फल पा लेंगे। तीसरा व्यक्ति एक टहनी,तो चौथा फलों के गुच्छे को ही पर्याप्त होने की बात करता है। पाँचवा मात्रगुच्छे से फल चुननें की वकालत करता है तो छठा कहता है पक कर जमीन पर बिखरेपड़े जामुनों से ही हमारा पेट भर सकता है। यह मानव मन की मनोवृतियों का,क्रूरत्तम से शुभत्तम भाव निश्चित करने का एक श्रेष्ठ और दुर्लभ उदाहरण है। अतः हिंसा और अहिंसा को उसके संकल्प, समग्र सम्यक् दृष्टिकोण, सापेक्षनिर्भर और परिणाम के सर्वांगिण परिपेक्ष्य से ग्रहण करना आवश्यक है।





{चेतावनी :- इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं, इस लेख से आपकी स्वार्थी भावनाओँ को ठेस पहुंची हो तो क्षमा करे...}

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मांसाहार : बिमारीयोँ का भंडार - एक शास्वत सत्य...

4 Feb 2016

कॉलेस्टरॉल प्राणियों के शरीर में निर्मित होने वाला एक दानेदार रासायनिक पदार्थ (स्टैरॉल, ऐल्कोहल) है। कॉलेस्टरॉल के अणु प्राणियों के शरीर में कई प्रक्रियाओं के लिये अनिवार्य घटक हैं।

इसके कुछ उपयोग निम्न हैं:

*.विटामिन डी का निर्माण

*.वसा-पाचन के अम्लों का निर्माण

*.कोशिका-भित्ति के सामान्य कार्य-निष्पादन

*.कई हार्मोनों का निर्माण मानव शरीर में कॉलेस्टरॉल वसा में घुलनशील प्रोटीन (लिपोप्रोटीन) के रूप में हमारे रक्त में प्रवाहित होता है। घनत्व के अनुसार इसके सामान्यतः

दो प्रकार होते हैं अल्प-सान्द्र (कम घनत्व = LDL=Low-density lipoprotein; बुरा) कॉलेस्टरॉल व अति-सान्द्र (अधिक घनत्व = HDL=high-density lipoprotein; अच्छा) कॉलेस्टरॉल। लहू में अल्प-सान्द्र कॉलेस्टरॉल का आधिक्य हृदयरोग का कारक बनता है जबकि अति-सान्द्र कॉलेस्टरॉल हृदय को स्वस्थ रखने में सहायता करता है। अमेरिकी स्वास्थ्य प्रक्रिया में 20 वर्ष से अधिक आयु के व्यक्तियों को पाँच वर्ष में कम से कम एक बार कॉलेस्टरॉल की जाँच कराने की सलाह दी जाती है। और कॉलेस्टरॉल के आधिक्य की स्थिति में इसकी मात्रा की और यकृत (जिगर/लिवर) की वार्षिक जाँच की सलाह है। कॉलेस्टरॉल वनस्पति जगत में नहीं पाया जाता। हमारे शरीर में कॉलेस्टरॉल की उपस्थिति के दो कारण हो सकते हैं, एक सामिष भोजन और दूसरा आंतरिक निर्माण। मांसाहार से शरीर में आने वाला अधिकांश कॉलेस्टरॉल अल्प-घनत्व वाला, हानिप्रद होता है। शाकाहारी भोजन करने से हम इस प्रकार के हानिप्रद कॉलेस्टरॉल के आगमन से पूर्णतया बच सकते हैं। मांसाहार तो वैसे ही कॉलेस्ट्रॉल के लिये बुरा है पर उसमें भी जिगर आदि अंग तो विशेषरूप से कॉलेस्टरॉल से लदे होते हैं। कॉलेस्टरॉल का दूसरा स्रोत हमारा शरीर है।

फल, सब्ज़ी, संतुलित भोजन, व्यायाम और शारीरिक गतिविधियों द्वारा हम शरीर में अच्छे कॉलेस्टरॉल के निर्माण की प्रक्रिया को बढा सकते हैं। इसके उलट मांसाहार, तला भोजन और आरामतलब जीवनशैली हमारे शरीर में भी बुरे कॉलेस्टरॉल की मात्रा बढाती है। कॉलेस्टरॉल के मामले में शाकाहारी भोजन एक दुधारी तलवार है। एक ओर तो यह स्वयं कॉलेस्टरॉल-मुक्त होता है। वहीं, दूसरी ओर इसमें उपस्थित रेशे (fibers) शरीर में बनने वाले कॉलेस्टरॉल को भी पाचन तंत्र द्वारा अवशोषित होने से रोकते हैं। निरामिष, सात्विक, शाकाहार पूर्णतया कॉलेस्टरॉल-मुक्त होता है।कुल कॉलेस्टरॉल की स्वस्थ मात्रा 200 mg/dL (मिलिग्राम प्रति डेसिलीटर) के नीचे मानी जाती है। 240 mg/dL से अधिक कॉलेस्टरॉल खतरनाक है। एलडीएल (बुरा) की मात्रा 70 mg/dL से कम होनी चाहिये। एचडीएल (अच्छा) की मात्रा पुरुषों के लिये 40 mg/dL से ऊपर व महिलाओं के लिये 50 mg/dL से ऊपर अपेक्षित है। बुरे कॉलेस्टरॉल की अधिक मात्रा हमारी धमनियों की आंतरिक दीवारों पर पपड़ी के रूप में चिपकती रहती है और उन्हें संकरा और कड़ा बनाती जाती है।

अच्छा कॉलेस्टरॉल, धमनियों की दीवारों पर जमने वाले बुरे कॉलेस्टरॉल के कणों को पकड़कर वापस यकृत में जमा कर देता है। कुछ चिकित्सकों की मान्यता है कि हम भारतीयों की धमनियाँ वैसे भी कुछ संकरी होती हैं और हमारी जीवन-शैली में श्रम का कम होता महत्व भी हमारा शत्रु बन रहा है। कारण जो भी हो पर यह सच है कि विदेश में रहने वाले भारतीय यहाँ के स्थानीय निवासियों के मुकाबले कॉलेस्टरॉल से अधिक पीड़ित हैं। पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में अच्छा कॉलेस्ट्रोल अधिक पाया जाता है। इसी प्रकार धूम्रपान करने वालों में बुरे कॉलेस्टरॉल की अधिकता पायी गयी है।

शरीर में अच्छे कॉलेस्टरॉल की मात्रा बढाने के लिये संतुलित शाकाहारी भोजन, मेवे, फल, फूल, शाक की अधिकता, गतिमान व्यायाम (सूर्य नमस्कार, साइकिल, जॉगिंग, नृत्य, ऐरोबिक्स आदि) लाभप्रद हैं। मांस, तले हुए पदार्थ, और धूम्रपान से बचाव बुरे कॉलेस्टरॉल की मात्रा कम करने में सहायक है। फल, सब्ज़ी, मोटा अनाज, ईसबगोल, अलसी, सूर्यमुखी आदि के बीज आदि से प्राप्त होने वाला रेशा (फ़ाइबर) शरीर में मौजूद कॉलेस्टरॉल को पाचन-तंत्र द्वारा अवशोषित हुए बिना बाहर निकालने में सहायक है। रक्त की नियमित जाँच कराकर हम अपने कॉलेस्टरॉल की मात्रा जानकर सही उपाय करके ह्रदयघात, स्ट्रोक आदि से बच सकते हैं। यदि उपरोक्त उपाय काम न आयें, तो प्रमाणित और कारगर दवाओं का सहारा लिया जा सकता है। याद रहे संतुलित शाकाहारी भोजन हमें स्वस्थ और सम्पूर्ण आहार प्रदान करता है। उचित जीवन शैली अपनाकर हम न केवल निरोग रह सकते हैं बल्कि समाज के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को भी बेहतर रूप से निभा सकते हैं।

 

अंडो से कई बीमारियाँ

 

हाल ही में हुआ बर्ड फ्ल्यू और साल्मानोला बीमारी ने समस्त विश्व को स्तम्भित कर दिया है कि मुर्गियों को होने वाली कई बीमारियों के कारण अन्डो से यह बीमारियाँ, मनुष्य में भी प्रवेश करती है। अंडा भोजियों  को यह भी नहीं मालूम कि इसमें हानिकारक कोलेस्ट्राल की बहुत अधिक मात्रा होती है। अंडो के सेवन से आंतो में सड़न और तपेदिक  की सम्भावनाएँ बहुत ही बढ़ जाती है। अंडे की सफ़ेद जर्दी से पेप्सीन इन्जाइम के विरुद्ध, विपरित प्रतिक्रिया होती है।

जर्मनी के प्रोफेसर एग्नरबर्ग का मानना है कि अंडा 51.83% कफ पैदा करता है। वह शरीर के पोषक तत्वों को असंतुलित कर देता है।



कैथराइन निम्मो तथा डाक्टर जे एम् विलिकाज ने एक सम्मिलित रिपोर्ट में कहा है कि अंडा ह्रदय रोग और लकवे आदि के लिए एक जिम्मेदार कारक है। यह बात १९८५ इस्वी के नोबल पुरस्कार विजेता, डॉक्टर ब्राउन और डॉ0 गोल्ड स्टाइन ने कही कि अंडों में सबसे अधिक कोलेस्ट्रोल होता है। जिससे उत्पन्न ह्रदय रोग के कारण बहुत अधिक मौते होती है। इंग्लेंड के डाक्टर आर जे विलियम ने कहा है कि जो लोग आज अंडा खाकर स्वस्थ बने रहने की कल्पना कर रहे है, वे कल लकवा, एग्जिमा, एन्जाईना जैसे रोगों के शिकार हो सकते है। फिर अंडे में जरा सा भी फाईबर नहीं होता, जो आंतो में सड़न की रोकथाम में सहायक है। साथ ही कार्बोहाईड्रेट जो शरीर में स्फूर्ति देता है, करीबन शून्य ही होता है।
जाने-माने हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. के.के. अग्रवाल का कहना है कि एक अंडे में 213 मिलीग्राम कॉलेस्ट्रॉल होता है यानी आठ से नौ चम्मच मक्खन के बराबर, क्योंकि एक चम्मच मक्खन में 25 मिलीग्राम कॉलेस्ट्रॉल होता है। इसलिए सिर्फ शुगर, हाई बीपी और हार्ट पेशेंट्स को ही इन्हें दूर से सलाम नहीं करना चाहिए बल्कि सामान्य सेहत वाले लोगों को भी दूर रहना चाहिए। अगर डॉक्टर प्रोटीन की जरूरत भी बताये तो प्रोटीन की प्रतिपूर्ति, शाकाहारी माध्यमों - मूँगफली, सोयाबीन, दालें, पनीर, दूध व मेवे आदि से करना अधिक आरोग्यप्रद है।

इग्लेंड के डॉ0 आर0 जे0 विलियम का निष्कर्ष है कि सम्भव है अंडा खाने वाले भले शुरू में क्षणिक आवेशात्मक चुस्ती-फुर्ती अनुभव करें किंतु बाद में उन्हें हृदय रोग, एक्ज़ीमा, लकवा, जैसे भयानक रोगों का शिकार होना पड़ सकता है


इंगलैंड के मशहूर चिकित्सक डॉ0 राबर्ट ग्रास तथा प्रो0 ओकासा डेविडसन इरविंग के अनुसार अंडे खाने से पेचिश तथा मंदाग्नि जैसी बिमारियों की प्रबल सम्भावनाएं होती है। जर्मनी के प्रो0 एग्लर वर्ग का निष्कर्ष है कि अंडा 51.83 प्रतिशत कफ पैदा करता है, जो शरीर के पोषक तत्वों को असंतुलित करने में मुख्य घटक है। फ्लोरिडा के कृषि विभाग की हेल्थ बुलेटिन के अनुसार, अंडों में 30 प्रतिशत DDT पाया जाता है । जिस प्रकार पॉल्ट्रीज को रखा जाता है, उस प्रक्रिया के कारण DDT मुर्गी की आंतों में घुल जाता है अंडे के खोल में 15000 सूक्ष्म छिद्र होते हैं जो सूक्ष्मदर्शी यन्त्र द्वारा आसानी से देखे जा सकते हैं उन छिद्रों द्वारा DDT का विष अंडों के माध्यम से मानव शरीर में पहुंच जाता है। जो कैंसर की सम्भावनाएँ कईं गुना बढ़ा देता है। हाल ही में इंगलैंड के डॉक्टरों ने सचेत किया है कि ‘सालमोनेला एन्टरईटिस’, जिसका सीधा संबन्ध अंडों से है, के कारण लाखों लोग इंगलैंड में एक जहरीली महामारी का शिकार हो रहे है। भारत में ऐसी कोई परीक्षण विधि नहीं है कि सड़े अंडों की पहचान की जा सके। और ऐसे सड़े अंडों के सेवन से उत्पन्न होने वाले, भयंकर रोगों की रोकथाम सम्भव हो सके।



पौष्टिकता एवं उर्जा के प्रचार में नहीं है दम



विज्ञापनों के माध्यम से यह भ्रम बड़ी तेजी से फैलाया जा रहा है कि शाकाहारी खाद्यानो की तुलना में, अंडे में अधिक प्रोटीन है। जबकि विश्व स्वास्थ्य संघठन के तुलनात्मक चार्ट से यह बात साफ है कि खनिज, लवण, प्रोटीन, कैलोरी, रेशे और कर्बोहाड्रेड आदि की दृष्टि से शाकाहार ही हमारे लिए अधिक उपयुक्त, पोषक और श्रेष्ठ है।

अंडे से कार्य-क्षमता, केवल क्षणिक तौर पर बढ़ती सी प्रतीत होती है, पर स्टेमिना नहीं बढ़ता। फार्मिंग से आए अंडे तो केमिकल की वजह से ज्यादा ही दूषित या जहरीले हो जाते हैं। सामान्यतया गर्मियों में पाचनतंत्र कमजोर होता है, ऐसे में अंडे ज्यादा कैलरी व गरिष्ठ होने के कारण और भी ज्यादा नुकसानदेय साबित होते हैं।

अमेरिका के डॉ0 ई0 बी0 एमारी तथा इग्लेंड के डॉ0 इन्हा ने अपनी विश्व विख्यात पुस्तकों में साफ माना है कि अंडा मनुष्य के लिये ज़हर है।


विशेषज्ञ कहते हैं कि प्रोटीन के लिए,  सभी तरह की दालें, पनीर व दूध से बनी चीजें अंडे का श्रेष्ठ विकल्प होती हैं। अंडों की जगह उनका इस्तेमाल होना चाहिए। दूध या स्किम्ड मिल्क, मूंगफली, मेवे में अखरोट, बादाम, काजू व हरी सब्जियां, दही, सलाद और फल भी ले सकते हैं। उनका कहना है कि जीव-जंतुओं से प्राप्त भोजन से कॉलेस्ट्रॉल अधिक बढ़ता है जबकि पेड़-पौधों से मिलने वाले भोजन से बहुत ही कम।

न हमारे शरीर को अंडे खाना ज़रूरी है और न हमारे मन को जीवहिंसा का सहभागी बनना। हमारा अनुरोध है कि निरामिष भोजन अपनायें और स्वस्थ रहें।

 

शाकाहार सही, मांसाहार नहीं...

 

नए शोध के अनुसार,शाकाहारी होना हमारे शरीर के लिए बहुत फायदेमंद है। जो लोग सब्जियों से अधिक प्रोटीन प्राप्त करते हैं उनका रक्तचाप सामान्य रहता है जबकि मांस का अधिक सेवन करने वाले ज्यादातर लोग हाई ब्लड प्रेशर के शिकार होते हैं। स्वस्थ भोजन ही तन और मन को स्वस्थ रखता है। स्वस्थ भोजन से आशय है,वह भोजन जिसमें खनिज पदार्थ,प्रोटीन,कार्बोहाइट्रेड और विटामिन सहित कई पोषक तत्व हों। ये सभी चीजें समान अनुपात में हों तो भोजन शरीर के लिए अमृत बन जाता है।

भोजन तभी स्वस्थ है जब तक प्राकृतिक हो। संतुलित शाकाहारी भोजन शरीर को सभी पोषक तत्व प्रदान करता है। यही नहीं,वह हृदय रोग, कैंसर,उच्च रक्तचाप,मधुमेह,जोड़ों का दर्द व अन्य कई बीमारियों से हमें बचाता भी है। नए शोध के अनुसार,शाकाहारी होना हमारे शरीर के लिए बहुत फायदेमंद है। जो लोग सब्जियों से अधिक प्रोटीन प्राप्त करते हैं उनका रक्तचाप सामान्य रहता है जबकि मांस का अधिक सेवन करने वाले ज्यादातर लोग हाई ब्लड प्रेशर के शिकार होते हैं। लंदन में हुए शोध के अनुसार उन लोगों में हाई ब्लड प्रेशर ज्यादा पाया गया जो मांस से अधिक प्रोटीन प्राप्त करते थे। अनुसंधान के अनुसार,शाकाहारी प्रोटीन में एमीनो एसिड पाया जाता है।

यह शरीर में जाकर ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करता है। सब्जियों में एमीनो एसिड के साथ-साथ मैग्नेशियम भी पाया जाता है। यह हमारे रक्तचाप को नियंत्रित रखता है। अधिक मांसाहार करने वाले लोगों में फाइबर की भी कमी पाई गई है। फाइबर हमें अनाज से मिलता है। दाल,फलों का रस और सलाद से कई पोषक तत्व मिलते हैं। ये हमारे शरीर के वजन को भी संतुलित रखते हैं। ज्यादा मांसाहार मोटापा भी बढ़ा देता है। मांस में वसा की मात्रा बहुत होती है। हमारे शरीर को सबसे ज्यादा जरूरत होती है कार्बोहाड्रेट की।

अगर आप सोचते हैं कि यह मांस में मिलेगा तो आप गलत हैं,क्योंकि मांस में कार्बोहाइड्रेट बिलकुल नहीं होता। यह ब्रेड,रोटी,केले और आलू वगैरह में पाया जाता है। कार्बोहाइड्रेट की कमी से मधुमेह जैसी बीमारियां हो सकती हैं। कैल्शियम शरीर को न मिले तो हमारी हड्डियां औरदांत तक कमजोर हो जाते हैं। कैल्शियम कभी भी मांस से नहीं मिलता।

यह दूध, बादाम और दूध से बनी चीजों जैसे दही-पनीर से मिलता है। हीमोग्लोबिन की कमी से व्यक्ति एनीमिया का शिकार हो जाता है। इसका स्तर मांस के सेवन से कभी नहीं बढ़ता। यह हरी पत्तेदार सब्जियों,पुदीना और गुड़ आदि में अधिक मात्रा में पाया जाता है। भरपूर पौष्टिक खाना शरीर को ऊर्जा देता है जो मांस से नहीं मिल सकता। हरी पत्तेदार सब्जियों में विटामिन 'के' भी होता है।

इसकी कमी से रक्तस्राव होने का डर रहता है। मनुष्य मूलतः शाकाहारी है। ज्यादा मांसाहार से चिड़चिड़ेपन के साथ स्वभाव उग्र होने लगता है। यह वस्तुतः तन के साथ मन को भी अस्वस्थ कर देता है। प्रकृति ने कितनी चीजें दी हैं जिन्हें खाकर हम स्वस्थ रह सकते है फिर मांस ही क्यों?अब तय आपको करना है कि शाकाहार बेहतर है या मांसाहार।





 

{चेतावनी :- इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं, इस लेख से आपकी स्वार्थी भावनाओँ को ठेस पहुंची हो तो क्षमा करे...}

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जहाँ निष्ठुरता आवश्यक है……………

4 Feb 2016

एक बार यात्रा में, हम दो मित्र शाकाहार- मांसाहार पर चर्चा कर रहे थे। मित्र नें कहा यार लोग किसी जीवित प्राणी को मारकर कैसे खा लेते होंगे? यह तो क्रूरता है।

सामने सीट पर बैठे दो मित्र हमारी चर्चा को ध्यान से सुन रहे थे, मांसाहार समर्थक थे, निर्दयता वाला वाक्य उन्हे नागवार गुजर रहा था। हमें निरुत्तर करने के उद्देश्य से बडा सम्वेदनशील प्रश्न उछाला “आप मांसाहार करने वालो को राक्षस कहते हो, हमारे देश की रक्षा करने वाले वीर सैनिक भी मांसाहार करते है, आपने सैनिको को राक्षस क्यों कहा?

आचानक मुँहगोले की फैके गए प्रश्न पर हमें हतप्रभ देखकर एक क्षण के लिये उनके चहरो पर कुटिल मुस्कान तैर गई। हमने उनकी मंशा को परखते हुए कहा- देखो दोस्त, हमारे मुंह में शब्द न ठूसो, हालांकि सेना में आहार सैनिक की व्यक्तिगत पसंद होता है,

फिर भी यदि किसी सैनिक के मन में यह भ्रांत धारणा हो कि माँसाहार से निष्ठुरता आती है तब तो मांसाहार हमारे ही तर्क की पुष्ठि ही कर रहा है, वे यह मानकर मांसाहार कर रहे है कि उनमें शत्रु के प्रति क्रूर निष्ठुर भाव बने रहे, कहीं शत्रुओं को देखकर उनमें दया-करूणा के भाव न आ जाय। ताकि वे दुश्मनो पर राक्षस की तरह टूट पडें।

इस तर्क से तो इस बात को बल मिलता है कि मांसाहार से क्रूर निष्ठूर भाव उपजने की सम्भावनाएं अधिक है। तर्क के लिए तो यह बात ठीक है किन्तु यह भ्रम फैलाया जा रहा है कि सेना में निष्ठुरता वीरता और बलवृद्धि के लिए माँसाहार प्रयोग होता है। सच्चाई तो यह है कि आहार शैली सैनिकों का स्वतंत्र और नितांत ही निजि निर्णय होता है।

सेना के आहार में अंडे व मांस कोई अनिवार्यता नहीं है, अतीत में कईं शाकाहारी योद्धाओं नें शत्रुओं से लोहा लिया है और आज भी कईं शाकाहारी वीर सैन्य में उत्कृष्ट प्रदर्शन करते है।

निसंदेह वे शक्तिशाली और पर्याप्त पोषण अपने शाकाहारी पदार्थो से बखुबी प्राप्त करते है। बस युद्धभूमि में शत्रु के प्रति निष्ठुरता एक अनिवार्य विवेक है जो कि प्रत्येक वीर का साहसी गुण है।

 

 





 

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शाकाहार में भी हिंसा? एक बड़ा सवाल!!

4 Feb 2016

माँसाहार के कुछ समर्थक, माँसाहार को जबरन योग्य साबित करने के लिये पूछते हैं कि जब वनस्पति में भी जीवन है तो फिर पशु हत्या ही हिंसा क्यों मानी जाती है। ऐसे मांसाहार प्रवर्तक/समर्थक यह दावा करते हैं कि शाक, सब्जी या अन्य शाकाहारी पदार्थों के उत्पादन, तोड़ने तथा सेवन करने पर भी जीव की हिंसा होती है। वे पूछते हैं कि ऐसे में पशु या पक्षियों को मारकर खाने को ही हिंसा व क्रूरता क्यों माना जाता है? यह कुतर्क प्रस्तुत करते हुए ये तथाकथित विद्वान कभी भी अपना पक्ष स्पष्ट नहीं करते कि शाकाहार और मांसाहार दोनों में हिंसा है तो क्या वे इन दोनो ही का त्याग करने वाले हैं अथवा यह कहना चाहते है कि जब शाकाहारी माँसाहारी दोनो पदार्थों में हिंसा है तो इन दोनों में से जो अधिक क्रूर व वीभत्स हत्या हो, जहां स्पष्ट अत्याचार व आर्तनाद दृष्टिगोचर होता हो, समझते बूझते हुए भी वही हत्या और हिंसा अपना लेनी चाहिए? क्रूर सच्चाई तो यह है कि माँसाहार समर्थकों का यह तर्क, सूक्ष्म और वनस्पति जीवन के प्रति करुणा से नहीं उपजा है।

बल्कि यह क्रूरतम पशु हिंसा को सामान्य बताकर महिमामण्डित करने की दुर्भावना से उपजा है। शाकाहार की तुलना मांसाहार से करना और दोनों को समान ठहराना न केवल अवैज्ञानिक और असत्य है बल्कि अनुचित व अविवेक पूर्ण कृत्य है। एक ओर तो साक्षात जीता जागता प्राणी , अपनी जान बचाने के लिए भागता, संघर्ष करता, बेबसी महसुस करता प्राणी , सहायता के लिए याचना भरी निगाहों से आपकी ओर ताकता आतंकित प्राणी , चोट व घात पर दर्द और पीड़ा से आर्तनाद कर तड़पता, छटपटाता प्राणी और उसे मरते देख रोते –बिलखते अन्य प्राणी? तब भी यदि करूणा नहीं जगती तो निश्चित ही यह मानव मन के निष्ठुर व क्रूर भावों की पराकाष्टा होनी चाहिए। प्रकृति में दो तरह के जीव है। त्रस और स्थावर। मनुष्य पशु पक्षी मछली आदि स्थूल त्रस जीव है, वे ठंड-गर्मी, भय-त्रास आदि से बचाव के लिए हलन-चलन में सक्षम है। जबकि पेड पौधे बादर स्थावर है उनमें ठंड-गर्मी, भय-त्रास से बचने की चेतना और स्फुरण ही पैदा नहीं होता। भारतीय वनस्पतिशास्त्री

जगदीश चन्द्र बसु के प्रयोगों से पश्चिमी सोच में पहली बार यह प्रस्थापना हुई कि वनस्पति में जीवन है। हालांकि भारतीय मनीषा में यह तथ्य स्थापित था कि वनस्पति में भी जीवन है। परंतु यह जीवन प्राणी-जीवन से सर्वथा भिन्न है। वनस्पति में वह जीवन इस सीमित अर्थ में हैं कि पादप बढते हैं, श्वसन करते हैं, भोजन बनाते हैं और अपने जैसी कृतियों को जन्म देते हैं। स्वयं जगदीश चन्द्र बसु कहते है, - पशु-पक्षी हत्या के समय मरणांतक पीड़ा महसुस करते है, और बेहद आतंक ग्रस्त होते है। जबकि पेड़-पौधे इस प्रकार आतंक महसूस नहीं करते, क्योंकि उनमें सम्वेदी तंत्रिका-तंत्र का अभाव है। पौधों में प्राणियों जैसी सम्वेदना का प्रश्न ही नहीं उठता। उनमें सम्वेदी तंत्रिकातंत्र पूर्णतः अनुपस्थित है। न उनमें मस्तिष्क होता है और न ही प्राणियों जैसी सम्वेदी-तंत्र संरचना। सम्वेदना तंत्र के अभाव में शाकाहार और मांसाहार के लिए पौधों और पशुओं के मध्य समान हिंसा की कल्पना पूरी तरह से असंगत है। जैसे एक समान दिखने वाले कांच और हीरे के मूल्य में अंतर होता है और वह अंतर उनकी गुणवत्ता के आधार पर होता है।

उसी प्रकार एक बकरे के जीव और एक फल के जीव के जीवन-मूल्य में भी भारी अंतर है। पशुपक्षी में चेतना जागृत होती है उन्हें मरने से भय (अभिनिवेश) भी लगता है। क्षुद्र से क्षुद्र कीट भी मृत्यु या शरीरोच्छेद से बचना चाहता है। पशु पक्षी आदि में पाँच इन्द्रिय होती है वह जीव उन पाँचो इन्द्रियों से सुख अथवा दुख अनुभव करता है, सहता है, भोगता है। कान, आंख, नाक, जिव्हा और त्वचा तो उन इन्द्रियों के उपकरण है इन इन्द्रिय अवयवों के त्रृटिपूर्ण या निष्क्रिय होने पर भी पाँच इन्द्रिय जीव, प्राणघात और मृत्युवेदना, सभी पाँचों इन्द्रिय सम्वेदको से अनुभव करता है। यही वह संरचना है जिसके आधार पर प्राणियों का सम्वेदी तंत्रिका तंत्र काम करता है। जाहिर है, जीव जितना अधिक इन्द्रियसमर्थ होगा, उसकी मरणांतक वेदना और पीड़ा उतनी ही दारुण होगी। इसीलिए पंचेन्द्रिय (पशु-पक्षी आदि) का प्राण-घात, करूण प्रसंग बन उठता है। क्रूर भावों के निस्तार के लिए, करूणा यहां प्रासंगिक है।

विवेक यहां अहिंसक या अल्पहिंसक विकल्प का आग्रह करता है। आहार का चुनाव करते समय हमें अपने विवेक को वैज्ञानिक अभिगम देना होगा। वैज्ञानिक दृष्टिकोण है कि सृष्टि में जीवन विकास क्रम, सूक्ष्म एक-कोशिकीय (एकेन्द्रिय) जीव से प्रारंभ होकर पंचेंद्रिय तक पहुँचा है। पशु-पक्षी आदि पूर्ण विकसित प्राणी है। यदि हमारा जीवन, न्यूनतम हिंसा से चल सकता है तो हमें कोई अधिकार नहीं बनता, हम विकसित प्राणी की अनावश्यक हिंसा करें। उपभोग संयम का अनुशासन भी नितांत ही आवश्यक है। प्राकृतिक संसाधनों का दुरुपयोग, दुष्कृत्य के समान है। विकल्प उपलब्ध होते हुए भी जीव विकास क्रम को खण्डित/बाधित करना, प्रकृति के साथ जघन्य अपराध है।

 

इस लेख के पूर्वार्ध "शाकाहार में भी हिंसा? एक बड़ा सवाल" में आपने पढा- माँसाहार समर्थकों का यह कुतर्क,कि वनस्पति में भी जीवन होता है, उन्हें आहार बनाने पर हिंसा होती है। यह तर्क उनके दिलों में सूक्ष्म और वनस्पति जीवन के प्रति करुणा से नहीं उपजा है। बल्कि यह तो क्रूरतम पशु हिंसा को सामान्य बताकर महिमामण्डित करने की दुर्भावना से उपजा है। फिर भी सच्चाई तो यह है कि पौधे मृत्यु पूर्व आतंक महसुस नहीं करते, न ही उनमें मरणांतक दारूण वेदना महसुस करने लायक, सम्वेदी तंत्रिका तंत्र होता है। ऐसे में विचारणीय प्रश्न, उस हत्या से भी कहीं अधिक हमारे करूण भावों के संरक्षण का  होता है। क्रूर निष्ठुर भावों से दूरी आवश्यक है। हमारा मानवीय विवेक, हमें अहिंसक या अल्पहिंसक आहार विकल्प का ही आग्रह करता है।
उसी परिपेक्ष्य में अब देखते है पशु एवं पौधों में तुलनात्मक भिन्नता……

पेड-पौधों से फल पक कर स्वतः ही अलग होकर गिर पडते है। वृक्षों की टहनियां पत्ते आदि कटने पर पुनः उग आते है। कईं पौधों की कलमें लगाई जा सकती है। एक जगह से पूरा वृक्ष ही उखाड़ कर पुनः रोपा जा सकता है। किन्तु पशु पक्षियों के साथ ऐसा नहीं है। उनका कोई भी अंग भंग कर दिया जाय तो वे सदैव के लिए विकलांग, मरणासन्न या मर भी जाते हैं। सभी जीव अपने अपने दैहिक अंगों से पेट भरने के लिये भोजन जुटाने की चेष्टा करते हैं जबकि वनस्पतियां चेष्टा रहित है और स्थिर रहती हैं। उनको पानी तथा खाद के लिये प्रकृति या दूसरे जीवों पर आश्रित रहना पड़ता है। पेड-पौधो के किसी भी अंग को विलग किया जाय तो वह पुनः पनप जाता है। एक नया अंग विकसित हो जाता है। यहां तक कि पतझड में उजड कर ठूँठ बना वृक्ष फिर से हरा-भरा हो जाता है।

उनके अंग नैसर्गिक/स्वाभाविक रूप से पुनर्विकास में सक्षम होते है। वनस्पति के विपरीत पशुओं में कोई ऐसा अंग नही है जो उसे पुनः समर्थ बना सके, जैसे आंख चली जाय तो पुनः नहीं आती वह देख नहीं सकता, कान नाक या मुंह चला जाय तो वह अपना भोजन प्राप्त नहीं कर सकता। पर पेड की कोई शाखा टहनी अलग भी हो जाय पुनः विकसित हो जाती है। वृक्ष को इससे अंतर नहीं पड़ता और न उन्हें पीड़ा होती है। इसीलिए कहा गया है कि पशु–पक्षियों का जीवन अमूल्य है, वह इसी अर्थ में कि मनुष्य इन्हें  पौधों की भांति धरती से उत्पन्न नहीं कर सकता।

भोजन के लिए अनाज की प्रायः उपज ली जाती है , फसल काटकर अनाज तब प्राप्त किया जाता है, जब पौधा सूख जाता है। इस उपक्रम में वह अपना जीवन चक्र पूर्ण कर चुका होता है, और स्वयं निर्जीव हो जाता है। ऐसे में उसके साथ हिंसा या अत्याचार जैसे अन्याय का प्रश्न ही नहीं होता, इसलिए सूखे अनाज का आहार सर्वोत्कृष्ट आहार है।

कहते है बीज में नवजीवन पाने की क्षमता होती है, यदि इस कारण से बीज को एकेन्द्रीय जीव मान भी लिया जाय, तब भी वह सुषुप्त अवस्था में होता है। जब तक उस बीज को अनुकूल मिट्टी हवा पानी का संयोग न हो, वह अंकुरित ही नहीं होता। हम जानते है, प्रायः बीज सैकडों वर्ष तक सुरक्षित रह सकते है। ऐसे में शीघ्र सड़न-गलन को प्राप्त होने जैसे मुर्दा लक्षण वाले, अण्डे व मांस, जो अनेक सूक्ष्म जीवाणुओं की उत्पत्ति के गढ़ समान है। उर्वरशक्ति धारी, एक स्पर्शेन्द्रिय, नवजीवन सम्भाव्य बीज से उनकी कोई तुलना नहीं है।

यदि उत्कृष्ट आहार के बारे में सोचा जाय तो वे फल जो स्वयं पककर पेड़ पर से गिर जाते हैं, सर्वश्रेष्ठ हैं क्योंकि इस प्रक्रिया में पेड़ के जीवन को कोई खतरा नहीं है न ही किसी प्रकार की वेदना की सम्भावना बनती है। साथ ही फल व सब्जियां जिनके उत्पादन के लिए पेड़ पौधे लगाए जाते हें और उनके फल तोड़कर भोजन के काम में लिए जाते हें, इसमें भी कच्चे और अविकसित फलों की अपेक्षा, विकसित परिपक्व फलों के सेवन को उचित मानना चाहिए। इस प्रक्रिया में एक एक वृक्ष अनेकों, सैकड़ों, हजारों या लाखों प्राणियों का पोषण करता है। और काल क्रम से अपना आयुष्य पूर्ण कर स्वयंमेव मृत्यु को प्राप्त होता है। पेड प्राकृतिक रूप से फल आदि में मधुर स्वादिष्ट गूदा इसीलिए पैदा करते है ताकि उसे खाकर कोई प्राणी, नवपौध रूपी बीज को अन्यत्र प्रसार प्रदान करे। विवेकवान को ऐसे बीज उपजाऊ धरती को सुरक्षित अर्पण करने ही चाहिए। यह उत्कृष्ट सदाचार है।

यदि करुणा का विस्तार करना है तो शस्य कहे जाने वाले वनस्पति में भी कन्द मूल के भोजन से बचा जा सकता है क्योंकि उनके लिये पौधे को जड़ सहित उखाड़ा जाता है। इस प्रक्रिया में पौधे का जीवन समाप्त होता है फिर भी इस श्रेणी के शाकाहार में कम से कम चर जीवों की घात तो नहीं होती। इस कारण यह मांसाहार की अपेक्षा श्रेयस्कर ही है। इसकी तुलना किसी भी तरह से मांसाहार से नहीं की जा सकती है, क्योंकि मांस में प्रतिपल अनन्त जीवों की उत्पत्ति होती ही रहती है माँस में मात्र उस एक प्राणी की ही हिंसा नहीं है वरन् मांस पर आश्रित अनेकों जीवों की भी हिंसा व्याप्त होती है।

अतः हिंसा और अहिंसा के चिंतन को सूक्ष्म-स्थूल, संकल्प-विकल्प, सापराध-निरपराध, सापेक्ष-निरपेक्ष, सार्थक -निरर्थक के समग्र सम्यक् दृष्टिकोण से विवेचित किया जाना चाहिए। साथ ही उस हिंसा के परिणामों पर पूर्व में ही विचार किया जाना चाहिए।

निर्ममता के विपरीत दयालुता, क्रूरता के विपरित करूणा, निष्ठुरता के विपरीत संवेदनशीलता, दूसरे को कष्ट देने के विपरीत जीने का अधिकार देने के सदाचार का नाम शाकाहार है। इसीलिए शाकाहार सभ्य खाद्याचार है।

सूक्ष्म हिंसा अपरिहार्य हो, फिर भी द्वेष व क्रूर भावों से बचे रहना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए । यही अहिंसक मनोवृति है। न्यून से न्यूनतम हिंसा का विवेक रखना ही तो हमारे मानवीय जीवन मूल्य है। हिंसकभाव से भी विरत रहना अहिंसा पालन है। बुद्धि, विवेक और सजगता से अपनी आवश्यकताओं को संयत व सीमित रखना, अहिंसक वृति की साधना है।

पश्चिमी विद्वान मोरिस सी. किंघली के यह शब्द बहुत कुछ कह जाते है, "यदि पृथ्वी पर स्वर्ग का साम्राज्य स्थापित करना है तो पहले कदम के रूप में माँस भोजन को सर्वथा वर्जनीय करना होगा, क्योंकि माँसाहार अहिंसक समाज की रचना में सबसे बडी बाधा है।"

 





 

{चेतावनी :- इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं, इस लेख से आपकी स्वार्थी भावनाओँ को ठेस पहुंची हो तो क्षमा करे...}

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ये क्या कर रही है RSS ?, गीता का अपमान ?

24 Jan 2016

ये क्या कर रही है RSS ?, गीता का अपमान ?

पिछले कुछ दिनों से कहा जा रहा है की मोदी सरकार स्कूलो में श्रीमदभगवद गीता पढ़ाने जा रही हैं |

परन्तु गीता पढ़ाने वालो को पहले स्वयं गीता पढ़नी चाहिए, क्योंकि जिनमे श्रद्धा और विवेक नहीं है वह मनुष्य ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता और ऐसे लोगो को गीता पढ़ा कर गीता का अपमान करना नहीं है तो क्यां हैं ? मैं भी स्वयं RSS और BJP का कार्यकर्ता हूं पर इस मामले का मैं पुरजोर विरोध करता हूँ |

क्योंकि स्वयं भगवान श्रीकृष्ण इस की अनुमति नहीं देते,

इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन । न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥

गीता अध्याय 18 श्लोक 67,

अर्थात, तुझे यह गीत रूप रहस्यमय उपदेश किसी भी काल में न तो तपरहित मनुष्य से कहना चाहिए, न भक्ति-(वेद, शास्त्र और परमेश्वर तथा महात्मा और गुरुजनों में श्रद्धा, प्रेम और पूज्य भाव का नाम 'भक्ति' है।)-रहित से और न बिना सुनने की इच्छा वाले से ही कहना चाहिए तथा जो मुझमें दोषदृष्टि रखता है, उससे तो कभी भी नहीं कहना चाहिए॥67॥

नातपस्काय :- अभिप्राय यह हैँ की यह गीताशास्त्र बडा ही गुप्त रखनेयोग्य विषय हैँ, अत: जो मनुष्य स्वधर्मपालनरुप तप करनेवाला न हो, भोगोँकी आसत्किके कारण सांसारीक विषय सुखके लोभसे अपने धर्मका त्याग करके पापकर्मो मे प्रवृत हो ऐसे मनुष्य को तत्त्वके वर्णन से भरपुर यह गीताशास्र नही सुनाना चाहिये, इससे इस उपदेश का और भगवान का भी अनादर होगा ।

नाभक्ताय :- जो परमेश्वर मेँ विश्र्वास, प्रेम और पुज्य भाव नहीँ रखता; ऐसे नास्तिक मनुष्यको भी यह अत्यन्त गोपनीय गीताशास्त्र नही सुनाना चाहीये,

न चाशुश्रूषवे :- जिसकी गीताशास्त्र मेँ श्रद्दा और प्रेम न होनेके कारण वह उसे सुनना न चाहता हो, तो उसे भी यह परम गोपनिय शास्त्र नहीँ सुनाना चाहीये, इससे भगवान का और उपदेश का अनादर होता हैँ...।

योऽभ्यसुयति :- परमेश्वर मेँ जिसकी दोषदृष्टि हैँ, जो परमेश्वर के गुणोँमेँ दोषारोपण करके परमेश्वर की निन्दा करनेवाला हैँ ऐसे मनुष्य को तो कीसी भी हालत मेँ यह उपदेश नहीँ सुनाना चाहिये; क्योँकी वह भगवान के गुण, प्रभाव और ऐश्वर्यको न सह सकनेके कारण इस उपदेशको सुनकर भगवान की पहलेसे भी अधिक अवज्ञा करेगा,

 

तो अगर एक कक्षा की बात की जाये तो वहा पर विभिन्न धर्म तथा संप्रदाय के बच्चे पढ़ने आते हैं, उनमे कुछ हिन्दू, सिख तथा जैन बच्चो को छोड़ दिया जाये तो ज्यादातर मुस्लिम, इसाई और निरईश्वरवादी बुद्ध होते हैं,

वे भगवान को गाली देते हैं और ऐसे लोगो को गीता पढ़ा कर गीता का अपमान कराना नहीं है तो क्यां हैं ? ऐसे बच्चे जो मांस खानेवाले हैं या फिर हिंसक है वह ये बाते नहीं समझ सकते क्योंकि

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते । तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ॥

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः । ज्ञानं लब्धवा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥

अज्ञश्चश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति । नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ॥

गीता अध्याय 4 श्लोक 38 से 40,

अर्थात, इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निःसंदेह कुछ भी नहीं है। उस ज्ञान को कितने ही काल से कर्मयोग द्वारा शुद्धान्तःकरण हुआ मनुष्य अपने-आप ही आत्मा में पा लेता है ॥38॥

जितेन्द्रिय, साधनपरायण और श्रद्धावान मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता है तथा ज्ञान को प्राप्त होकर वह बिना विलम्ब के- तत्काल ही भगवत्प्राप्तिरूप परम शान्ति को प्राप्त हो जाता है॥39॥

विवेकहीन और श्रद्धारहित संशययुक्त मनुष्य परमार्थ से अवश्य भ्रष्ट हो जाता है। ऐसे संशययुक्त मनुष्य के लिए न यह लोक है, न परलोक है और न सुख ही है ॥40॥

 

 जो निरईश्वरवादी दलित बौद्धधर्मी लोग कहते की तुम्हारे कृष्ण ने तो गोपियों को नग्न देखा था, ये कैसा भगवान है ?

और विडम्बना ये है की उन लोगो को भी गीता पढाई जायेगी, जो बार बार भगवान को गालिया देते आये है, और आगे भी करते रहेंगे जो क्रूरकर्मी नराधम लोगो को छोड़ दो पर जो अपने हिन्दू है वे भी गीता समझते तो यु मांस नहीं खाया करते,

एक श्लोक क्या सुनाया तो मुह बनाने लगते हैं,

ये गीता शास्त्र कितना गोपनीय है इसके कुछ प्रमाण देखते है...

  • स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः । भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्‌ ॥

         (गीता 4-3)

  • तू मेरा भक्त और प्रिय सखा है, इसलिए वही यह पुरातन योग आज मैंने तुझको कहा है क्योंकि यह बड़ा ही उत्तम रहस्य है अर्थात गुप्त रखने योग्य विषय है॥3॥

 

  • इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे । ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्‌ ॥

         (गीता 9-1)

  • तुझ दोषदृष्टिरहित भक्त के लिए इस परम गोपनीय विज्ञान सहित ज्ञान को पुनः भली भाँति कहूँगा, जिसको जानकर तू दुःखरूप संसार से मुक्त हो जाएगा,

 

  • राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम्‌ । प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम्‌ ॥

         (गीता 9-2)

  • यह विज्ञान सहित ज्ञान सब विद्याओं का राजा, सब गोपनीयों का राजा, अति पवित्र, अति उत्तम, प्रत्यक्ष फलवाला, धर्मयुक्त, साधन करने में बड़ा सुगम और अविनाशी है,

 

 

  • भूय एव महाबाहो श्रृणु मे परमं वचः ।

         (गीता 10-1)

  • हे महाबाहो! फिर भी मेरे परम रहस्य और प्रभावयुक्त वचन को सुन,

 

  • परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानं मानमुत्तमम्‌ ।

         (गीता 14-1)

  • ज्ञानों में भी अतिउत्तम उस परम ज्ञान को मैं फिर कहूँगा,

 

  • इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ ।

         (गीता 15-20)

  • हे निष्पाप अर्जुन! इस प्रकार यह अति रहस्ययुक्त गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया,

 

  • इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुपह्यतरं मया ।

         (गीता 18-63)

  • इस प्रकार यह गोपनीय से भी अति गोपनीय ज्ञान मैंने तुमसे कह दिया,

 

  • सर्वगुह्यतमं भूतः श्रृणु मे परमं वचः ।

         (गीता 18-64)

  • संपूर्ण गोपनीयों से अति गोपनीय मेरे परम रहस्ययुक्त वचन को तू फिर भी सुन,

 

कितनि भी गीता पढ़ लो या पढ़ा लो पर ज्ञान तब प्राप्त होता है जब भगवान देते हैं, और भगवान किस भक्त को ज्ञान देते हैं ?

  • तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्‌ । ददामि बद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥

  • तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः। नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥

        (गीता 10-10 और 11 )

  • उन निरंतर मेरे ध्यान आदि में लगे हुए और प्रेमपूर्वक भजने वाले भक्तों को मैं वह तत्त्वज्ञानरूप योग देता हूँ, जिससे वे मुझको ही प्राप्त होते हैं॥10॥

  • हे अर्जुन! उनके ऊपर अनुग्रह करने के लिए उनके अंतःकरण में स्थित हुआ मैं स्वयं ही उनके अज्ञानजनित अंधकार को प्रकाशमय तत्त्वज्ञानरूप दीपक के द्वारा नष्ट कर देता हूँ ॥11॥

इसीलिए सरकार से अनुरोध है की गीता का बाजारीकरण ना करे और गीता को यु अपमानित ना करे, इसके बजाय महाभारत और रामायण की कहानिया सुनाये परन्तु बिना सुनने की इच्छा वालो को गीता पढ़ा कर भगवान का अपमान ना करे... इस लेख से आपकी स्वार्थी भावनाओ को ठेस पहुंची हो तो माफ़ करे... और शेयर करे...

 

- एक इश्वरप्रेमी..





{चेतावनी :- इस लेख में हिन्दू धर्म के धर्मग्रन्थ श्रीमदभागवतगीता जी के  प्रमाण लिए गए है तथा  लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं, इस लेख से आपकी स्वार्थी भावनाओँ को ठेस पहुंची हो तो क्षमा करे...सर्वाधार सुरक्षित}

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कुरान और गीता के कुछ फर्क-
1:-कुरान कहती है मुसलिम बनो,
1:- #गीता कहती है मनुष्य बनो,

 2:-कुरान के अनुसार जानबर हराम है उन्हे मार के खा जाओ,
2:- गीता के अनुसार जानवर और हर जीवित प्राणी की रक्षा करो, 

3:- कुरान कहती है बच्चे पैदा करो सुअर की तरह
3:- गीता कहती है नियत्रण रखो

 4:-कुरान कहती है इस्लाम के लिए जियो मरो
4:- गीता कहती है मनुष्य बनो इन्सानियत और देश के लिए जियो

  5:-कुरान कहती है आंतकबाद फैलाओ
 5:- गीता कहती है प्रेम फैलाओ 

6:-कुरान कहती है 4-4 शादीया करो
6:- गीता कहती है मर्यादा पुरुसुत्तम बनो (एक ही शादी)

 7:- कुरान कहती है दूसरे धर्म की लडकियो के साथ लवजिहद फैलाओ 72 हूर्यो मिलेगी
7:- गीता कहती है मर्यादा मे रहो 

8:-कुरान कहती है शिक्षा हराम है
 8:- गीता कहती है विध्या ग्यान जरूरी है

 9:-कुरान कहती है औरते हराम है
9:- गीता कहती है औरते दुर्गा का रूप है 

10:- कुरान-लडकियों को कैद कर के रखो
 10:- गीता- स्त्री को पुरुष के समान अधिकार दों 

11:-कुरान-औरते सिर्फ उपभोग के लिए है,
11:- गीता- स्त्री हमारे लिए पूजनीय् हैं,