जहाँ निष्ठुरता आवश्यक है……………

एक बार यात्रा में, हम दो मित्र शाकाहार- मांसाहार पर चर्चा कर रहे थे। मित्र नें कहा यार लोग किसी जीवित प्राणी को मारकर कैसे खा लेते होंगे? यह तो क्रूरता है।

सामने सीट पर बैठे दो मित्र हमारी चर्चा को ध्यान से सुन रहे थे, मांसाहार समर्थक थे, निर्दयता वाला वाक्य उन्हे नागवार गुजर रहा था। हमें निरुत्तर करने के उद्देश्य से बडा सम्वेदनशील प्रश्न उछाला “आप मांसाहार करने वालो को राक्षस कहते हो, हमारे देश की रक्षा करने वाले वीर सैनिक भी मांसाहार करते है, आपने सैनिको को राक्षस क्यों कहा?

आचानक मुँहगोले की फैके गए प्रश्न पर हमें हतप्रभ देखकर एक क्षण के लिये उनके चहरो पर कुटिल मुस्कान तैर गई। हमने उनकी मंशा को परखते हुए कहा- देखो दोस्त, हमारे मुंह में शब्द न ठूसो, हालांकि सेना में आहार सैनिक की व्यक्तिगत पसंद होता है,

फिर भी यदि किसी सैनिक के मन में यह भ्रांत धारणा हो कि माँसाहार से निष्ठुरता आती है तब तो मांसाहार हमारे ही तर्क की पुष्ठि ही कर रहा है, वे यह मानकर मांसाहार कर रहे है कि उनमें शत्रु के प्रति क्रूर निष्ठुर भाव बने रहे, कहीं शत्रुओं को देखकर उनमें दया-करूणा के भाव न आ जाय। ताकि वे दुश्मनो पर राक्षस की तरह टूट पडें।

इस तर्क से तो इस बात को बल मिलता है कि मांसाहार से क्रूर निष्ठूर भाव उपजने की सम्भावनाएं अधिक है। तर्क के लिए तो यह बात ठीक है किन्तु यह भ्रम फैलाया जा रहा है कि सेना में निष्ठुरता वीरता और बलवृद्धि के लिए माँसाहार प्रयोग होता है। सच्चाई तो यह है कि आहार शैली सैनिकों का स्वतंत्र और नितांत ही निजि निर्णय होता है।

सेना के आहार में अंडे व मांस कोई अनिवार्यता नहीं है, अतीत में कईं शाकाहारी योद्धाओं नें शत्रुओं से लोहा लिया है और आज भी कईं शाकाहारी वीर सैन्य में उत्कृष्ट प्रदर्शन करते है।

निसंदेह वे शक्तिशाली और पर्याप्त पोषण अपने शाकाहारी पदार्थो से बखुबी प्राप्त करते है। बस युद्धभूमि में शत्रु के प्रति निष्ठुरता एक अनिवार्य विवेक है जो कि प्रत्येक वीर का साहसी गुण है।

 

 





 

{चेतावनी :- इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं, इस लेख से आपकी स्वार्थी भावनाओँ को ठेस पहुंची हो तो क्षमा करे...}

[The All Rights Reserved By Writer ... ]

{Produced, Directed & Written By Sarangdhar Ambildhuke }





4 Feb 2016