मांस खाने वाले लोग हिन्दु कहलाने के लायक हीँ नहीँ...?(शायद वो खुद को हिन-बुद्धी समझ सकते हैँ...)

सात्विक आहार अपनाओ मांसाहार त्यागो !!

बड़े ही दुःख की बात है कि धार्मिक ज्ञान के अभाव, और पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव में आकर आजकल के हिन्दू युवा वर्ग में माँसाहारी भोजन करने का फैशन हो गया है, कुछ लोग तो अण्डों को वेजिटेरियन मानने लगे हैं, कुछ लोग तो केवल शौक के लिए चिकन, मछली और मीट खाने लगे हैं, इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि ऐसे लोग किसी न किसी रोग से ग्रस्त पाये गए हैं, आज ऐसे लोगों को उचित मार्गदर्शन की जरुरत है,

हिन्दू धर्मशास्त्रों मे एकमत से सभी जीवों को ईश्वर का वंश माना हैँ व अहिंसा, दया, प्रेम, क्षमा आदि गुणों को अत्यंत महत्व दिया, मांसाहार को बिल्कुल त्याज्य, दोषपूर्ण, आयु क्षीण करने वाला व पाप योनियों में ले जाने वाला कहा है ।

महाभारत के अनुशासन पर्व में भीष्म पितामह ने मांस खाने वाले, मांस का व्यापार करने वाले व मांस के लिये जीव हत्या करने वाले तीनों को दोषी बताया है ।

उन्होने कहा हैं कि

जो दूसरे के मांस से अपना मांस बढ़ाना चाहता है वह जहा कहीं भी जन्म लेता है चैन से नहीं रह पाता ।

जो अन्य प्राणियों का मांस खाते है वे दूसरे जन्म में उन्हीं प्राणियों द्वारा भक्षण किये जाते है । जिस प्राणी का वध किया जाता है वह यही कहता है

"मांस भक्षयते यस्माद भक्षयिष्ये तमप्यहमू"

अर्थात् आज वह मुझे खाता है तो कभी मैं उसे खाऊँगा ।

भगवान श्रीकृष्णने श्रीमद्भगवत गीता में भोजन की तीन श्रेणियाँ बताई है ।

(1) सात्त्विक भोजन-जैसे फल, सब्जी, अनाज, दालें, मेवे, दूध, मक्सन इत्यादि

जो अग्यु, बुद्धि बल बढ़ाते है व सुख, शांति, दया भाव, अहिंसा भाव व एकरसता प्रदान करते है व हर प्रकार की अशुद्धियों से शरीर, दिल व मस्तिष्क को बचाते हैं !

(2) राजसिक भोजन- अति गर्म, तीखे, कड़वे, खट्टे, मिर्च मसाले आदि जलन उत्पन्न करने वाले, रूखे पदार्थ शामिल है ।

इस प्रकार का भोजन उत्तेजक होता है व दु:ख, रोग व चिन्ता देने वाला है ।

(3) तामसिक भोजन -जैसे बासी, रसहीन, अर्ध पके,दुर्गन्ध वाले, सड़े अपवित्र नशीले पदार्थ मांस इत्यादि

जो इन्सान को कुसंस्कारों की ओर ले जाने वाले बुद्धि भ्रष्ट करने वाले, रोगों व आलस्य इत्यादि दुर्गुण देने वाले होते हैं ।

वैदिक मत प्रारम्भ से ही अहिंसक और शाकाहारी रहा है,

मासांहारी खाना खाने वाले हिंदु कहलाने के लायक ही नहीँ ऐसे लोग तो महान अपवित्र और घोर नरको मे पडते हैँ ।

भगवान श्रीकृष्णजी के अनुसार जो व्यक्ती मांसाहार का सेवन करता हैँ, वो तामसी और पापी व्यक्ती अधोगती अर्थात नरक को प्राप्त होता हैँ।

भगवान गिता के 17 वे अध्याय के 10 वे श्लोक मेँ कहते हैँ,

यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्‌। उच्छिष्टमपि#चामेध्यं भोजनंतामसप्रियम्‌॥

हे अर्जुन ! जो भोजन अधपका, रसरहित, दुर्गन्धयुक्त, बासी और उच्छिष्ट है तथा जो अपवित्र अर्थात मांसाहार भी है, वह भोजन तामस पुरुष को प्रिय होता है ॥10॥

[# च अमेध्यम् - मांस, अण्डे आदि हिँसामय और शराब ताडी आदी निषिध्द मादक वस्तुएँ - जो स्वभावसे ही अपवित्र हैँ अथवा जिनमेँ किसी प्रकारके सङदोषसे, किसी अपवित्र वस्तु, स्थान, पात्र या व्यक्तिके संगोगसे या अन्याय और अधर्मसे उपार्जित असत् धनके द्वारा प्राप्त होने के कारण अपवित्रता आ गयी हो - उन सभी वस्तुओँको "अमेध्य" कहते हैँ। ऐसे पदार्थ देव - पुजनमेँ भी निषिध्द माने गये हैँ। ]

फिर आप कहोगे की तामस रहने मेँ क्या बुराई हैँ तो तामस लोक कौनसी गती को प्राप्त होते हैँ, ये समझाते हुये भगवान गिता के 14 वे अध्याय के 18 वे श्लोक मेँ कहते हैँ।

ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः । जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥

हे अर्जुन !सत्त्वगुण में स्थित पुरुष स्वर्गादि उच्च लोकों को जाते हैं, रजोगुण में स्थित राजस पुरुष मध्य में अर्थात मनुष्य लोक में ही रहते हैं और तमोगुण के कार्यरूप निद्रा, प्रमाद और आलस्यादि में स्थित तामस पुरुष अधोगति को अर्थात कीट, पशु आदि नीच योनियों को तथा नरकों को प्राप्त होते हैं ॥18॥

शास्रोँ के अनुसार भोजन के दो प्रकार पडते हैँ, शाकाहार और मांसाहार, शाकाहार मनुष्यो का आहार हैँ और मांसाहार राक्षस, पशु, हिंसक जानवर का आहार हैँ। परन्तु मन्युष्य अगर मांसाहार का सेवन करेगा तो उसे भी राक्षस, कुत्ता ,कव्वा, गिधड, सिंह, बाघ, लोमडी, सियार, बिल्ली भी कहना पडेगा क्योँकी, मांसाहार उनका ही तो आहार हैँ। पुरे भारत मेँ दो हीँ ऐसे राज्य हैँ

जो भगवान श्रीकृष्णजीके वचनोँ का पालन करते हुये मांसाहार का सेवन नहीँ करते । गुजरात और राजस्थान,

परन्तु जो मांसाहार का सेवन करते जाते हैँ वो लोग गिता पढे बिना ही भगवान श्रीकृष्णका भक्त होने का ढिँढोरा पिटते रहते हैँ।

(जन्माष्टमी मेँ मुर्तिया स्थापित करते हैँ, सिर्फ दिखावे के लिये भागवत कथा सुनने जाते हैँ, दिखावे के लिये भजन करते हैँ, इत्यादी...)

उन लोगो के बारे भगवान गिता के 16 वे अध्याय के 20 वे श्लोक मेँ कहते हैँ।

आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि। मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्‌॥

हे अर्जुन! वे मूढ़ (मुर्ख) पुरुष मुझको कभी प्राप्त न होकर ही जन्म-जन्म में आसुरी योनि को ही प्राप्त होते हैं, फिर उससे भी अति नीच गति को ही प्राप्त होते हैं अर्थात्‌ घोर नरकों में पड़ते हैं ॥20॥

ऐसे लोग अपनी प्रवृति को कभी नहीँ बदलते...

मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः । राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ॥

वे व्यर्थ आशा, व्यर्थ कर्म और व्यर्थ ज्ञान वाले विक्षिप्तचित्त अज्ञानीजन राक्षसी, आसुरी और मोहिनी प्रकृति को ही धारण किये रहते हैँ॥GEETA 9-12॥

तथा कुछ लोग भगवान का कहना नहीँ मानते हुये मनमाना आचरण करते हैँ, उन लोगोँ के बारे भगवान कहते हैँ...

मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि। अथ चेत्वमहाङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥

हे अर्जुन! उपर्युक्त प्रकार से मुझमें चित्तवाला होकर तू मेरी कृपा से समस्त संकटों को अनायास ही पार कर जाएगा और यदि अहंकार के कारण मेरे वचनों को न सुनेगा तो नष्ट हो जाएगा अर्थात परमार्थ से भ्रष्ट हो जाएगा ॥GEETA 18-58॥

ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम्‌ । सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ॥

हे अर्जुन! परन्तु जो मनुष्य मुझमें दोषारोपण करते हुए मेरे इस मत के अनुसार नहीं चलते हैं, उन मूर्खों को तू सम्पूर्ण ज्ञानों में मोहित और नष्ट हुए ही समझ ॥GEETA 3-32॥

 

कुछ लोग सिर्फ ढोँग को प्राप्त होकर पांखड से दिखावे के लिये भागवत कथा सुनने जाते हैँ परन्तु श्रीमदभागवत् मेँ भी कहा गया हैँ,

श्रीमद्‌भागवत मे नरको की विभिन्न गतियोँका वर्णन करते हुये शुकदेवजी कहते हैँ...

'रुरु' सर्पसे भी अधिक क्रुर स्वभाववाले एक जीवका नाम हैँ ॥11॥

ऐसा ही महारौरव नरक हैँ । इसमेँ वह व्यक्ति जाता हैँ, जो किसीकी परवा न कर केवल अपने ही शरीरको पालता हैँ। मनुष्य शरीरमेँ मांस खाने वालेँ लोगोँ को 'रुरु' इनके भी मांसको काटते हैँ ॥12॥

जो क्रुर मनुष्य इस लोकमेँ अपना पेट पालने के लिये जीवित पशु या पक्षियोँको मार कर खाता हैँ, उस हृदयहीन, राक्षसोँसे भी गये बीते पुरुषको यमदुत कुम्भीपाक नरकमेँ ले जाकर खौलते हुए तैलमेँ रांधते हैँ ॥13॥

[श्रीमदभागवत् स्कन्ध 5, अध्याय 26, श्लोक 11,12,13]

धन - वैभव, कुलीनता, विद्या, दान, सौन्दर्य, बल और कर्म आदिके घमंड से अंधे हो जाते हैं तथा वे दुष्ट उन भगवत्प्रेमी संतो तथा ईश्वर का भी अपमान करते हैं ॥9॥

[श्रीमदभागवत् स्कन्ध 11, अध्याय 5, श्लोक 8,9] 

तथा जिस प्रकार वे मांसभोजी पुरुष पृथ्वी लोकमेँ प्राणीयोँ के मांस भक्षण करके आनन्दित होते थे, उसी प्रकार वे (यमदुत) भी उनका रक्तपान करते और आनन्दित होकर नाचते गाते हैँ ॥31॥

[श्रीमदभागवत् स्कन्ध 5, अध्याय 26, श्लोक 31]

पशुं विधिनालभ्य प्रेतभूतगणान् यजन । नरकानवशो जंतुर्गत्वा यात्युल्बणं तम: ॥

[श्रीमदभागवत् स्कन्ध 11, अध्याय 10, श्लोक 28]

अगर मनुष्य प्राणियोँको सताने लगे और विधी - विरद्ध पशुओँकी बलि देकर भुत और प्रेतोंकी उपासना मेँ लग जाय, तब तो वह पशुओंसे भी गया - बीता होकर अवश्य हीँ नरक मेँ जाता हैँ । उसे अन्त मेँ घोर अन्धकार स्वार्थ और परमार्थ से रहित अज्ञानमेँ ही भटकना पड़ता हैँ॥

वे कर्मका रहस्य न जाननेवाले मुर्ख केवल अपनी जीभको संतुष्ट करने और पेट की भूख मिटाने - शरीर पुष्ट करने के लिए बेचारे पशुओंकी हत्या करते हैं ॥8॥

 

अब वेदो मेँ कहे गये कथन भी देखिए -

य आमं मांसमदन्ति पौरूषेयं च ये क्रवि: ! गर्भान खादन्ति केशवास्तानितो नाशयामसि !!

(अथर्ववेद- 8:6:23)

-जो कच्चा माँस खाते हैं, जो मनुष्यों द्वारा पकाया हुआ माँस खाते हैं, जो गर्भ रूप अंडों का सेवन करते हैं, उन के इस दुष्ट व्यसन का नाश करो !

अघ्न्या यजमानस्य पशून्पाहि

(यजुर्वेद-1:1)

-हे मनुष्यों ! पशु अघ्न्य हैं – कभी न मारने योग्य, पशुओं की रक्षा करो |

अहिंसा परमो धर्मः सर्वप्राणभृतां वरः।

(आदिपर्व- 11:13)

-किसी भी प्राणी को न मारना ही परमधर्म है।

सुरां मत्स्यान्मधु मांसमासवकृसरौदनम् । धूर्तैः प्रवर्तितं ह्येतन्नैतद् वेदेषु कल्पितम् ॥

(शान्तिपर्व- 265:9)

-सुरा, मछली, मद्य, मांस, आसव, कृसरा आदि भोजन, धूर्त प्रवर्तित है जिन्होनें ऐसे अखाद्य को वेदों में कल्पित कर दिया है।

अनुमंता विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी । संस्कर्त्ता चोपहर्त्ता च खादकश्चेति घातका: ॥

(मनुस्मृति- 5:51)

प्राणी के मांस के लिए वध की अनुमति देने वाला, सहमति देनेवाला, मारने वाला, मांस का क्रय विक्रय करने वाला, पकाने वाला, परोसने वाला और खाने वाला सभी घातकी अर्थात हत्यारे हैं...

जातु मांस न भोक्तव्यं,प्राण कैसण्ठग तैरपि

(काशीखण्ड, 353-55)

प्राण चाहे कण्ठ तक ही क्यों न आ जाए, मांसाहार नहीं करना चाहिए |

महर्षि दयानन्द सरस्वती ने सत्यार्थ प्रकाश में कहा हैं कि - मांसाहार से मनुष्य का स्वभाव हिंसक हो जाता है । जो लोग मांस भक्षण व मद्यपान करते हैं उनके शरीर और वीर्यादि धातु भी दूषित होते हैं ।

मांस खाना सभी के लिए अनुचित है।

-आचार्य चाणाक्य

ऐसे लोग जो मनमाना आचरण करते है और कहते है की मरने के बाद नरक किसने देखा तथा शास्त्र की नहीं सुनते वह कभी भी सुख नहीं पा सकते...!

यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्‌॥

हे अर्जुन! जो पुरुष शास्त्र विधि को त्यागकर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है, वह न सिद्धि को प्राप्त होता है, न परमगति को और न सुख को ही॥GEETA 16-23॥

 

" हिन्दु हो तो मांस मत खाओ "

ऐसा कहने पर लोग कहते हैँ की " कुछ नहीँ होता यार, सब चलता हैँ... "

कालांतर के पत्श्यात उनके साथ कोई रोग या हादसा होता हैँ

तो वह भी भगवान से हीँ कहते हैँ की,

" हे भगवान ! ये क्या किया ...? ये क्या कर रहे हो ...? मैंने क्यों से पाप किये थे...?

तब शायद भगवान भी उपर से हसते हुये यही कहते होगेँ...

"कुछ नहीँ होता यार, सब चलता हैँ..."

तो मांसाहारी हिँदुओँ,

Sorry हिन-बुद्दिओँ जवाब दो ।




 

{Directed & Written By Sarangdhar Ambildhuke }



8 Feb 2014