शाकाहार बनाम मांसाहार : कुतर्कों का खण्ड़न

१. हत्या है या नहीं है इस आधार पर

- शाकाहार में हत्या नहीं है (न फल लेने में / न फूल / न सब्जी - क्योंकि ये वस्तुएं पौधे की हत्या किये बिना ही मिलती हैं | इसी तरह न ही अन्न लेने में भी नहीं - क्योंकि अन्न मिलने के लिए काटे जाने से पहले ही वह पौधा अपना जीवन पूरा कर के सूख चूका होता है )

- मांसाहार में हत्या निश्चित है।

२. जो भाग भोजन के लिए मानव लेता है

- वह दोबारा उग सकता है ?

- शाकाहार में - हाँ |

- मांसाहार में - नहीं |

३. यदि मानव उस भाग को मूल जीव (पौधे या चल प्राणी से ) विलग न करे - तो क्या वह स्वयमेव विलग हो जाने वाला है ही समयक्रम में बिना उस प्राणी की मृत्यु के ? 

 - शाकाहार में (फल / फूल / पत्ते ) - हाँ   (श्री गीता जी में कृष्ण कहते हैं - पत्रं /पुष्पं / फलं / तोयं )

- मांसाहार में - नहीं।

४. क्या उस भाग को विलग किया जाना उस जीव को दर्द की और भय की अनुभूति देगा ?

ध्यान दीजिये - दर्द / भय की अनुभूति के लिए यह तर्क दिया जाता है कि पौधों में भी ठीक वैसा ही तंत्रिका तंत्र (neural system)  है - जिससे वे अनुभूति कर पाते हैं -| यह बात सच नहीं है | पेड़ों की तंत्रिका प्रणाली (nerves) एक रोबोट के संवेदक (sensors) की तरह हैं - उनको दर्द / भय / आदि की अनुभूति (feelings) इसलिये नहीं हो सकतीं - क्योंकि उनमे मस्तिष्क (brain) नहीं है्। हम जो भी महसूस करते हैं - वह सिर्फ इन्दिय अवयव (sense organs) और तंत्रिका (nerves) से नहीं | कान सुनते हैं, तंत्रिका (nerves) उस ध्वनि को दिमाग तक ले जाती हैं, किन्तु शब्द को मस्तिष्क (brain) पहचानता है | इसी तरह आँखों का देखना देखना नहीं है - वे सिर्फ दृश्य को रेटिना पर चिन्हित करती हैं - फिर ऑप्टिक नर्व (optic nerve) इस चिन्हित छवि को दिमाग तक ले जाती है - जहां छवि (image) पहचानी जाती है। यह बात सभी इन्द्रियों पर लागू है।| (sight hearing touch taste smell ) | तो दर्द और भय की अनुभूति सिर्फ तंत्रिका तंतु या nerves द्वारा नहीं हो सकती - इसलिए वे जीव जिनमे मस्तिष्क (brain) न हो - वे पीड़ा और भय आदि महसूस नहीं करते। और मस्तिष्क नन्हे से नन्हे चल प्राणी (जैसे कॉकरोच ) में भी होता है , जबकि विशाल से विशाल अचल प्राणी (जैसे बरगद के पेड़ ) में भी नहीं होता।

५. क्या ईश्वर के सृष्टि नियमो के अनुसार वह जीव ईश्वर के प्रदत्त  सौर उर्ज़ा स्रोत (Solarenergy source) से सीधा भोजन तैयार कर रहा है - अपनी निजी आवश्यकता से अधिक मात्रा में - जिससे दूसरे जीवों की आहार आवश्यकता पूरी हो सके ?

- पौधे - हाँ  (क्लोरोफिल संश्लेषण- chlorophyll - photosynthesis )

- चल जीव ( बकरे, मुर्गे आदि ) में - नहीं |

{ इस सिद्धांत का मात्र एक अपवाद (exception) है - गौ माता की पीठ में एक "सूर्य केतु नाडी" है , जो गाय के दूध को अमृत जैसे गुण प्रदान करती है }

६. क्या उस जीव द्वारा दिया गया भोजन एक बार लेने के बाद पुनः बन सकता है ?

-- फल फूल पत्तियां - हाँ ,

-- अन्न, कंद, मूल, मांसाहार - नहीं |

किन्तु - ध्यान दिया जाए कि

अन्न - 

(क) आप न भी लें - तो भी वह पौधा उस समय अपना जीवन काल पूर्ण कर के सूख ही चुका है - आपके अन्न लेने या न लेने से उसके जीवनकाल में कोई बदलाव नहीं आएगा , वह फिर से नहीं जियेगा |

(ख) अन्न देने वाले पौधे - जो मूलतः (basically) घास परिवार के हैं - गेंहू, चावल आदि - ये अपने बीज के रूप में अन्न बनाते हैं |

(ग) किन्तु, ये बीज न तो फल में हैं (आम की तरह ) जो इन्हें खाने वाले प्राणी इनके बीजों को कही और पहुंचा सकें, न इनमे उड़ने की शक्ति है कि ये हवा से फैलें , न ही किसी और तरह की फैलने की क्षमता | पौधों के प्रजनन में बीज के होने का जितना महत्व है, उतना ही उसके फैलने का जिससे वह कही और उग सके, या फिर रोपण का - जिससे वह वहीँ उग सके | ( क्योंकि पौधे अचल हैं, वे स्वयं तो कहीं जा कर अपने बीज रोप ही नहीं सकते ) तो - अन्न के जिस पौधे का जो स्थान है - वहीँ उसके बीज गिरेंगे - यदि मनुष्य न ले तो | तो वहीँ एक पौधे के सिर्फ एक ही बीज के पनपने की संभावना है | बाकी बीज वैसे भी - प्राकृतिक रूप से ही - नहीं पनपेंगे | ये पौधे सिर्फ पुनरुत्पत्ति (reproduction) के ही लिए बीज नहीं बनाते हैं - ये प्रजनन संभावना (reproductive possibility) से कई कई गुणा अधिक बीज बनाते हैं | वह इसलिए - कि ईश्वर ने इन्हें दूसरे प्राणियों को ( जो chlorophyll न होने से स्वयं सूर्य किरणों से भोजन नहीं बना सकते ) भोजन मुहैया कराने को ही ऐसा बनाया है कि ये अपनी प्रजनन (reproductive) ज़रुरत से कई गुणा अधिक बीज बनाएं |

(घ) जब उतनी ही जमीन पर उतने ही पौधे उगने हैं, यदि बीज को इंसान ले / या न ले - तो वह तो बीज अन्न रूप में लेकर भी इंसान कर ही रहा है | उतने बीज तो किसान अगले वर्ष की फसल को उतनी जमीन में फिर से बोयेगा ही - और नयी संतति उन पौधों की उतनी जमीन में उतनी ही संख्या में फिर भी उगेगी - जितनी मनुष्य के न लेने पर उगती |

(च) तथाकथित मांसाहार के समर्थक - जो इस आधार (basis) पर तुलना (comparison) करते हैं, वे भी मांसाहार को अन्न के पूरक की तरह नहीं, बल्कि शाक सब्जी के पूरक की तरह इस्तेमाल करते हैं - वे शाक सब्जियां - जो पौधों में पुनः पुनः फलती ही जाती हैं , और पौधे से बिना हत्या / बिना भय / बिना पीड़ा के प्राप्त होती हैं |

७. वह भोजन प्राप्त करने के लिए क्या किसी न किसी मनुष्य को किसी भी रूप में "हत्या / क्रूरता" ( एक चीखते/ रोते / जीवित रहने का प्रयास करते / तड़पते जीव का सर या गला काटना आदि ) करना पड़ा ?

- पौधों में - नहीं (अन्न के पौधे भी काटे जाते हैं - किन्तु तब जब वे पहले ही निर्जीव हो चुके होते हैं )

- चल प्राणियों में - हाँ |

 

८. क्या किसी एक आहार विकल्प (केवल शाकाहार या केवल मांसाहार) पर निर्भर रहते हुए मनुष्य जीवित रह सकता है ?

- शाकाहार - हाँ

- मांसाहार - नहीं।

९. क्या यह पूर्ण सन्तुलित आहार (complete balanced diet) है - अर्थात - मोटे तौर परकार्बोहाइड्रेट, वसा, प्रोटीन, खनिज, विटामिन, रेशे और जल (carbohydrates , fats , proteins , minerals , vitamins , fibre , water) सभी इससे मानव जीवन के लिए पर्याप्त मात्रा में मिल सकते हैं ?

- शाकाहार - सभी पोषक-तत्व संतुलित (nutrients balanced) रूप में मिलते है।|

- मांसाहार - केवल वसा और प्रोटीन (fats and proteins) | अन्य के लिए आपको मांसाहार  के साथ ही शाकाहार लेना ही पड़ेगा | क्योंकि मात्र मांसाहार पर कोई मनुष्य जीवित नहीं रह सकेगा।

ऐसे आहार पर सिर्फ मांसाहारी प्राणी (carnivorous animals) शेर /चीते आदि ही जी सकते हैं , मनुष्य नहीं।

 

११. क्या इसे पचाने के लिए हमारे पाचन तंत्र (liver / digestive system) पर जोर पड़ता है ? या अन्य प्रणाली - हमारी रक्त धमनियों पर, ह्रदय पर , गुर्दों आदि पर ?

- शाकाहार - नहीं, ये हमारे शारीरिक सिस्टम्स पर बिलकुल अतिरिक्त बोझ नहीं डालता, यह हल्का और सुपाच्य है |

- मांसाहार - हाँ - यह शरीर की हर प्रणाली (system) के लिए भारी है।|

शरीर में कोई भी छोटी बड़ी व्याधि आने पर डॉक्टर्स, खिचड़ी / फलों का रस / नारियल पानी (शाकाहारी पदार्थ) लेने को कहेंगे , उसे भी - जो आमतौर पर ये चीज़ें न खाता हो - क्योंकि ये चीज़ें शरीर की पाचन प्रणाली पर भारी नहीं पड़तीं | इससे उलट देखिये - अंडा / मांस / मछली (मांसाहारी चीज़ें ) यदि साधारण तौर पर व्यक्ति खाता भी हो - तो भी बीमारी ( छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी बीमारी ) में बंद करने को कहा जायेगा - भले ही कुछ ही दिनों को सही - क्योंकि ये चीज़ें हमारे हर प्रणाली (system) पर भारी पड़ती हैं।

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इन सब के अलावा भी - सात्विकता और तामसिकता का फर्क तो है ही।

यह स्थापित सत्य हैं कि जीव हत्या / जीव पीड़ा / जीव उत्पीडन / जीव क्रूरता के बिना मांसाहारी खाद्य पदार्थ प्राप्त किये ही नहीं जा सकते | मांस हर जीव का शरीर अपनी निजी जीवन यापन की आवश्यकता के लिए और उतनी मात्रा में ही बनाता है - दूसरे प्राणियों के लिए अतिरिक्त मात्रा में नहीं बनाता, मांस ले लिए जाने पर भी अपना जीवन निर्बाध रूप से जी ही नहीं सकता | ......... जबकि पौधे सूर्य की किरणों से - अपनी निजी आवश्यकता से कहीं अधिक मात्रा में, पुनः पुनः भोजन बना सकते हैं, और बिना स्वयं के (उस पौधे के) प्रति किसी भी प्रकार की जैविक नकारात्मक साइड इफेक्ट( negative side effects) के वह सूर्य किरणों से बनाया गया भोजन देने के में सक्षम हैं। उनका बनाया भोजन मनुष्य ले या न ले - इससे न उन पौधों के जीवन की अवधि पर असर पड़ता है, और न ही उन्हें किसी प्रकार की कोई पीड़ा महसूस होती है।





{चेतावनी :- इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं, इस लेख से आपकी स्वार्थी भावनाओँ को ठेस पहुंची हो तो क्षमा करे...}

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{Produced, Directed & Written By Sarangdhar Ambildhuke }





 

7 Feb 2016