सिख धर्म मेँ भी हैँ, मांसाहार पर प्रतिबंध

1. जो व्यक्ति मांस, मछली और शराब का सेवन करते हैं,उसके धर्म, कर्म, जप, तप, सबनष्ट हो जाते हैं |

2. क्यूं किसी को मारना ? जब उसे जिन्दा नहीं कर सकते...!

3. जे रत लागे कापड़े, जामा होई पलीत | ते रत पीवे मानुषा, तिन क्यूं निर्मल चीत ||

(अर्थात जिस खून के लगने से वस्त्र-परिधान अपवित्र हो जाते हैं, उसी रक्त को मनुष्य पीता है | फिर उसका मन निर्मल कैसे हो/ रह सकता है ?

- गुरुनानक साहब

गुरुवाणी गुरुमुखों के लिए अन्न पानी खानेका आदर्श रखती है ।

गुरु अर्जुन देव जी ने परमात्मा से सच्चा प्रेम करने वालों की समानता हंस से की है और दूसरों को बगुला बताया है ।

आपने बताया हंसों की खुराक मोती है और बगुलों की मछली, मेंढक ।

हंसा हीरा मोती चुगणा, बगु डडा भलण जावै ।

(आदि gp-थ पृ. 96०)

हिंसा की मनाही व जीव-दया के बारे में गुरुवाणी स्पष्ट शब्दों में कहती है ।

हिंसा तउ मन ते नहीं छूटी जीए दइआ नहीं पाली

(आदि गन्ध पृ. 1253)

कबीर साहब ने जो अहिंसा व दया की शिक्षा दी व मांस खाने की प्रतारणा की वह आदिग-थ में विभिन्न पृष्ठों पर दी हुई है ।

गुरु साहबानों ने स्पष्ट रूप से हिंसा न करने का आदेश दिया है और जब हिंसा ही मना है तो मांस मछली खाने का सवाल ही नहीं उठता

"कबीर भांग मछली सूरा पान जो जो प्राणी खाहिं तीरथ नेम ब्रत सब जे कीते सभी रसातल जाहिं "

(– श्री गुरुग्रन्थ साहब Ang 137 ")

जीव वधहु को धरम कर थापहु अधरम कहहु कत भाई आपन को मुनिवर कह थापहु काको कहहु कसाई "

(- श्री गुरुग्रन्थ साहब Ang 1103)

वेद कतेब कहो मत झूठे ,झूठा जो न विचारे - जो सब में एक खुदा कहु तो क्यों मुरगी मारे "

-श्री गुरुग्रन्थ साहब Ang 1350)

शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने गहरी खोज के बाद जो गुरु साहब के निशान तथा हुकम नामें पुस्तक के रूप में छपवाये है उनमें से एक हुक्मनामा यह है ।

पृष्ठ 103-हुक्म नामा न. 113

बाबा बन्दा बहादुर जी,मोहर फारसी देगो तेगो फतहि नुसरत बेदरिंग याफत अज नाम गुरु गोविन्द सिंह

१ ओंकार फते दरसनु सिरी सचे साहिब जी दा हुक्म है सरबत खालसा जउनपुर का गुरु रखेगा...

खालसे दी रहत रहणा भंग तमाकू हफीम पोस्त दारु कोई नाहि खाणा मांस मछली पिआज ना ही खाणा चोरी जारी नारही करणी ।

अर्थात् मांस, मछली, पिआज, नशीले पदार्थ, शराब इत्यादि क़ी मनाई की गई है ।

सभी सिख गुरुद्वारों में लंगर में अनिवार्यत : शाकाहार ही बनता है ।

घर में जो मानुष मरे, बाहर देत जलाए, आते हैं फिर घर में, औघट घाट नहाय, बाहर से मुर्दा लावें, नून मिर्च घी डाल, उसे घर माहिं पकावें, कहे कबीरदास उसे फिर भोग लगावें, घर - घर करें बखान, पेट को कबर बनावें |

संत कबीर जी कहते हैं की :-

कि घर में जो परिजन मर जाता है, उसे तो लोग तुरन्त शमशान ले जाकर फूँक आते हैं | फिर वापिस आकर खूब अच्छी तरह से मल - मल कर नहाते हैं | मगर विडम्बना देखो, नहाने के थोड़ी देर बाद, बाहर से (किसे मरे जानवर का ) मुर्दा उठाकर घर में ले आते हैं | खूब नमक, मिर्च और घी डालकर उसे पकाते हैं | तड़का लगाते हैं और फिर उसका भोग लगाते हैं | बात इतने पर भी ख़त्म नहीं होती | आस - पड़ोस में, रिश्तेदार या मित्रों के बीच उस मुर्दे के स्वाद का गा - गाकर बखान भी करते हैं | मगर ये मूर्ख नहीं जानते ,जाने - अनजाने ये अपने पेट को ही कब्र बना बैठे हैं!

फिर भी अगर जो लोग मांस खाते हैँ वह सरासर गुरु नानक साहाब, गुरु गोविँद सिँह साहाब, और संत कबिर जी का अपमान करते हैँ...





{चेतावनी :- इस लेख में दिये सबुत सिख धर्म के ग्रंथो से लिये गये हैँ, तथा लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं, इस लेख से आपकी स्वार्थी भावनाओँ को ठेस पहुंची हो तो क्षमा करे...}

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10 Feb 2015