भोजन का चुनाव व्यक्तिगत मामला मात्र नहीं है - कौन सा न्याय है कि हमें तो खाने-पीने तक की आज़ादी चाहिए, लेकिन दूसरे जीवों को जीने तक की आज़ादी नहीं हो ?

अकसर कहा जाता है कि आहार व्यक्ति की व्यक्तिगत रुचि की बात है। जिसका जो दिल करे खाए। हमारा आहार कोई अन्य उपदेशित या प्रबन्धित क्यों करे? क्या खाना क्या नहीं खाना यह हमारा अपना स्वतंत्र निर्णय है। किन्तु यह सरासर एक संकुचित और स्वार्थी सोच है, विशेषकर तब जब उसके साथ हिंसा सलग्न हो। प्रथम दृष्टि में व्यक्तिगत सा लगने वाला यह आहार निर्णय, समग्र दृष्टि से पूरे विश्व के जन-जीवन को प्रभावित कर सकता है। मात्र आहार ही नहीं हमारा कोई भी कर्म यदि किसी दूसरे के जीवन को बुरी तरह प्रभावित कर रहा हो, उस दशा में तो और भी धीर गम्भीर चिंतन और विवेकयुक्त निर्णय हमारा उत्तरदायित्व बन जाता है। यदि आपके किसी भी कृत्य से कोई दूसरा (मनुष्य या प्राणी जो भी) प्रभावित होता है, समाज प्रभावित होता है, देश प्रभावित होता है विश्व प्रभावित होता है उस स्थिति में आपके आहार-निर्णय की एकांगी सोच या स्वछंद विचारधारा, कैसे मात्र व्यक्तिगत रह सकती है। अन्य जीवन का सवाल :- यह तो साफ है कि माँस किसी प्राणी का जीवन समाप्त करके ही प्राप्त किया जा सकता है। जो आहार किसी दूसरे प्राणी का जीवन ही हर ले, जिसमें किसी अन्य प्राणी को अपनी मूल्यवान जान देनी पडे, कैसे मात्र आपका व्यक्तिगत मसला हो सकता है। भावनायें आहत होती हैं :- माँसाहारियो के लिये यह मात्र आहार की बहस है। पर शाकाहारियों के लिये निश्चित ही किसी जीवन के प्रति उत्तरदायित्व का प्रश्न है। पशुओं को कटते हुए न देख पाना, खून से लथपथ माँस, यत्र-तत्र बिखरे उनके व्यर्थ अवयव, पकने पर फैलती इन पदार्थों की दुर्गन्ध, खाते देखकर पैदा होती जगुप्सा। दूसरो की भावनाओं को आहत करने के लिए पर्याप्त है। जो आहार दूसरों की भावनाओं को आहत करे, कैसे यह मुद्दा व्यक्तिगत पसंद तक सीमित हो सकता है? हिंसा को प्रोत्साहन :- जब आप माँसाहार करते है तो समाज में यह संदेश जाता है कि माँसाहार में छुपी पशुहिंसा सहज सामान्य है यह आहार शैली एक तरह से हिंसा को अप्रत्यक्ष समर्थन है। यह प्रकृति में उपस्थित जीवन का अनादर है। यह सोच समाज में शनैः शनैः निष्ठुरता का प्रसार करती है। यदि आहार इस तरह समाज के मानवीय जीवनमूल्यों को क्षतिग्रस्त करे तो वह कैसे मात्र व्यक्तिगत मामला हो सकता है। वैश्विक मानव पोषण और स्वास्थ्य :- पोषण के भी असंयमी स्वछंद उपभोग से न केवल प्राकृतिक-वितरण में असन्तुलन पैदा होता है बल्कि आप अतिरिक्त माल को व्यर्थ मिट्टी बना रहे होते है। अतिरिक्त उर्ज़ायोग्य तत्वों को अनावश्यक अपशिष्ट बना कर व्यर्थ कर देते है। यह दुरपयोग, किसी कुपोषण के शिकार के मुंह का निवाला छीन लेने की धृष्टता है। इस प्रकार व्यर्थ गई उर्ज़ा को पुनः रिसायकल करने में प्रकृति का बेशकीमती समय तो बर्बाद होता ही है, प्रकृति के संसाधन भी अनावश्यक ही खर्च होते है। तब बात और भी गम्भीर हो जाती है जब आप जो उर्ज़ा सीधे वनस्पति से प्राप्त कर सकते थे, बीच में एक जानवर और उसकी बेशकीमती जान का भोग ले लेते है। और मांसाहार से द्वितीय श्रेणी की उर्ज़ा पाने का निर्थक और जटिल उद्यम करते है। माँसाहार, कुपाच्य और रेशे रहित होता है परिणाम स्वरूप कईं रोगों का निमंत्रक बनता है, इसे अगर व्यक्तिगत आरोग्य-हानि भी मान लें पर सामुहिक रूप से यह विश्व स्वास्थ्य के प्रति उत्तरदायी है। माँसाहार पर सवार होकर प्रसार पाती महामारियों से आज कोई भी अनभिज्ञ नहीं है। इस तरह मांसाहार जब वैश्विक पोषण और स्वास्थ्य को प्रभावित करता है तो कैसे मात्र व्यक्तिगत चुनाव का प्रश्न कहकर पल्ला झाडा जा सकता है? विश्व खाद्यसंकट- भोजन का सम्मान होना चाहिए, उसका दुरपयोग या अपव्यय दूसरे प्राणी के मुँह के कौर को धूल में मिलाने के समान है। जब हम अपना भोजन बनाने की विधि में भी अनावश्यक व्यर्थ करते है या हमारी थाली में भी जूठा छोड कर फैक देते है तो यह भी एक अपराध है। यह दूसरे लोगों को भूखमरी के हवाले करने का अपराध है। जब भोजन के साथ सहज ही हो जानेवाला यह मामूली सा अविवेक भी अपराध की श्रेणी में आता है तो 13 किलो शाकाहार को व्यर्थ कर के आहार के लिए मात्र 1 किलो माँस पाने की क्रिया कैसे निर्दोष हो सकती है? और पशु की आधे से भी अधिक मात्रा वेस्टेज कर दी जाती है। विश्व की एक-चौथाई उपजाऊ भूमि पशुपालन में झोंक दी गई है। यह खाद्य अपव्यय, संसाधनो का दुरपयोग, प्रकृति के विनाश का अक्षम्य अपराध है। ऐसी मांसाहार भोजन-शैली, वैश्विक भूखमरी का कारण हो, जो हमारे समस्त जीवनोपयोगी संसाधनो की बरबादी का कारण हो, कैसे एक व्यक्तिगत मामले में खपा दी जा सकती है। विश्व पर्यावरण :- नवीनतम शोध के अनुसार लगभग सभी वैज्ञानिक इस बात से सहमत है कि माँसाहार का प्रयोग ग्लोबल वॉर्मिंग का एक प्रमुख कारक है। मांस-उद्योग सर्वाधिक ग्रीनहाउस गैसेज का स्रोत बनकर मुँह चि्ढ़ा रहा है। पर्यावरण दूषण आज मानव अस्तित्व के लिए ही चुनौति बनकर खड़ा है। क्योंकि अनियंत्रित भोग और मनमौज ही प्राकृतिक संसाधनों का शोषण है। पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों की बरबादी अर्थात् मानव अस्तित्व के लिए विकराल खतरा। जिस निर्णय से मानव अस्तित्व ही खतरे में पड जाय तो कैसे उस चुनाव को मात्र व्यक्तिगत कह कर किनारा किया जा सकता है? नशा, ड्र्ग्स, धूम्रपान, गुटका आदि व्यक्तिगत खुराक होते हुए भी व्यक्तिगत इच्छाओं के अधीन स्वछंद छोडी नहीं जा सकती। यह समस्त विश्व के स्वास्थ्य कल्याण का गम्भीर प्रश्न बनती है। उसी तरह आहार भी यदि वैश्विक समस्याएँ खडी करता है तो मसला किसी भी दृष्टि से व्यक्तिगत चुनाव तक संकीर्ण नहीं रह जाता। इस तरह आहार का चुनाव' केवल आहारी व्यक्ति के व्यक्तिगत पसंद-नापसंद का विषय नहीं है। आपका आहार समाज से लेकर वैश्विक पर्यावरण तक को प्रभावित करता है। वह सीधे सीधे वैश्विक संसाधनो को प्रभावित करता है। अप्रत्यक्ष रूप से विश्व शान्ति को प्रभावित करता है।जीव-जगत के रहन-सहन-व्यवहार ही नहीं उनके जीने के अधिकार को प्रभावित करता है। फिर भला आहार, मात्र व्यक्तिगत मुद्दा कैसे हो सकता है...?





 

{चेतावनी :- इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं, इस लेख से आपकी स्वार्थी भावनाओँ को ठेस पहुंची हो तो क्षमा करे...}

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4 Feb 2016