जैन धर्म - मानवता का उदाहरण

अहिंसा जैनधर्म का सबसे मुख्य सिद्धान्त है । जैन ग्रंथों में हिंसा के 108 भेद किये गये है ।

भाव हिंसा, स्वयं हिंसा करना, दूसरों के द्वारा करवाना अथवा सहमति प्रकट करके हिंसा कराना सब वर्जित है । हिंसा के विषय में सोचना तक पाप माना है । हिंसा, मन, वचन, व कर्म द्वारा की जाती है अत: किसी को ऐसे शब्द कहना जो उसको पीड़ित करे वह भी हिंसा मानी गई है । ऐसे धर्म में जहाँ जानवरों को बांधना, दु :ख पहुंचाना, मारना व उन पर अधिक भार लादना तक पाप माना जाता है ।

वहाँ मांसाहार का तो प्रश्न ही पैदा नहीं होता ।

हिंसा दो प्रकार की है- भाव हिंसा और द्रव्य हिंसा। किसी जीव को मारना द्रव्य हिंसा और मारने या दुःख देने का विचारमात्र मन में आना भाव हिंसा है। जैन धर्म के अनुसार किसी चींटी तक को जानकर या प्रमादवश मारना हिंसा कही गयी है। यह हिंसा मन, वचन, कार्य कृत स्वयं करना, दूसरे से करवाना, अनुमोदना करने करने का समर्थन करना, क्रोध, मान, माया, लोभ और संरभ हिंसा करने के लिए सामान जुटाना समारंभ की तैयारी करना आरम्भ के भेद से 100 प्रकार से हो सकती है।

जहाँ स्वयं हिंसा करना, दूसरों से करवाना तथा करते हुए अनुमोदन करना भी हिंसा है। क्रोध, मान, माया अथवा लोभ के कारण किसी के मन को दुखाना भी हिंसा है, वहाँ मांसाहार के समर्थन का तो प्रश्न ही नहीं उठाता।

जैनागम में कहा है-

“हिंसादिष्विहामुत्रपायावद्यदर्शनम्” “दुःखभेववा”

अर्थात... हिंसा, झूठ आदि पापों से इसलोक में राजदण्ड, समाजदण्ड, निन्दा आदि का कष्ट भोगने पडते हैं। अतः हिंसादि दुःख ही है। दुःख के कारण होने से इन्हें उपचार से दुःख जी कहा गया है।

प्राणियों के घात के बिना मांस की उत्पत्ति नहीं होती। अतः मांसभक्षी व्यक्ति के हिंसा अनिवार्य रूप से होती है।

यदि कोई कहे कि हम तो स्वयं मरे हुए जीवों का मांस खाते हैं, जब हम जीव को मारते ही नहीं हैं तो हमें हिंसा का दोष कैसे लगेगा?

आचार्य कहते हैं-

स्वयमेव मरे हुए भैंस, बैल आदि का मांस खाने से भी उस मांस के आश्रित रहने वाले उसी जाति के अनंत निगोदिया जीवों का घात होता है। अतः स्वयं मरे हुए जीवों का मांस खाने में भी हिंसा होती है।

पकी हुई, बिना पकी हुई अथवा पकती हुई मांस की डलियों में उसी जाति के सम्मूर्च्छन जीव निरंतर उत्पन्न होते रहते हैं। अतः जो व्यक्ति कच्ची अथवा पकी हुई मांस की डली खाता है अथवा छूता है, वह निरंतर एकत्रित किये हुए अनेक जाति के जीव समूह को मारता है।

जैन धर्म में प्राणी हत्या का निषेध जैन धर्म में तो छोटे बड़े सभी प्रकार के जीवों को मारने की घोर वर्जना की गई है

श्री वर्धमान महावीर जी ने कहा हैँ,

"सव्वे जीवा इच्छन्ति जीवियुं न मररिस्सयुं -तम्हा पाणि बहम घोरं निग्गन्ठा पब्बजन्ति च

"समण सुत्त गाथा -3

अर्थात... सभी जीव जीना चाहते हैँ, मरना कोई नहीं चाहता, इसलिए निर्ग्रन्थ (जैन) प्राणी वध की घोर वर्जना करते हैं...

1. अहिंसा परम धर्म है | किसी भी जीव की हिंसा मत करो, हिंसा करने वाले का सब धर्म-कर्म व्यर्थ हो जाता है |

2. संसार में सबको अपनी जान प्यारी है, कोई मरना नहीं चाहता, अतः किसी भी प्राणी की हिंसा मत करो |





{चेतावनी :- इस लेख में सारे सबुत जैन धर्म के ग्रंथो से लिये गये हैँ. तथा लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं, इस लेख से आपकी स्वार्थी भावनाओँ को ठेस पहुंची हो तो क्षमा करे...}

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13 Feb 2014